महिलाओं के मस्जिद में नमाज़ के लिए जाने पर कोई रोक नहीं, इस्लाम पर ERP टेस्ट गलत तरीके से लागू किए गए: AIMPLB ने सुप्रीम कोर्ट से कहा
Shahadat
23 April 2026 7:55 PM IST

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि महिलाओं के मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए जाने पर कोई रोक नहीं।
सीनियर एडवोकेट एम.आर. शमशाद ने AIMPLB की ओर से 9 जजों की बेंच के सामने यह बात रखी। यह बेंच सबरीमाला मामले की सुनवाई कर रही है।
मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश की मांग करने वाली रिट याचिकाएं भी सबरीमाला मामले के साथ जोड़ दी गईं, क्योंकि वहां भी अनुच्छेद 25 और 26 के दायरे से जुड़े संवैधानिक सवाल उठते हैं।
याचिकाओं का जवाब देते हुए शमशाद ने कहा कि मस्जिद में 'गर्भगृह' (sanctum sanctorum) जैसा कोई कॉन्सेप्ट नहीं होता, हालांकि दरगाहों में ऐसा होता है।
उन्होंने कहा,
"अगर मस्जिद के अंदर कोई गर्भगृह नहीं है तो कोई भी किसी खास जगह पर खड़े होने की या, उस मामले में नमाज़ की इमामत (नेतृत्व) करने के लिए सबसे पहले खड़े होने की ज़िद नहीं कर सकता।"
इस पर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने पूछा,
"तथ्यों की स्पष्टता के लिए क्या महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश करने की अनुमति है?"
शमशाद ने कहा कि इस्लाम के सभी संप्रदायों में इस बात पर आम सहमति है कि महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश करने पर कोई रोक नहीं है। हालांकि, इस बात पर भी सहमति है कि महिलाओं के लिए नमाज़ पढ़ने वाली जमात (समूह) का हिस्सा बनना ज़रूरी नहीं है।
इसके बाद जस्टिस अमनुल्लाह ने शमशाद से कहा,
"आपको सभी की जानकारी के लिए यह विस्तार से बताना चाहिए कि शुरू से ही इस बात पर कोई विवाद नहीं रहा है (कि महिलाएं प्रवेश कर सकती हैं) और इसकी शुरुआत खुद पैगंबर साहब ने की थी।"
सीनियर वकील ने जवाब दिया,
"जी हां, माई लॉर्ड्स। पैगंबर साहब ने खुद कहा था कि महिलाओं को मस्जिद में आने से मत रोको। इस पर पूरी स्पष्टता है। और जिन लोगों ने कई खंडों में हदीसें लिखी हैं, उनमें से कई ने यह बात दर्ज की कि पैगंबर साहब ने निर्देश दिया था कि महिलाओं को मस्जिद में आने से न रोका जाए।"
शमशाद ने समझाया कि पुरुषों के लिए जमात का हिस्सा बनना अनिवार्य है, जबकि महिलाओं के लिए यह अनिवार्य नहीं है।
उन्होंने कहा,
"महिलाओं के लिए बेहतर यही है कि वे घर पर रहकर नमाज़ पढ़ें, और उन्हें भी उतना ही धार्मिक सवाब (पुण्य) मिलता है। हालांकि, अगर कोई महिला मस्जिद आना चाहती है तो वह आ सकती है।"
CJI ने पूछा,
"सिवाय इसके कि वह जमात का हिस्सा नहीं बन सकती?"
वकील ने स्पष्ट किया,
"नहीं, वे जमात का हिस्सा बनेंगी। अगर वे मस्जिद जा रही हैं, तो उसका मकसद जमात में शामिल होना है, और इसकी इजाज़त है।"
जस्टिस नागरत्ना ने पूछा,
"तो, उनके (महिलाओं के) लिए जमात में शामिल होना ज़रूरी नहीं है?"
शमशाद ने हाँ में जवाब दिया, और आगे कहा कि मस्जिद में जमात में शामिल होना किसी महिला के लिए "बेहतर नहीं" है।
जस्टिस अमनुल्लाह ने आगे कहा,
"तो इसकी वजह यह है कि अगर घर से सब लोग चले जाएं तो बच्चों की देखभाल कौन करेगा?"
वकील ने दलील दी कि याचिका में मांगी गई राहत पर कोई आपत्ति नहीं है, जिसमें कहा गया कि महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश करने और नमाज़ अदा करने की अनुमति दी जानी चाहिए। रिट याचिका में की गई दूसरी प्रार्थना के संबंध में—कि महिलाओं को मुख्य द्वार से प्रवेश करने की अनुमति दी जानी चाहिए और उन्हें मुसल्ला (नमाज़ पढ़ने की जगह) तक देखने और सुनने का अधिकार होना चाहिए-शमशाद ने कहा, "वे मस्जिद के अंदर 'गर्भगृह' (Sanctum Sanctorum) की अवधारणा लाने की कोशिश कर रहे हैं।"
उन्होंने याचिकाकर्ताओं की एक और प्रार्थना पर भी आपत्ति जताई, जिसमें कहा गया कि महिलाओं को मुसल्ला के अंदर बिना किसी रुकावट (बैरियर) के और पुरुषों के साथ मिली-जुली कतारों में नमाज़ पढ़ने की अनुमति दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि मस्जिद में प्रवेश करने के बाद व्यक्ति को मस्जिद के आंतरिक अनुशासन का पालन करना होता है।
सबरीमाला मामले की सुनवाई का गुरुवार को आठवां दिन था।
इस मामले की सुनवाई एक बेंच कर रही है, जिसमें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले और जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल हैं।

