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विवाहित जोड़े को सुरक्षा से सिर्फ इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि उनका विवाह शून्य या अमान्य है, पढ़िए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला

LiveLaw News Network
13 Oct 2019 2:18 PM GMT
विवाहित जोड़े को सुरक्षा से सिर्फ इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि उनका विवाह शून्य या अमान्य है, पढ़िए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला
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पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक विवाहित जोड़े के मामले में देखा कि भले ही वह अमान्य या शून्य विवाह हो या किसी भी विवाह के न होने का मामला हो, किसी व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा के मौलिक अधिकार से उसे वंचित नहीं किया जा सकता।

एक 'फरार' दंपती ने शादी करने का दावा करते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और पुलिस सुरक्षा की मांग की। इस जोड़े ने यह आरोप लगाया कि लड़की के माता-पिता ने उन्हें धमकी दी कि वे उन्हें पति-पत्नी के रूप में नहीं रहने देंगे और मौका मिलने पर वे दोनों को मार देंगे।

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मामले पर विचार करते समय अदालत ने देखा कि लड़के की उम्र विवाह योग्य नहीं है। जस्टिस अरुण मोंगा ने कहा कि इस तथ्य के कारण कि लड़के की उम्र विवाह योग्य नहीं है, वह अपने मौलिक अधिकार से वंचित नहीं होगा, जैसा कि भारत के संविधान से स्पष्ट है।

अदालत ने देखा कि हिंदू विवाह अधिनियम की एक आवश्यक शर्त यह है कि दूल्हा 21 वर्ष से अधिक और दुल्हन 18 वर्ष से अधिक की आयु की होनी चाहिए। हालांकि, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11, जो कुछ विवाह की घोषणा करती है, जो कि धारा 5 के उल्लंघन में हैं, शून्य हैं, लेकिन धारा 5 की उपधारा (iii) के उल्लंघन में विवाह को शून्य या अमान्य माने जाने के दायरे से रोक दिया जाता है।

अदालत ने पुलिस को धमकी के मामले को देखने के निर्देश देते हुए कहा कि अगर धमकी मिलने की बात में सच्चाई है तो पुलिस प्रेमी युगल के जीवन और स्वतंत्रता के लिए आवश्यक सुरक्षा प्रदान करे। अदालत ने यह भी कहा,

"मौजूदा मामला हालांकि याचिकाकर्ताओं की शादी का नहीं है, लेकिन उनके जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित होने का है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संवैधानिक मौलिक अधिकार बहुत अधिक ऊंचाई पर है। संवैधानिक योजना के तहत पवित्र होने के नाते इस अधिकार को संरक्षित किया जाना चाहिए, भले ही विवाह अमान्य या शून्य विवाह या पक्षों के बीच कोई विवाह हुआ हो या न हुआ हो।


संवैधानिक दायित्वों के अनुसार राज्य का यह बाध्य कर्तव्य है कि वह प्रत्येक नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करे। किसी नागरिक के बालिग या नाबालिग होने की परवाह किए बिना, मानव जीवन का अधिकार बहुत ऊंचे स्तर पर माना जाता है।"

अदालत के आदेश की कॉपी डाउनलोड करने के लिए यहांं क्लिक करेंं




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