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"यूपी पुलिस के अत्याचारों की कोई सीमा नहीं": BCI ने एटा में वकील पर हमले के मामले में CJI और CJ, इलाहाबाद हाईकोर्ट से दोषी के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश देने का अनुरोध किया

LiveLaw News Network
27 Dec 2020 5:57 AM GMT
यूपी पुलिस के अत्याचारों की कोई सीमा नहीं: BCI ने एटा में वकील पर हमले के मामले में CJI और CJ, इलाहाबाद हाईकोर्ट से दोषी के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश देने का अनुरोध किया
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कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश के एटा जिले में घटी घटना को गंभीरता से लेते हुए, बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर भारत के मुख्य न्यायाधीश और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से "तत्काल कदम" उठाने का अनुरोध किया है। विज्ञप्‍ति में दोषी पुलिस कर्मियों का पता लगाने और उत्तर प्रदेश सरकार को उन्हें तत्काल निलं‌‌बित करने, स्थानांतरित करने और उन्हें सेवा से हटाने के लिए निर्देश जारी करने का निर्देश देने का आग्रह किया गया है।

उल्‍लेखनीय है कि पुलिस ने एक घर का दरवाजा तोड़कर एक वकील (जो एडवोकेट की पोशाक में था) को घसीटा, घर के बाहर खींच लिया और उसके साथ बेरहमी से मारपीट की। इस घटना का वीडियो हाल ही में वायरल हुआ था।

यह कहते हुए कि "उत्तर प्रदेश पुलिस के ऐसे अत्याचारों की कोई सीमा नहीं है और इसने सभी हदें पार कर दी हैं", प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल, बिहार और लगभग सभी राज्यों में इसी तरह की घटनाओं को देखा गया है और "पुलिस की ऐसी कार्रवाई किसी भी कठोर अपराधी द्वारा किए गए अपराध से भी बदतर है।"

प्रेस विज्ञप्ति में आगे कहा गया है, "उत्तर प्रदेश की पुलिस का कृत्य चौंकाने वाला है, कानून और व्यवस्था के संरक्षकों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है। पुलिसकर्मियों की क्रूरता स्पष्ट रूप से दिखाती है कि वे किसी योजना के साथ काम कर रहे थे और उनका मकसद कुछ और था।"

सीजेआई और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सीजे द्वारा कार्रवाई करने का अनुरोध करते हुए बीसीआई ने यह भी कहा कि इसके अनुरोध पर उत्तर प्रदेश सरकार ने विचार नहीं किया है।

"इस तरह के अत्याचारों को बर्दाश्त नहीं कर सकते"

बीसीआई ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि यह "इस तरह के अत्याचारों को अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती है और अगर न्यायपालिका और सरकार वकीलों या आम आदमी पर भी इस तरह के अत्याचारों की अनदेखी करती रहीं तो बार के पास सड़कों पर आने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा।"

इसमें आगे कहा गया है कि परिषद ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर इस मामले में उचित कार्रवाई करने और देश के वकीलों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए तत्काल उपयुक्त कानून बनाने का भी संकल्प लिया है।

परिषद के अन्य प्रस्तावित कदम

-बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने संकल्प लिया है और कहा है कि पूरी कानूनी बिरादरी इस मुद्दे पर बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश और उत्तर प्रदेश के वकीलों के समर्थन में है।

-काउंसिल 3-4 दिनों के भीतर कार्रवाई की दिशा तय करने के लिए वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सभी स्टेट बार काउंसिल के प्रतिनिधियों की एक संयुक्त बैठक बुलाने जा रही है।

-संयुक्त बैठक में केंद्र और राज्य सरकारों की निष्क्रियता पर भी विचार किया जाएगा, जो महामारी के इन बुरे दिनों में वकीलों को कोई वित्तीय सहायता प्रदान करने में विफल रही हैं।

प्रेस रिलीज में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी, "वकीलों की मदद के लिए कुछ नहीं किया है और बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा दायर रिट और स्वतः संज्ञान मामला भी अभी तक लंबित है।"

प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है, "हम केवल जरूरतमंद वकीलों के लिए सरकार से कुछ ब्याज मुक्त या आसान किस्तों पर ऋण चाहते थे लेकिन सरकार यह भी नहीं कर रही है।"

न्यायालय की कार्यवाही के बारे में

प्रेस विज्ञप्ति में "अदालत की कार्यवाही की वर्चुअल सुनवाई की प्रणाली शुरू करने और फ‌िजिकल सुनवाई को गति देने की सरकार की मंशा पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है।"

"वर्चुअल हियरिंग की इस प्रणाली को स्थायी बनाने के नियम और प्रस्ताव को देश के अधिवक्ताओं द्वारा कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इस तरह का प्रस्ताव बहुत खतरनाक होगा और पूरी प्रणाली को कुछ चुनिंदा 'बड़े लॉ फर्मों और कुछ आशीर्वाद प्राप्त वकीलों की जेब में डालने/ देने को प्रेरित कर सकता है। भारतीय बार किसी भी कीमत पर इसे स्वीकार नहीं करने जा रहा है।' फिजिकल सुनवाई को बिना किसी देरी के पूरे देश में फिर से शुरू किया जाना चाहिए।"

विदेशी वकीलों और लॉ फर्म के बारे में

यह कहते हुए कि विदेशी कानून फर्मों को अनुमति देने के सरकार के प्रस्ताव को बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने कई मौकों पर खारिज किया है, और देश की सभी स्टेट बार काउंसिलों और बार काउंसिल ऑफ इंडिया यह कहती रही हैं कि यह भारतीय बार के हितों में नहीं है, प्रेस विज्ञप्ति संसद में इस मुद्दे को उठाने के कदम पर सवाल उठाती है।

इसे भारतीय बार के लिए गंभीर चिंता का विषय बताते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने कहा है कि "जब तक कि निचली अदालतों समेत सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वालो सभी वकीलों के हितों संरक्षित नहीं किया जाता है और भारतीय कानून फर्मों/वकीलों को बड़े देशों जैसे यूएसए, यूके, ऑस्ट्रेलिया और अन्य यूरोपीय देशों में, बिना किसी कठोर/ अव्यावाहारिक शर्तों के, पारस्परिक आधार पर, प्रैक्टिस करने और स्थापित करने की अनुमति नहीं दी जाती है ,भारतीय बार विदेशी वकीलों या लॉ फर्मों को यहां स्थापित करने की अनुमति नहीं देगा। "

इसके अलावा, प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि विदेशी वकीलों के प्रैक्टिस का क्षेत्र बहुत सीमित होना चाहिए, "ताकि सिविल, आपराधिक और अन्य कानूनों में भारतीय वकीलों की प्रैक्टिस प्रभावित न हो सके।

विज्ञप्‍ति में अंत में कहा गया है, "कुछ अप्रासंगिक देशों के वकील और लॉफर्म भारत में प्रैक्टिस के लिए आवेदन कर रहे हैं, जबकि भारतीय लॉ फर्म या वकीलों के लिए उन देशों में प्रैक्टिस करने की कोई गुंजाइश नहीं है। हमारे देश में हमारे वकीलों के बिना किसी लाभ के उनके वकीलों और फर्मों की एक बाढ़ आ जाएगी। "

स्टेट बार काउंसिल और हाई कोर्ट बार एसोसिएशनों के प्रतिनिधियों की संयुक्त बैठक आगामी सप्ताह में सभी मुद्दों पर विचार करेगी।

प्रेस रिलीज डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें


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