'आनंदमठ' के 'धार्मिक युद्ध गीत' से राष्ट्रीय गीत को बदला गया: सुप्रीम कोर्ट में पूर्व IAS अधिकारी की याचिका
Shahadat
23 Oct 2026 3:00 PM IST

एक पूर्व IAS अधिकारी ने केंद्र सरकार के 28 जनवरी और 9 जुलाई, 2026 के आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इन आदेशों में कुछ खास मौकों पर 'वंदे मातरम' के छह पदों (स्टैंजा) वाले संस्करण को गाने और बजाने के लिए कहा गया। उन्होंने तर्क दिया कि छह पदों वाले इस संस्करण को राष्ट्रीय गीत के रूप में लागू करना, भारत को एक 'धार्मिक-सांप्रदायिक ईश्वरवादी राज्य' में बदलने की कोशिश है।
यह याचिका केरल के पूर्व IAS अधिकारी बालकृष्णन सत्यभामा मावोजि ने दायर की, जो अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं। उन्होंने 'अनुपाथिका प्रतिनिधि प्रक्षोभ समिति' (APPS) के अध्यक्ष के रूप में यह याचिका दायर की। उनका कहना है कि एक व्यक्ति के तौर पर उन्हें अपनी आस्था और विश्वास चुनने का अधिकार है और सरकार किसी विशेष धार्मिक या ईश्वरवादी आस्था को उन हिस्सों के जरिए थोप नहीं सकती, जिनमें हिंदू देवी की स्तुति की गई।
याचिकाकर्ता खुद को अनुसूचित जाति समुदाय का हिंदू बताते हैं, लेकिन वे उन वैष्णव या शाक्त धार्मिक परंपराओं को नहीं मानते, जिनका जिक्र इस छह-पद वाले संस्करण में है। उनका तर्क है कि इस संस्करण को अनिवार्य रूप से गाने के लिए कहना, उन्हें ऐसे देवी-देवताओं और धार्मिक सिद्धांतों के सामने नतमस्तक होने के लिए मजबूर करने जैसा है, जिन्हें वे नहीं मानते।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इन आदेशों के जरिए 'वंदे मातरम' के उस दो-पद वाले संस्करण को हटा दिया गया, जो आजादी के बाद से ही राष्ट्रीय गीत के रूप में इस्तेमाल होता आ रहा है। इसकी जगह 'आनंदमठ' के छह-पद वाले संस्करण को लाया गया। उनका तर्क है कि इसमें स्पष्ट रूप से वैष्णव और शाक्त धार्मिक संदर्भ हैं और नागरिकों को इसे गाने के लिए मजबूर करना उनके 'अंतरात्मा की स्वतंत्रता' और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता ने बताया कि 'वंदे मातरम' के रूप में जाने जाने वाले दो-पद वाले संस्करण को बंकिम चटर्जी ने लिखा था। यह बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास 'आनंदमठ' से अलग है, जिसे इन दो पदों के लिखे जाने के बाद रचा गया।
याचिकाकर्ता ने कहा कि छह पदों वाली यह कविता "धार्मिक युद्ध गीत" है, जिसमें हिंदू लड़ाके मुसलमानों पर जीत के लिए देवी दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी—तथा देवी के रूप में देश—की वैष्णव और शाक्त परंपराओं के अनुसार प्रार्थना करते हैं। वहीं दूसरी ओर, दो पदों वाला संस्करण 'माँ धरती' की सुंदरता का वर्णन करता है, जिसे पिछले 79 वर्षों से भारतीय लोग गाते और पूजते आ रहे हैं।
उन्होंने तर्क दिया कि एक युद्ध गीत को थोपने से भारत में अल्पसंख्यकों की धार्मिक और आध्यात्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचेगी, जिससे यहाँ "सांप्रदायिक विभाजन" और संघर्ष और गहरा हो जाएगा।
आगे कहा गया,
"इन आदेशों का एक स्पष्ट परिणाम यह होगा कि इससे भारत में अल्पसंख्यकों की धार्मिक और आध्यात्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचेगी, जिससे सांप्रदायिक विभाजन और संघर्ष और गहरा हो जाएगा। इससे प्रमुख समुदायों के वर्चस्व को बढ़ावा मिलेगा, जिससे विभिन्न समुदायों के बीच दुश्मनी और टकराव बढ़ेगा। साथ ही हिंदुओं और मुसलमानों के बीच ऐसी दुश्मनी पैदा होगी, जिससे हमारे देश की एकता, एकजुटता और सद्भाव हमेशा के लिए खंडित हो जाएंगे। ये आदेश हमारे संविधान के मूल ढांचे—बंधुत्व और धर्मनिरपेक्षता—पर सीधा प्रहार हैं।"
उन्होंने इन दो आदेशों को 'अधिकार क्षेत्र से बाहर' (अल्ट्रा वायर्स) बताते हुए चुनौती दी। उनका कहना है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और (b) तथा अनुच्छेद 21, 23(1), 25(1), 28(3) और 29(2) का उल्लंघन किया।
याचिका में कहा गया,
"'आनंदमठ' एक ऐसा उपन्यास है, जिसमें हिंदू संन्यासी मुसलमानों के खिलाफ एक पवित्र धार्मिक युद्ध छेड़ते हैं, जिसमें मुसलमानों को हिंसक तरीके से मारा और नष्ट किया जाता है। इस पवित्र युद्ध में अंततः हिंदू अंग्रेजों का समर्थन मांगते हैं। जैसा कि इस याचिका में आगे बताया गया, कुल मिलाकर 'आनंदमठ' मुसलमानों के खिलाफ हिंसक और नफरत भरी बातों से भरा हुआ है।"
राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं ने 6 पदों वाले संस्करण को अपनाने का विरोध किया था।
याचिकाकर्ता ने उस घटना का जिक्र किया, जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने रवींद्रनाथ टैगोर से सलाह मांगी कि क्या 'वंदे मातरम' का उपयोग राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन को दर्शाने के लिए किया जा सकता है। कहा जाता है कि टैगोर ने पहले दो पदों को तो स्वीकार कर लिया था, लेकिन बाद के पदों में व्यक्त भावनाओं से वे सहमत नहीं हो सके।
"आनंदमठ के 'धार्मिक युद्ध गीत' के पहले दो पदों (जिन्हें बंकिम चंद्र चटर्जी ने आनंदमठ से पहले लिखा था और जिनमें न तो धार्मिक युद्ध का भाव है, न ही मूर्तिपूजा या धार्मिक युद्ध का कोई उल्लेख है) और 'वंदे मातरम' के बाकी हिस्सों (पद 3-6, जिन्हें आनंदमठ के मुख्य विषय—धार्मिक युद्ध—के संदर्भ में लिखा गया और जिनमें मूर्तिपूजा शामिल है) के बीच टैगोर द्वारा किया गया यह अंतर, 1937 में कांग्रेस कार्य समिति द्वारा व्यापक रूप से स्वीकार और आधिकारिक तौर पर अनुमोदित किया गया। टैगोर के इस सुझाव पर कोई आपत्ति नहीं जताई गई कि केवल आनंदमठ से बाहर के पहले दो पदों को ही रखा जाए।"
उन्होंने बताया कि 'वंदे मातरम' के उस हिस्से को, जो 'आनंदमठ' से नहीं है, 'आनंदमठ' वाले हिस्से से अलग करने के टैगोर के फॉर्मूले पर संविधान सभा में कोई सवाल नहीं उठाया गया। साथ ही संविधान सभा के रिकॉर्ड में ऐसी कोई मांग भी नहीं मिलती है कि 'आनंदमठ' में मौजूद 'धार्मिक युद्ध गीत' के बाकी 4 पदों (स्टैंजा) को भी बजाया या गाया जाना चाहिए।
2026 के आदेश ने आधिकारिक संस्करण को पूरी तरह से बदल दिया।
याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि 1947 से लेकर 2026 में इन विवादित आदेशों के जारी होने तक 'वंदे मातरम' के दो पदों को बजाने और गाने की परंपरा बिना किसी विरोध के चलती रही। हालांकि, इस दौरान संसद या केंद्र सरकार ने 'वंदे मातरम' को 'राष्ट्रीय गीत' का दर्जा देने का कोई आधिकारिक फैसला नहीं लिया था।
उनका दावा है कि गीत के आधिकारिक संस्करण को बजाने और गाने के निर्देश देने के नाम पर इन विवादित आदेशों ने अवैध रूप से उस दो-पद वाले मौजूदा संस्करण को खत्म कर दिया।
याचिका में कहा गया कि ये विवादित आदेश संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a) और (b), 21, 25(1) तथा 28(3) का उल्लंघन करते हैं। इसके अलावा, ये आदेश धर्मनिरपेक्षता और बंधुत्व के संवैधानिक सिद्धांतों के भी खिलाफ हैं।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि 'वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' में यह अधिकार भी शामिल है कि कोई व्यक्ति अपनी अंतरात्मा के खिलाफ जाकर कुछ न बोले या न गाए। उन्होंने अनुच्छेद 25(1) के तहत 'अंतरात्मा की स्वतंत्रता' और किसी धर्म को मानने या न मानने के अधिकार का भी हवाला दिया।
याचिका में 28 जनवरी और 9 जुलाई के आदेशों को रद्द करने के लिए 'रिट ऑफ सर्टिओरारी' (अदालती आदेश) की मांग की गई।
इसके साथ ही इसमें 'रिट ऑफ मैंडमस' (निर्देश) की भी मांग की गई ताकि केंद्र सरकार को यह निर्देश दिया जा सके कि वह राजकीय, औपचारिक, सरकारी या शैक्षणिक कार्यक्रमों में 'आनंदमठ' वाले छह-पद के संस्करण को बजाने या गाने के लिए किसी को मजबूर न करे। साथ ही, यदि कोई व्यक्ति इसे गाने से मना कर दे या सम्मानपूर्वक इसमें शामिल न हो, तो उसे कोई अपराध या 'राष्ट्रीय गीत' का अपमान न माना जाए। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने यह घोषणा करने की मांग की है कि केवल दो पदों वाले संस्करण को ही 'राष्ट्रीय गीत' के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए और गाया जाना चाहिए। साथ ही, किसी भी नागरिक, संस्था, स्कूल या प्राधिकरण को राष्ट्रीय गीत गाने या बजाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, और ऐसा न करने पर उन्हें दंडित भी नहीं किया जाना चाहिए।
इससे पहले, कर्नाटक संगीतकार टी.एम. कृष्णा द्वारा दायर एक ऐसी ही याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा था कि जो लोग धार्मिक या अन्य कारणों से यह गीत नहीं गाते हैं, उन्हें दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
इससे पहले, अनुसूचित जाति के एक बौद्ध नेता ने भी ऐसी ही मांग के साथ अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
Case Title : BALAKRISHNAN SATHYABHAMA MAVOJI v UNION OF INDIA & ANR

