मासिक धर्म स्वच्छता मौलिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने निर्देशों को लागू न करने पर राज्यों को अवमानना की चेतावनी दी
Shahadat
15 Oct 2026 7:45 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस बात पर नाराजगी जताई कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता (Menstrual Hygiene) सुविधाएं सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार के निर्देशों को लागू करने के संबंध में कोई जवाब नहीं दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में मासिक धर्म स्वच्छता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना है।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर संबंधित राज्यों के मुख्य सचिव अगली सुनवाई से पहले जरूरी जानकारी नहीं देते हैं तो उनके खिलाफ अवमानना (Contempt) का नोटिस जारी किया जा सकता है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के साथ इस मुद्दे को गंभीरता से उठाए और उनसे लिखित जानकारी मांगे कि फैसले को लागू करने के लिए क्या कदम उठाए गए।
कोर्ट ने कहा कि भले ही उसने मासिक धर्म स्वच्छता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'जीवन के मौलिक अधिकार' का एक हिस्सा घोषित किया, लेकिन अगर इन निर्देशों को लागू नहीं किया गया तो यह फैसला केवल "कागज पर ही" सिमट कर रह जाएगा।
कोर्ट ने कहा,
"हमें यकीन है कि केंद्र सरकार और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को हमारे उस फैसले का महत्व समझ आ गया होगा, जिसमें हमने मासिक धर्म स्वच्छता को मौलिक अधिकार का हिस्सा घोषित किया। दूसरे शब्दों में, हमने मासिक धर्म स्वच्छता/स्वास्थ्य को संविधान के अनुच्छेद 21 का एक अहम पहलू माना है। अगर हमारे फैसले की बातें सिर्फ कागज पर ही रह जाती हैं तो केंद्र और राज्य/केंद्र शासित प्रदेश इस मौलिक अधिकार को कैसे लागू करेंगे?"
जनवरी में दिए गए अपने फैसले में कोर्ट ने केंद्र सरकार की 'स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति' को पूरे देश में कक्षा 6 से 12 तक के छात्रों के लिए लागू करने का निर्देश दिया। इन निर्देशों में शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों के सरकारी और निजी स्कूल शामिल है।
अन्य उपायों के साथ-साथ कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वे स्कूलों में लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय (Functional Gender-Segregated Toilets) सुनिश्चित करें, जिनमें पानी की सुविधा हो। साथ ही साबुन और पानी के साथ हाथ धोने की व्यवस्था हो और सैनिटरी नैपकिन आसानी से उपलब्ध हों।
कोर्ट ने स्कूलों को 'मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन कॉर्नर' (Menstrual Hygiene Management Corners) बनाने का भी निर्देश दिया, जहां आपातकालीन स्थिति के लिए अतिरिक्त इनरवियर, यूनिफॉर्म, डिस्पोजेबल पैड और अन्य जरूरी सामान मौजूद हों।
कोर्ट के 1 सितंबर के आदेश के अनुसार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 30 जनवरी के फैसले को लागू करने में आई कमियों के बारे में रिपोर्ट देनी थी। हालांकि, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ इस मुद्दे पर गंभीरता से बात की है, लेकिन अभी तक उनकी ओर से केंद्र को कोई जवाब नहीं मिला है।
कोर्ट ने कहा,
"हमें यह समझ नहीं आ रहा है कि जब केंद्र सरकार जरूरी जानकारी मांगती है तो राज्य और केंद्र शासित प्रदेश जवाब क्यों नहीं देते?"
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जनवरी का फैसला उन लड़कियों की समस्या को हल करने के लिए था, जो मासिक धर्म (पीरियड्स) से जुड़ी दिक्कतों के कारण अपनी पढ़ाई छोड़ देती हैं।
कोर्ट ने कहा,
"हमने जो कुछ भी किया, वह उन युवा लड़कियों के हित में किया, जो अपनी पढ़ाई छोड़ रही हैं। खासकर देश के दूर-दराज के इलाकों में, जहां मासिक धर्म स्वच्छता (मेंस्ट्रुअल हाइजीन) जैसी समस्याओं के कारण लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं।"
कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह फैसले को फिर से पढ़े और इसे लागू करने के हर पहलू पर जानकारी जुटाए। इसमें 1 सितंबर के आदेश के पैराग्राफ 11 और 13 से 23 तक के हिस्सों पर विशेष ध्यान देने को कहा गया।
इन पैराग्राफ में कोर्ट ने जेंडर-आधारित शौचालयों, हाथ धोने की सुविधाओं, सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनों और कचरा निपटान प्रणालियों के डेटा में विसंगतियों (कमियों) की ओर इशारा किया। साथ ही यह सवाल भी उठाया कि क्या केंद्र सरकार ने राज्यों द्वारा दी गई जानकारी की ठीक से जांच की।
कोर्ट ने शौचालयों के रखरखाव और सफाई कर्मचारियों से जुड़ी कमियों को दूर करने की जरूरत पर भी जोर दिया। साथ ही जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे शिक्षकों की टीमें बनाएं, जो स्कूलों का औचक निरीक्षण (सरप्राइज इंस्पेक्शन) करें। कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से यह भी कहा कि वे अपनी अनुपालन रिपोर्ट (कंप्लायंस रिपोर्ट) में केवल अपनी उपलब्धियों को न गिनाएं, बल्कि उन कमियों पर ध्यान दें जो अभी भी मौजूद हैं, उनके कारण क्या हैं और उन्हें दूर करने में कितना समय लगेगा। इसके अलावा, कोर्ट ने बायोडिग्रेडेबल, बायो-कंपैटिबल और कंपोस्टेबल सैनिटरी नैपकिन की ओर धीरे-धीरे बढ़ने का सुझाव भी दिया।
अपने ताजा आदेश में कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह एक प्रश्नावली (सवाल-सूची) तैयार करे, ताकि हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश से सही जवाब मिल सकें।
कोर्ट ने राज्यों को "एक आखिरी मौका" देते हुए चेतावनी दी,
"सुनवाई की अगली तारीख पर अगर केंद्र सरकार से हमें यह पता चलता है कि कुछ राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने कोई जवाब नहीं दिया तो हम संबंधित राज्य(राज्यों) के मुख्य सचिव को अवमानना का नोटिस जारी करने की कार्रवाई करेंगे।"
इस मामले में अगली सुनवाई 14 दिसंबर को दोपहर 2:30 बजे होगी।
Case Title : Dr Jaya Thakur v. Government of India and Ors.

