NIC ने किया कैदियों की समय से पहले रिहाई की प्रक्रिया के लिए 'E-Prison' सॉफ़्टवेयर लॉन्च: सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान
Shahadat
5 Jun 2026 8:08 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने 29 मई को उस मामले की कार्यवाही औपचारिक रूप से बंद की, जिसके कारण कैदियों की समय से पहले रिहाई के मामलों को प्रोसेस करने के लिए एक देशव्यापी डिजिटल सिस्टम बनाया गया था।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जेके माहेश्वरी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने गौर किया कि नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) ने अलग-अलग संबंधित पक्षों के साथ मिलकर "E-Prisons Early Release Processing Module" लॉन्च किया।
13 अप्रैल, 2026 को जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने देश भर में उम्रकैद की सज़ा काट रहे कैदियों की समय से पहले रिहाई के लिए ऑटोमेटेड और एक जैसा सिस्टम बनाने की मांग की थी और NIC के ज़रिए एक सॉफ़्टवेयर प्लेटफ़ॉर्म विकसित करने के लिए विस्तृत निर्देश जारी किए।
अपने हालिया आदेश में कोर्ट ने कहा कि इसे लागू करने की ज़िम्मेदारी जेल अधिकारियों और अन्य सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर स्टेट लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी को सौंपी गई। इसलिए कोर्ट ने कार्यवाही को औपचारिक रूप से बंद करना और अपील का निपटारा करना उचित समझा।
कोर्ट ने कहा,
"इसके बाद, और सभी संबंधित पक्षों के साथ मिलकर NIC ने 'E-Prisons Early Release Processing Module' नाम का सॉफ़्टवेयर लॉन्च किया। अब जब जेल विभाग और राज्य सरकार के अन्य संबंधित अधिकारियों के साथ मिलकर स्टेट लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी को ज़िम्मेदारी सौंप दी गई तो हम इस मामले में कार्यवाही बंद करने का औपचारिक आदेश देना उचित समझते हैं। इसी के अनुसार अपील का निपटारा किया जाता है।"
13 अप्रैल का फ़ैसला सुरेंद्र उर्फ सुंडा द्वारा हत्या के मामले में अपनी सज़ा और उम्रकैद के ख़िलाफ़ दायर अपील से जुड़ा था। हालांकि, कार्यवाही के दौरान, कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की जेलों में सज़ा में छूट और समय से पहले रिहाई के मामलों पर विचार करने में देरी से जुड़े व्यापक मुद्दों की भी जांच की।
कोर्ट ने पाया कि ऐसे योग्य कैदियों की एक बड़ी संख्या थी जिनके समय से पहले रिहाई के मामले प्रशासन के अलग-अलग स्तरों पर लंबित थे। यह देखते हुए कि कागज़ी फ़ाइलों पर निर्भरता देरी का कारण बन रही थी, कोर्ट ने प्रक्रिया को ऑटोमेट करने और योग्य कैदियों के मामलों पर समय पर विचार सुनिश्चित करने के लिए टेक्नोलॉजी-आधारित सिस्टम विकसित करने का निर्देश दिया।
उन निर्देशों के बाद NIC ने मौजूदा e-Prisons प्लेटफ़ॉर्म के भीतर E-Prisons Early Release Processing Module विकसित किया। यह सॉफ़्टवेयर ऐसे कैदियों की पहचान करने के लिए बनाया गया है, जो इसके लिए योग्य हैं। साथ ही यह उनके मामलों को डिजिटल रूप से प्रोसेस करने और उनमें होने वाली देरी पर नज़र रखने में भी मदद करता है।
मामले का निपटारा करते हुए कोर्ट ने एमिकस क्यूरी सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर और एडवोकेट रवि रघुनाथ की सेवाओं की सराहना की। कोर्ट ने कहा कि उनकी पहल की वजह से ही NIC ने आगरा की सेंट्रल जेल और लखनऊ की डिस्ट्रिक्ट जेल में इस प्रोजेक्ट को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया और इससे पूरे देश में इस सॉफ़्टवेयर को लॉन्च करने में मदद मिली।
Case Title – Surendra @ Sunda v. State of Uttar Pradesh

