'एक हाईकोर्ट जज को सुप्रीम कोर्ट के तेज़ी से निपटाने के निर्देश वाले केस की सुनवाई के लिए रात 7 बजे तक बैठना पड़ा': CJI सूर्यकांत

Shahadat

21 May 2026 2:49 PM IST

  • एक हाईकोर्ट जज को सुप्रीम कोर्ट के तेज़ी से निपटाने के निर्देश वाले केस की सुनवाई के लिए रात 7 बजे तक बैठना पड़ा: CJI सूर्यकांत

    इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक मामले की जल्द सुनवाई की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि वह हाई कोर्ट के जजों पर उनके काम के बोझ को ध्यान में रखे बिना समय-सीमा तय करके उन पर अतिरिक्त बोझ नहीं डाल सकता।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज को सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय समय-सीमा के भीतर एक मामले की सुनवाई करने के लिए नियमित मामलों के बाद रात 7:10 बजे तक बैठना पड़ा। आखिरकार उन्होंने आदेश पारित करने को टाल दिया, यह लिखते हुए कि वह फैसला लिखवाने के लिए "भूखे, थके हुए और शारीरिक रूप से असमर्थ" थे।

    CJI हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी द्वारा हाल ही में पारित एक आदेश का ज़िक्र कर रहे थे, जिसमें उन्होंने लिखा कि वह फैसला नहीं लिखवा सके क्योंकि रात 7:10 बजे तक मामलों की सुनवाई करने के बाद वह थक गए थे और उन्हें भूख लगी थी।

    CJI ने कहा कि ऐसी घटनाएं इस बात की ज़रूरत की ओर इशारा करती हैं कि हाईकोर्ट में सुनवाई में तेज़ी लाने के निर्देश जारी करने से पहले सुप्रीम कोर्ट को भी आत्म-मंथन करने की ज़रूरत है।

    CJI ने याद दिलाते हुए कहा,

    "जैसा कि एक जज ने लिखा था। शायद सही ही लिखा था... उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का फैसला करने का निर्देश दिया था... अब शाम के 6:50 या 7:10 बज रहे हैं... उन्होंने समय का ज़िक्र किया... मैंने अपना लंच भी छोड़ दिया, अब मैं पूरी तरह से थका हुआ और निढाल हूं, मैं इस मामले को आगे नहीं ले जा पाऊंगा। उन्होंने न्यायिक आदेश में इसका ज़िक्र किया... जिसके लिए वास्तव में हमारी ओर से भी कुछ आत्म-मंथन की ज़रूरत है। उन्होंने यह भी ज़िक्र किया कि उनके सामने 200 से ज़्यादा नए मामले लंबित थे। यहां से कोई आदेश पारित करना, भले ही उसमें 'अनुरोध' शब्द का इस्तेमाल किया गया हो, बहुत मुश्किल हो जाता है।"

    CJI कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की खंडपीठ 2021 के एक मामले में जल्द फैसले की मांग वाली एक विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

    याचिकाकर्ता के वकील की बात सुनने के बाद CJI ने पूछा कि क्या उन्हें पता है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में सबसे पुराना लंबित मामला कौन-सा है। जब वकील ने जवाब दिया कि उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं है तो CJI ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को रोज़ाना हाईकोर्ट की सुनवाई तेज़ करने के लिए याचिकाएं मिलती हैं, लेकिन हाईकोर्ट पर काम के बोझ को देखते हुए ऐसे आदेश देने में बहुत सावधानी बरतने की ज़रूरत होती है।

    "हमारे पास हर दिन 4-5 याचिकाएं आती हैं। इन 4-5 में से 3 याचिकाएं इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़ी होती हैं। इससे एक बहुत ही गलत मिसाल कायम होगी कि हम यहां बैठे-बैठे ही हाईकोर्ट के रोस्टर पर असल में अपना नियंत्रण जमाना शुरू कर दें। वहां 100 से ज़्यादा जज हैं... उस हाईकोर्ट को संभालना बहुत मुश्किल काम है... माननीय चीफ जस्टिस ज़रूर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहे होंगे, इसमें हमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन फिर भी हर दिन ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं।"

    CJI ने यह भी राय दी कि अगर कोर्ट किसी हालिया मामले की सुनवाई तेज़ करता है तो इसका खामियाज़ा किसी पुराने मामले को भुगतना पड़ेगा; वह पुराना मामला किसी ऐसे गरीब वादी का हो सकता है जिसके पास सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचने के लिए पर्याप्त संसाधन न हों।

    "लोग चाहते हैं कि उनके मामले का निपटारा हो तो फिर क्या किया जाए? ये बहुत ही गंभीर चुनौतियां हैं। इसका समाधान कहीं और है, न कि हम बस निर्देश जारी करते रहें। अगर हम उन्हें निर्देश देते हैं और वे उस मामले को सुनवाई के लिए उठाते हैं तो इसका मतलब होगा कि किसी दूसरे पुराने मामले की सुनवाई पीछे छूट जाएगी। कोई गरीब व्यक्ति जो इस कोर्ट तक पहुँचकर कोई आदेश हासिल नहीं कर पाया है, वह इस पूरी व्यवस्था का शिकार बन जाएगा।"

    आखिरकार, बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। बेंच ने याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वह हाईकोर्ट में जाकर अपने मामले की 'बारी से पहले' (out-of-turn) सुनवाई के लिए गुहार लगा सकता है।

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