'इच्छामृत्यु' के नाम पर 'आवारा कुत्तों को अंधाधुंध मारने' के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा NGO, कहा- कोर्ट के निर्देश को गलत समझा जा रहा है
Shahadat
24 May 2026 8:39 PM IST

एक NGO ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर यह स्पष्टीकरण मांगा कि कुत्तों को कुछ खास परिस्थितियों में 'इच्छामृत्यु' (Euthanasia) देने की अनुमति देने वाले उसके हालिया निर्देश को आवारा कुत्तों को अंधाधुंध मारने का आदेश नहीं माना जा सकता।
यह अर्जी NGO 'एनिमल्स आर पीपल टू' (Animals Are People Too) ने सुप्रीम कोर्ट में चल रही लंबित कार्यवाही के दौरान दाखिल की। NGO ने इस बात पर चिंता जताई कि कोर्ट के निर्देश की अधिकारी गलत व्याख्या कर रहे हैं, जिसका इस्तेमाल कुत्तों को गैर-कानूनी तरीके से मारने या हटाने को सही ठहराने के लिए किया जा रहा है।
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के "आवारा कुत्तों को खत्म करने" वाले सार्वजनिक बयानों और खालसा कॉलेज से कुत्तों को हटाने से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए अर्जी दाखिल करने वाले ने यह तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को गलत समझा जा रहा है और इसे कानून के विपरीत तरीके से लागू किया जा रहा है।
NGO ने कोर्ट से स्पष्टीकरण मांगा कि कुत्तों को इच्छामृत्यु केवल बहुत सीमित परिस्थितियों में ही दी जा सकती है। यह प्रक्रिया भी 'पशु जन्म नियंत्रण (ABC) नियम, 2023' के तहत निर्धारित नियमों का सख्ती से पालन करते हुए और योग्य विशेषज्ञों द्वारा उचित जांच-पड़ताल के बाद ही की जानी चाहिए। कोर्ट के पिछले निर्देश का मकसद कभी भी आवारा कुत्तों को बड़े पैमाने पर मारने या ज़हर देकर या अन्य तरीकों से गैर-कानूनी हत्या करने की अनुमति देना नहीं था।
इस अर्जी में सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशकों (DGP) को यह सुनिश्चित करने के निर्देश देने की भी मांग की गई कि कोर्ट के आदेश को लागू करने की आड़ में किसी भी कुत्ते को गैर-कानूनी तरीके से मारा न जाए, ज़हर न दिया जाए, या किसी भी तरह से नुकसान न पहुंचाया जाए।
अर्जी दाखिल करने वाले ने यह तर्क दिया कि ABC नियम, 2023 के तहत बनाए गए कानूनी ढांचे में कुत्तों को इच्छामृत्यु देने की अनुमति केवल कुछ सीमित मामलों में ही दी गई। वह भी निर्धारित सुरक्षा उपायों के अधीन। इस कानूनी ढांचे से किसी भी तरह का विचलन या भटकाव गैर-कानूनी माना जाएगा।
NGO ने यह भी कहा कि 'पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023' में "आक्रामक कुत्ते" की परिभाषा को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया। इससे ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है, जिसमें स्थानीय अधिकारी मनमाने ढंग से सामान्य आवारा कुत्तों को भी "आक्रामक" करार दे सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनकी गैर-कानूनी हत्याएं हो सकती हैं।
इसलिए यह मांग की गई कि कोर्ट यह स्पष्ट करे कि किसी भी कुत्ते को तब तक "आक्रामक" घोषित नहीं किया जा सकता, जब तक कि एक विधिवत गठित समिति द्वारा उसकी जांच और सिफारिश न की गई हो। इस समिति में एक योग्य सरकारी पशु चिकित्सक, किसी मान्यता प्राप्त पशु कल्याण संगठन/NGO का एक प्रतिनिधि, और संबंधित स्थानीय प्राधिकरण का प्रतिनिधि शामिल होना चाहिए।
19 मई को अपने हालिया आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त कानूनी प्रोटोकॉल के अनुसार, रेबीज़ से पीड़ित, लाइलाज रूप से बीमार और स्पष्ट रूप से खतरनाक/आक्रामक कुत्तों के लिए इच्छामृत्यु (Euthanasia) के इस्तेमाल की अनुमति दे दी।
कोर्ट ने आदेश दिया:
"जिन इलाकों में आवारा कुत्तों की आबादी खतरनाक हद तक बढ़ गई, और जहां कुत्तों के काटने या आक्रामक हमलों की घटनाएं आम हो गईं और जिनसे सार्वजनिक सुरक्षा को लगातार खतरा बना हुआ है, वहां संबंधित अधिकारी—योग्य पशु विशेषज्ञों द्वारा उचित मूल्यांकन के अधीन और 'पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960', 'पशु जन्म नियंत्रण नियम 2023' तथा अन्य लागू कानूनी प्रोटोकॉल के प्रावधानों का सख्ती से पालन करते हुए—ऐसे उपाय कर सकते हैं जो कानूनी रूप से अनुमेय हों। इन उपायों में रेबीज़ से पीड़ित, लाइलाज रूप से बीमार, या स्पष्ट रूप से खतरनाक/आक्रामक कुत्तों के मामलों में इच्छामृत्यु भी शामिल है ताकि मानव जीवन और सुरक्षा को होने वाले खतरे को प्रभावी ढंग से रोका जा सके।"
ये निर्देश जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ द्वारा आवारा कुत्तों के मुद्दे पर स्वतः संज्ञान (Suo Moto) लेते हुए चलाए जा रहे मामले में पारित किए गए। पीठ ने टिप्पणी की कि कुत्तों के काटने के मामलों की रिपोर्टें "बेहद परेशान करने वाली" हैं, खासकर बच्चों और बुजुर्गों के संबंध में। पीठ ने पिछले नवंबर में अधिकारियों को विभिन्न सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने के लिए दिए गए अपने पिछले निर्देशों में किसी भी तरह का संशोधन करने से इनकार किया।
पिछले साल, पीठ ने सड़कों पर कुत्तों को खाना खिलाने पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश पारित किए, सिवाय उन जगहों के जो विशेष रूप से कुत्तों को खाना खिलाने के लिए निर्धारित की गई हों।
'एनिमल्स आर पीपल टू' (Animals are People Too) की ओर से यह आवेदन एडवोकेट सुपांथा सिन्हा द्वारा तैयार किया गया और एडवोकेट आदित्य जैन द्वारा दायर किया गया।

