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एलएलएम एक वर्षीय पाठ्यक्रम : "बीसीआई को एलएलएम कोर्स को विनियमित करने का अधिकार नहीं", एनएलयू कंसोर्टियम ने सुप्रीम कोर्ट में कहा

LiveLaw News Network
10 Feb 2021 9:34 AM GMT
एलएलएम एक वर्षीय पाठ्यक्रम : बीसीआई को एलएलएम कोर्स को विनियमित करने का अधिकार नहीं, एनएलयू कंसोर्टियम ने सुप्रीम कोर्ट में कहा
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एलएलएम के एक वर्षीय पाठ्यक्रम को रद्द करने के बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के फैसले को चुनौती देने वाली दो रिट याचिकाओं की सुनवाई गुरुवार तक के लिए स्थगित कर दी।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली बेंच गुरुवार को कंसोर्टियम ऑफ नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज और एक अन्य ऋषभ सोनी द्वारा दायर याचिकाओं में अंतरिम राहत के लिए याचिका पर सुनवाई करेगी।

इस बीच एनएलयू कंसोर्टियम को एलएलएम प्रोग्राम के लिए राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (National Law Universities) द्वारा प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने के बारे में एक हलफनामा दायर करने के लिए कहा गया है।

वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एएम सिंघवी (एनएलयू के कंसोर्टियम का प्रतिनिधित्व करते हुए) ने खंडपीठ को सूचित किया कि एलएलएम प्रोग्राम के विज्ञापन दो जनवरी को विश्वविद्यालयों द्वारा प्रकाशित किए गए थे और अब तक 5000 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं।

इसलिए, सिंघवी ने दो जनवरी के अनुसार यथास्थिति बनाए रखने का आदेश पारित करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि विनियमों को बीसीआई द्वारा अधिसूचित किया जाना है और अधिसूचना के बिना यथास्थिति को बनाए रखा जाना चाहिए।

बीसीआई को एलएलएम को विनियमित करने का अधिकार नहीं

सुनवाई के दौरान, डॉ. सिंघवी ने एलएलएम प्रोग्राम को विनियमित करने के लिए बीसीआई के अधिकार पर सवाल उठाया। वह भी संबंधित विश्वविद्यालयों के किसी भी परामर्श के बिना ऐसा करने पर सवाल उठाए गए।

उन्होंने कहा कि कानूनी शिक्षा को विनियमित करने के लिए बीसीआई की शक्ति केवल कानूनी प्रैक्टिस के लिए नामांकन के लिए योग्यता निर्धारित करने तक सीमित है। चूंकि एलएलएम कानूनी नामांकन के लिए कोई योग्यता नहीं है, इसलिए बीसीआई के पास इसे विनियमित करने की कोई शक्ति नहीं है।

"बीसीआई की शक्ति अधिवक्ता अधिनियम से संचालित होती है। बार काउंसिल केवल नामांकन के लिए मानक तय करने से संबंधित है। एलएलएम नामांकन करने के लिए प्रवेश पाठ्यक्रम नहीं है।"

सिंघवी ने कहा कि एलएलएम कानूनी प्रैक्टिस करने की डिग्री नहीं है। अधिवक्ता अधिनियम केवल कानूनी प्रैक्टिस के लिए डिग्री से संबंधित है।

केवल यूजीसी को एलएलएम कोर्स विनियमित करने का अधिकार

सिंघवी ने कहा कि यह केवल विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) है जो देश में एलएलएम पाठ्यक्रमों को विनियमित करने की शक्ति रखता है।

"यह एक अखिल भारतीय कार्यक्रम है और इसके लिए एक भी यूनिवर्सिटी से परामर्श नहीं किया गया है ... एक साल का एलएलएम पाठ्यक्रम 2012 में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफारिशों के आधार पर अस्तित्व में आया। दुनिया भर में एलएलएम का एक वर्षीय पाठ्यक्रम मानक है। एलएलएम को यूजीसी द्वारा नियंत्रित किया जाता है न कि बीसीआई द्वारा।"

उन्होंने कहा कि नियम देश भर के 22 विश्वविद्यालयों में एक वर्षीय पाठ्यक्रम को रद्द कर देंगे, जबकि दुनिया भर में एक वर्षीय पाठ्यक्रम चलाया जा रहा है।

सिंघवी ने कहा कि बीसीआई नियम तीन प्रकार से प्रभाव डालेगा:

"यह एलएलएम के एक वर्षीय पाठ्यक्रम को समाप्त करता है। नियम कहता है कि 2 साल के एलएलएम कोर्स के लिए प्रवेश बीसीआई से होना चाहिए न कि एनएलयू द्वारा। नियम कहते हैं कि बीसीआई पीएचडी कार्यक्रमों को विनियमित करेगा।"

उन्होंने प्रस्तुत किया कि बीसीआई राष्ट्रीय शैक्षिक नीति पर भरोसा करके गलती कर रहा है क्योंकि उच्च शिक्षा आयोग लागू होना बाकी है और अभी यूजीसी मौजूद है।

कंसोर्टियम यथास्थिति चाहता है

डॉ. सिंघवी ने अदालत को सूचित किया कि भारत में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों ने पहले ही एलएलएम पाठ्यक्रम के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं और 5,000 आवेदन प्राप्त किए जा रहे हैं। इसलिए उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि यथास्थिति बनाए रखी जाए और बीसीआई को एलएलएम के एक वर्षीय पाठ्यक्रम को रद्द करने के फैसले को अधिसूचित करने से रोका जाए।

उन्होंने कहा,

"ऐसा नहीं होना चाहिए कि हम अदालत से बाहर जाएं और वे अचानक नियम सूचित कर दें। अधिसूचना के बगैर यथास्थिति का आदेश दिया जाना चाहिए। एक भी विश्वविद्यालय से परामर्श नहीं किया गया है। 2 जनवरी, 2021 तक की स्थिति बनाए रखी जानी चाहिए।"

सीजेआई ने पूछताछ की कि क्या बीसीआई ने अभी तक अपने फैसले को अधिसूचित नहीं किया है?

सिंह ने कहा,

नियमों का कहना है कि उन्होंने समाप्त कर दिया है। फिर वे कहते हैं कि जब तक नियमों को अधिसूचित नहीं करेंगे, तब तक नियम लागू नहीं होंगे।"

इस पर CJI ने पूछा,

"उन्होंने अधिसूचित नहीं किया है?"

सिंघवी ने कहा,

"नहीं, मैं यही कहता हूं कि यथास्थिति बरकरार है।"

इसके बाद, CJI ने कंसोर्टियम को प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने के बारे में एक हलफनामा दायर करने को कहा।

CJI ने पूछा,

"विश्वविद्यालयों द्वारा पहले से ही क्या प्रक्रिया अपनाई जा रही है? आपने कहां कहा है कि 2 जनवरी को विश्वविद्यालयों द्वारा विज्ञापन प्रकाशित किए गए और 5000 आवेदन प्राप्त हुए थे, फीस प्राप्त हुई थी?"

CJI ने निर्देश दिया कि इस संबंध में एक हलफनामा दायर किया जाए।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया लीगल एजुकेशन (पोस्ट ग्रेजुएट, डॉक्टोरल, एग्जीक्यूटिव, वोकेशनल, क्लीनिकल एंड अदर कंटीन्यूइंग एजुकेशन) रूल्स, 2020 को अधिसूचित किया है, जिसमें लॉ (एलएलएम) में एक साल की मास्टर डिग्री को खत्म करने का प्रयास किया गया है।

नए नियम के अनुसार,

"विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा 2013 में भारत में शुरू किए गए (अधिसूचना के अनुसार) एक वर्ष की अवधि के लॉ मास्टर डिग्री प्रोग्राम इस अकादमिक सत्र तक ऑपरेटिव और मान्य रहेगा। इस दौरान इन नियमों को अधिसूचित और लागू किया जाएगा, लेकिन इसके बाद देश के किसी भी विश्वविद्यालय में ये मान्य नहीं होगा।"

नए नियम में कहा गया कि पोस्ट ग्रेजुएट (स्नातकोत्तर डिग्री) लॉ में मास्टर डिग्री एलएलएम चार सेमेस्टर में दो साल की अवधि का होगा। इसके अलावा, एलएलएम पाठ्यक्रम केवल कानून स्नातक तक ही सीमित है।

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