छात्र को NSA हिरासत में लेने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार वाले आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं नोएडा DM

Shahadat

14 Sept 2026 9:49 AM IST

  • छात्र को NSA हिरासत में लेने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार वाले आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं नोएडा DM

    गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट मेधा रूपम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जिसमें छात्र आकृति चौधरी को नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत हिरासत में लेने के मामले में उनकी सैलरी से 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया गया।

    बात दें, दिल्ली यूनिवर्सिटी की लॉ स्टूडेंट और एक्टिविस्ट, 24 वर्षीय आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट द्वारा हिरासत का आदेश जारी करने के तरीके की कड़ी आलोचना की थी।

    बेंच ने साफ तौर पर चेतावनी दी कि गलत काम करने वाली ब्यूरोक्रेसी का लगातार 'तानाशाही' वाला व्यवहार उत्तर प्रदेश को "ऑर्वेलियन डिस्टोपिया" (एक ऐसी दमनकारी जगह जहाँ सरकार का पूरा नियंत्रण हो) में बदल सकता है।

    जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने माना कि NSA के तहत चौधरी को लगातार हिरासत में रखना आर्टिकल 21 के तहत उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन है, क्योंकि हिरासत का आदेश और उसके आधार बिना किसी ठोस सबूत के और "बिना सोचे-समझे" जारी किए गए।

    कोर्ट ने चौधरी को 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का भी आदेश दिया और कहा कि यह रकम गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट मेधा रूपम (जिन्होंने हिरासत का आदेश जारी किया था) इसके लिए जिम्मेदार अन्य अधिकारियों - "SHO तक" - की सैलरी से वसूली जाए।

    25 वर्षीय चौधरी दिल्ली यूनिवर्सिटी से हिस्ट्री में ग्रेजुएट हैं और उन्हें अप्रैल 2026 में नोएडा में मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया। इसके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने 13 मई को चौधरी और एक्टिविस्ट/पत्रकार सत्यम वर्मा के खिलाफ नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, 1980 लागू किया। वे ज़्यादा वेतन की मांग को लेकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किए गए कई एक्टिविस्ट में शामिल थे।

    ब्यूरोक्रेसी और पुलिस पर हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    अपने 15 पेज के आदेश में बेंच ने ब्यूरोक्रेसी और पुलिस की भूमिकाओं पर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को बहुत ज़्यादा शक्तियाँ दी जाती हैं, क्योंकि उन पर नागरिकों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों, गरिमा, सम्मान और कल्याण को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी होती है।

    हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि उन्हें यह याद रखना चाहिए कि उनकी "वफ़ादारी संविधान के प्रति है, न कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति"। कोर्ट ने आगे कहा कि अधिकारी जनता की सेवा करने वाले सेवक होते हैं और लोकतंत्र में जनता ही "मालिक" होती है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि जब नौकरशाह और पुलिस अधिकारी अपनी शपथ को नज़रअंदाज़ करते हैं और उसके उलट काम करते हैं तो लोग उन्हें "ब्रिटिश राज की दमनकारी निशानी" के तौर पर देख सकते हैं, जिससे नागरिक अशांति का माहौल बन सकता है।

    बेंच ने आगे कहा,

    "नौकरशाही में गलत काम करने वाले लोग उत्तर प्रदेश राज्य को 'ऑर्वेलियन डिस्टोपिया' (एक ऐसी दमनकारी जगह जहाँ सरकार का पूरा नियंत्रण हो) में बदल दें, तो इसमें ज़्यादा समय नहीं लगेगा।"

    कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना किसी ठोस वजह या सही प्रक्रिया के नागरिकों की आज़ादी में दखल देने वाली ज्यादतियों या गैर-कानूनी कामों को ठीक करते हुए, न्यायपालिका पीड़ित नागरिकों को मुआवज़ा दिलाने के लिए "सख्त आदेश" दे सकती है।

    डीएम मेधा रूपम पर हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    कोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (DM) मेधा रूपम के व्यवहार की खास तौर पर आलोचना की, जिन्होंने NSA के तहत हिरासत का आदेश जारी किया था।

    कोर्ट ने माना कि जहां पुलिस रिपोर्ट में बिना किसी भरोसेमंद सबूत के सिर्फ़ आरोप लगाए गए, वहां डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट से उम्मीद की जाती थी कि वे NSA के कड़े प्रावधान लागू करने का फ़ैसला लेने से पहले रिकॉर्ड की 'बारीकी से' जांच करें।

    बेंच ने पाया कि चौधरी महिला स्टूडेंट एक्टिविस्ट हैं, जिनका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, और सबूतों से यह पता नहीं चलता कि उन्होंने हिंसा भड़काई थी।

    कोर्ट ने इस नतीजे पर पहुंचते हुए कहा:

    "गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, जिन्होंने विवादित आदेश जारी किया, का व्यवहार निंदा के योग्य है।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि हालात से पता चलता है कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट चौधरी के ज़रिए "एक मिसाल कायम करना" चाहती थीं और दूसरों को मज़दूरों के समर्थन में सार्वजनिक जगहों पर बोलने और अपनी बात रखने की आज़ादी का इस्तेमाल करने से रोकना चाहती थीं।

    Case Title : Medha Roopam v. Akriti Chaudhary

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