एमपी धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम: सुप्रीम कोर्ट ने परिवार को धर्म बदलने के लिए मजबूर करने के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाई
Shahadat
9 July 2026 5:23 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ऐसे व्यक्ति के खिलाफ आगे की आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाई, जो हिंदू धर्म का पालन करने वाला बताया जाता है और जिस पर मध्य प्रदेश में एक परिवार को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर करने का आरोप है।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने यह आदेश दिया और साथ ही उस व्यक्ति की याचिका पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें एमपी धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 3 और 5 और IPC की धारा 506 के तहत दर्ज FIR रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।
FIR के अनुसार, शिकायतकर्ता के पति ने याचिकाकर्ता की सलाह पर 8 साल पहले इस्लाम अपना लिया था। पिछले डेढ़ साल से उस महिला पर भी उसी धर्म को अपनाने के लिए दबाव डाला जा रहा है। बताया गया कि एक बार याचिकाकर्ता ने उसे इस्लाम अपनाने का सुझाव भी दिया था।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि FIR दर्ज करने में 8 साल की देरी हुई, क्योंकि शिकायतकर्ता के पति ने 8 साल पहले ही इस्लाम अपना लिया था। उन्होंने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता और उसका परिवार हिंदू धर्म का पालन करते हैं।
इन दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने नोटिस जारी किया और याचिकाकर्ता के खिलाफ आगे की आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाई।
बता दें, शुरू में याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया था और दावा किया था कि उसे कथित अपराध से जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं है। यह तर्क दिया गया कि आरोपों से केवल यह पता चलता है कि उसने शिकायतकर्ता के पति को इस्लाम अपनाने के लिए प्रेरित किया, लेकिन शिकायतकर्ता या उसके नाबालिग बेटे के धर्म परिवर्तन में उसकी सीधी भागीदारी का कोई सबूत नहीं था। याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि FIR में लगाई गई धाराएं बिना किसी ठोस आधार के लगाई गईं और मामले में प्रथम दृष्टया कोई दम नहीं था।
राज्य ने याचिका का विरोध किया और जांच के दौरान दर्ज बयानों का हवाला दिया, जिसमें शिकायतकर्ता के नाबालिग बेटे का बयान भी शामिल था, जिसने याचिकाकर्ता को दोषी ठहराया था। यह तर्क दिया गया कि जांच पूरी हो चुकी है और आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूतों के आधार पर चार्जशीट दाखिल की गई।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता को कथित अपराध से जोड़ने वाले प्रथम दृष्टया सबूत मौजूद हैं। कोर्ट ने गौर किया कि शिकायतकर्ता और उसके नाबालिग बेटे के बयानों में विशेष रूप से शिकायतकर्ता के परिवार पर दबाव डालने में याचिकाकर्ता की भूमिका का उल्लेख किया गया। कोर्ट ने 'नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट्स को चेतावनी दी कि वे CrPC की धारा 482 और/या भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत केस रद्द करने की याचिकाओं पर विचार करते समय ऐसे आदेश न दें जिनमें जांच पूरी होने और फाइनल रिपोर्ट दाखिल होने तक गिरफ्तारी न करने या "कोई सख्त कार्रवाई न करने" की बात कही गई हो।
इन गाइडलाइंस का पालन करते हुए कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि याचिकाकर्ता की भूमिका की जांच ट्रायल के दौरान ठोस सबूतों के आधार पर की जानी चाहिए। यह कहा गया कि याचिकाकर्ता को अभियोजन पक्ष के गवाहों से जिरह करने और अपना बचाव पेश करने का मौका मिलेगा। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि कार्यवाही को रद्द करना जल्दबाजी होगी। इसलिए याचिका खारिज कर दी गई। इससे असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
Case Title: Hemraj Tailor v. State of Madhya Pradesh and Another, SLP(Crl) No. 12057/2026


