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मोटर वाहन अधिनियम - किराया समझौते में तीसरे पक्ष के बीमा को वाहन पर प्रभावी नियंत्रण के साथ स्थानांतरित किया गया, माना जाता है: सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
22 July 2021 5:06 AM GMT
मोटर वाहन अधिनियम - किराया समझौते में तीसरे पक्ष के बीमा को वाहन पर प्रभावी नियंत्रण के साथ स्थानांतरित किया गया, माना जाता है: सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही के एक फैसले में दोहराया है कि जब एक परिवहन निगम एक पंजीकृत मालिक से एक मोटर वाहन अपने उपयोग के ‌लिए किराए पर लेता है, तो तीसरे पक्ष के बीमा कवरेज को भी वाहन के साथ स्थानांतरित किया जाएगा।

वह व्यक्ति, जो वाहन पर प्रभावी नियंत्रण रखता है और आदेश देता है, उसे 'मालिक' माना जाएगा। इसलिए, यह माना जाना चाहिए कि वाहन के साथ मौजूदा बीमा पॉलिसी भी किराए की अवधि के लिए हस्तांतरित हुई है, जैसा कि सहमति हुई है।

उत्तर प्रदेश राज्य सड़क निगम बनाम कुसुम और अन्य में 2011 में तय सिद्धांत के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को उलट दिया।

जस्टिस एस अब्दुल नसीर और कृष्णा मुरारी की डिवीजन बेंच इस मुद्दे पर फैसला कर रहा थी कि - यदि एक बीमाकृत वाहन निगम के पक्ष में दी गई परमिट के अनुसार, निगम के साथ समझौते के के तहत एक रास्ते पर चलाया जा रहा है, और उस अवधि में हुई दुर्घटना के मामले में क्या बीमा कंपनी मुआवजे का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगी या निगम या यह मालिक की जिम्मेदारी होगी।

पृष्ठभूमि

उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (निगम) ने एक बस किराए पर ली थी, जो एक घातक दुर्घटना का ‌शिकार हुई, परिणामस्वरूप एक व्यक्ति की मौत हो गई। मृतक के कानूनी वारिस ने मोटर दुर्घटना के दावा ट्रिब्यूनल, बहराइच, उत्तर प्रदेश के समक्ष दावा याचिका को दायर की। निगम ने लिखित बयान को निगम और बस मालिक के बीच हुए समझौते और बीमा कंपनी के साथ बस के बीमा के तथ्यों को रिकॉर्ड पर पेश किया।

बीमा कंपनी ने अपने जवाब में प्रासंगिक अवधि में उक्त बस के संबंध में बीमा पॉलिसी के अस्तित्व को स्वीकार की। ट्रिब्यूनल ने बीमा कंपनी को प्रति वर्ष 6% की दर से ब्याज के साथ 1,82,000/ रुपये मुआवजे का भुगतान करने के निर्देश दिया।

बीमा कंपनी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य रूप से इस बात पर अपील दायर की कि ट्रिब्यूनल द्वारा निर्देश‌ित मुआवजे का भुगतान करने के लिए वह उत्तरदायी नहीं है क्योंकि जब दुर्घटना हुई थी तो निगम बस का संचालन कर रहा था। कंपनी ने तर्क दिया कि वास्तव में निगम अवॉर्ड को पूरा करने के लिए उत्तरदायी है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि बीमा कंपनियां निगम के नियंत्रण में संचालित होने वाली घटनाओं में तीसरे पक्ष को मुआवजे का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। उसके बाद, निगम ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

परिणाम

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले निगम की देयता के पक्ष में उलट दिया। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य सड़क निगम बनाम कुसुम और अन्य (2011) में अपने पहले के फैसले पर काफी हद तक भरोसा किया गया, जिसमें यह कहा गया था कि प्रभावी नियंत्रण और कमांड स्वामित्व का वास्तविक परीक्षण है। एक किराया समझौते के तहत, बीमा पॉलिसी भी वाहन के साथ स्थानांतरित मानी जाती है।

कोर्ट ने कहा, "यदि निगम विशिष्ट अवधि के लिए भी मालिक बन गया है और वाहन को मूल मालिक के कहने पर बीमाकृत किया गया है, तो यह समझा जाएगा कि वाहन को निगम और बीमा पॉलिसी के साथ स्थानांतरित कर दिया गया है। इस प्रकार बीमा कपंनी मुआवजे की राशि का भुगतान करने की अपनी देयता से बचने में सक्षम नहीं होगी"।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने '2011 के फैसले में भी टिप्पणी की थी कि वाहन का अनिवार्य बीमा तीसरे पक्ष को लाभान्वित करने के लिए है। अनिवार्य बीमा के लिए मालिक की देयता केवल तृतीय पक्ष के संबध में है, न कि संपत्ति के लिए। इसलिए, वाहन बीमा करने के बाद, मालिक और कोई अन्य व्यक्ति, मालिक सहमति के साथ वाहन का उपयोग कर सकता है। अधिनियम की धारा 146 यह नहीं कहती है कि किसी भी व्यक्ति को, जो वाहन का उपयोग स्वतंत्र रूप से करता है, उसे एक अलग बीमा पॉलिसी लेनी चाहिए।

अदालत ने कहा कि अधिनियम में अनिवार्य बीमा का उद्देश्य सामाजिक न्याय को बढ़ाना है। इसलिए, 2011 के फैसले पर भरोसा करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल मामले में बीमा कंपनी पर देयता को निर्धारित किया। इसने बीमा कंपनी को उपरोक्त मुआवजे की राशि पर प्रति वर्ष 6% की दर से जमा करने की तारीख तक ब्याज देने का निर्देश दिया।

केस: उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम बनाम राष्ट्रीय बीमा कंपनी लिमिटेड और अन्य।

उद्धरण: एलएल 2021 एससी 313

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