'भारत में मेडिकल सुविधाएं किसी भी विदेशी देश के बराबर': सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को इलाज के लिए USA जाने से रोका
Shahadat
6 Jun 2026 10:13 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक आरोपी को विदेश यात्रा की अनुमति देने से इनकार किया, जो USA में अपनी बीमारी का इलाज कराना चाहता था। कोर्ट ने कहा कि उसकी बीमारी का इलाज भारत में उपलब्ध मेडिकल सुविधाओं से हो सकता है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने तेलंगाना हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें आरोपी (प्रतिवादी नंबर 2) को अपनी बीमारी के इलाज के लिए USA जाने की अनुमति दी गई थी।
कोर्ट ने पाया कि आरोपी पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा चल रहा है और उसकी बीमारी का इलाज भारत में ही ठीक से हो सकता है, इसलिए विदेश यात्रा की अनुमति नहीं दी गई। कोर्ट आरोपी के इस तर्क से सहमत नहीं था कि उसने जांच के दौरान ट्रायल कोर्ट और पुलिस का सहयोग किया। साथ ही कोर्ट हाईकोर्ट के इस तर्क से भी सहमत नहीं था कि मजिस्ट्रेट के सामने 12 बार पेश होने के आधार पर उसे विदेश यात्रा की अनुमति दी जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"प्रतिवादी नंबर 2 के 'मेडिकल इलाज की ज़रूरत' और 'मजिस्ट्रेट कोर्ट में पिछली 12 बार पेश होने' के साथ-साथ 6 (छह) महीने के भीतर भारत लौटने के उसके वादे को हाईकोर्ट ने अपने रिविजनल अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए दखल देने के लिए पर्याप्त कारण माना। FIR दर्ज होने के बाद से कार्यवाही के घटनाक्रम, प्रतिवादी नंबर 2 के व्यवहार, उसकी बीमारी की प्रकृति और भारत में उपलब्ध मेडिकल सुविधाओं (जो हमें लगता है कि किसी भी विदेशी देश में उपलब्ध सुविधाओं के बराबर हैं) को ध्यान में रखते हुए हमें कोई संदेह नहीं कि हाईकोर्ट ने न्यायिक संयम बरतने के बजाय प्रतिवादी नंबर 2 के प्रति नरमी दिखाई और उसे USA जाने की अनुमति दे दी, जबकि सभी मेडिकल सुविधाएं देश में ही मौजूद हैं।"
मामले की पृष्ठभूमि
शुरू में, मजिस्ट्रेट ने आरोपी को उसका जमा किया हुआ पासपोर्ट वापस कर दिया। हालांकि, मजिस्ट्रेट ने निर्देश दिया कि वह सक्षम कोर्ट से अनुमति लिए बिना भारत नहीं छोड़ सकता।
इससे असंतुष्ट होकर राज्य ने सेशन कोर्ट में एक रिविजन याचिका दायर की।
सेशन कोर्ट ने मजिस्ट्रेट का आदेश पलट दिया और मामले के लंबे समय से लंबित होने को ध्यान में रखते हुए प्रतिवादी नंबर 2 को अपना पासपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया। सेशन कोर्ट ने पासपोर्ट अधिकारियों को यह भी सुझाव दिया कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के प्रावधानों के अनुसार प्रतिवादी नंबर 2 की आवाजाही पर रोक लगाई जाए।
इस आदेश को चुनौती देते हुए प्रतिवादी नंबर 2 ने हाईकोर्ट में रिविज़न याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने अपने रिविज़न अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए सेशन कोर्ट का आदेश रद्द किया और ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश को बहाल कर दिया।
इसके अलावा, हाईकोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ केस के कमिटल (ट्रायल के लिए आगे भेजे जाने) के बाद प्रतिवादी नंबर 2 को USA जाने की अनुमति भी दी। हाईकोर्ट ने यह फैसला इसलिए लिया, क्योंकि प्रतिवादी नंबर 2 पहले 12 बार मजिस्ट्रेट के सामने पेश हो चुका था और उसे USA में मेडिकल इलाज की ज़रूरत थी।
हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर शिकायतकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
फैसला
विवादित आदेश रद्द करते हुए जस्टिस दत्ता द्वारा लिखे गए फैसले में आरोपी की इस दलील को खारिज किया कि पासपोर्ट जमा करने या विदेश यात्रा के लिए कोर्ट से पहले अनुमति लेने की शर्त लगाना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा।
कोर्ट ने राजेश रंजन यादव बनाम CBI, (2007) 1 SCC 70 का हवाला देते हुए कहा,
"हालांकि अनुच्छेद 21 निस्संदेह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की गारंटी देता है, जिसमें विदेश यात्रा का अधिकार भी शामिल है, लेकिन इस अधिकार को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता। एक तरफ प्रतिवादी नंबर 2 की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और दूसरी तरफ अपीलकर्ता के त्वरित सुनवाई के अधिकार और आपराधिक न्याय के प्रभावी प्रशासन को सुनिश्चित करने में व्यापक सामाजिक हित के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है।"
इसके अनुसार, अपील स्वीकार की गई, जिससे मजिस्ट्रेट का आदेश फिर से लागू हो गया।
Cause Title: SEESA SANTOSH VERSUS THE STATE OF TELANGANA AND ANR.

