मुंबई स्पेशल कोर्ट ने ED के महाराष्ट्र सदन घोटाले मामले में पूर्व राज्य PWD मंत्री छगन भुजबल को बरी किया
Shahadat
23 Jan 2026 7:58 PM IST

मुंबई में प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत मामलों की सुनवाई के लिए बनी स्पेशल कोर्ट ने शुक्रवार को NCP के सीनियर नेता छगन भुजबल, उनके बेटे पंकज और भतीजे समीर को प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा उनके खिलाफ दर्ज महाराष्ट्र सदन घोटाले मामले में बरी कर दिया।
मामले की अध्यक्षता कर रहे स्पेशल जज सत्यनारायण नवंदर ने भुजबल परिवार को बरी करने का आदेश सुनाया।
इस बात की पुष्टि करते हुए भुजबल का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील शलभ सक्सेना ने कहा,
"हां, मेरे क्लाइंट्स को ED मामले में बरी कर दिया गया। आदेश आने के बाद कारण पता चलेंगे। लेकिन मुख्य रूप से यह तर्क कि जब उन्हें ACB मामले में बरी कर दिया गया तो यह मामला भी खत्म होना चाहिए, कोर्ट ने इस पर विचार किया।"
गौरतलब है कि भुजबल अभी येओला विधानसभा से मौजूदा विधायक और राज्य के खाद्य मंत्री हैं। उसको 14 मार्च, 2016 को PMLA की धारा 3 के साथ धारा 4 के तहत मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों के बाद गिरफ्तार किया गया।
उनकी गिरफ्तारी महाराष्ट्र के लोक निर्माण विभाग (PWD) मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान दिल्ली में महाराष्ट्र सदन और मुंबई यूनिवर्सिटी में कलिना लाइब्रेरी के निर्माण के लिए ठेके देने में कथित अनियमितताओं से जुड़ी थी।
2014 में आम आदमी पार्टी द्वारा दायर जनहित याचिका के कारण एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन हुआ था।
भुजबल पर IPC की धारा 420, 471, 120B के साथ 34 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(A), 13(1)(D), 13(2) के तहत दो FIR दर्ज की गई और IPC की धारा 420, 120B, 109, 465, 468, 471 के साथ 34 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(C), 13(1)(D) और 13(1) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए मामला दर्ज किया गया। एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) ने एक चार्जशीट दायर की, जिसमें आरोप लगाया गया कि भुजबल और उनके परिवार ने लगभग 900 करोड़ रुपये का मनी लॉन्ड्रिंग किया। इसी मामले के आधार पर उनके खिलाफ PMLA के तहत मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया गया।
सितंबर, 2021 में एक स्पेशल कोर्ट ने ACB द्वारा जांच किए गए महाराष्ट्र सदन घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में भुजबल, उनके बेटे और अन्य लोगों को बरी कर दिया। कोर्ट को भुजबल से जुड़ी किसी साजिश या अवैध पैसों के लेन-देन का कोई शुरुआती सबूत नहीं मिला। भुजबल ने तर्क दिया कि कॉन्ट्रैक्ट देने के फैसले सामूहिक रूप से लिए गए और रिश्वत के आरोप सबूतों से साबित नहीं होते हैं।

