सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा: बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को रेगुलेट करने के लिए नियम बनाएं

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    सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच को लेकर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि अगर सरकार इस मुद्दे पर कोई कदम नहीं उठाती है, तो उसे 'इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट' के तहत निर्देश जारी करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच 'जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस' की एक PIL पर सुनवाई कर रही थी। इस PIL में नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल से जुड़ी सुरक्षा की मांग की गई।

    सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पहली नज़र में यह मुद्दा DPDP Act के दायरे में आता दिख रहा है।

    उन्होंने कहा,

    "मुझे कुछ प्रावधान दिखाए गए, मैं यह देखना चाहूंगा कि क्या यह वास्तव में इसके दायरे में आता है या नहीं। वरना, यह एक जायज़ शिकायत है।"

    हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट एच.एस. फूलका ने बताया कि DPDP Act अभी लागू नहीं हुआ है और यह 2027 से लागू होगा। SG ने इस बात से सहमति जताई और कहा कि DPDP व्यवस्था को किसी दूसरे कानून में अपनाया जा सकता है, ताकि नाबालिगों के अकाउंट के लिए माता-पिता की सहमति ज़रूरी हो और कॉन्ट्रैक्ट पर माता-पिता के हस्ताक्षर हों।

    SG ने कहा,

    "कुछ तो करना ही होगा... हमें इंटरमीडियरीज (मध्यस्थों) को कंट्रोल करना होगा।"

    उन्होंने यह भी माना कि नाबालिगों और सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज के बीच किए गए कॉन्ट्रैक्ट शुरू से ही अमान्य (ab initio) होते हैं।

    जस्टिस बागची ने इस बात पर अफ़सोस जताया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 12-15 साल के नाबालिगों को अकाउंट बनाने की इजाज़त दे रहे हैं।

    जज ने टिप्पणी की,

    "15 साल का बच्चा ट्विटर अकाउंट बना सकता है।"

    उन्होंने आगे कहा कि सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज को अपनी मेंबरशिप प्रक्रिया में कम से कम यह सुनिश्चित करना चाहिए कि 18 साल की न्यूनतम उम्र की सीमा का उल्लंघन न हो।

    जज ने SG से कहा कि भारत सरकार को 'सोशल मीडिया इंटरमीडियरी रूल्स' के तहत कुछ निर्देश जारी करने चाहिए ताकि उनके प्लेटफॉर्म भारतीय कानून के अनुरूप हों।

    SG ने भरोसा दिलाया,

    "उन्हें भारतीय कानून का पालन करना ही होगा, इसमें कोई शक नहीं है... कुछ किया जा सकता है, कुछ किया जाना चाहिए और कुछ किया जाएगा।"

    CJI ने इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट की धारा 79 (जो इंटरमीडियरीज़ को थर्ड-पार्टी कंटेंट के लिए 'सेफ़-हार्बर' इम्युनिटी देती है) का ज़िक्र करते हुए कहा कि अगर इस मामले को ठीक से नहीं सुलझाया गया, तो कोर्ट को निर्देश जारी करने पड़ सकते हैं।

    उन्होंने कहा,

    "हम इन सभी इंटरमीडियरीज़ के ख़िलाफ़ उस प्रावधान का इस्तेमाल करके निर्देश जारी करने के लिए मजबूर हो सकते हैं।"

    SG ने जवाब दिया,

    "नहीं माय लॉर्ड्स, सरकार ऐसा करने के लिए तैयार है।"

    पिछले साल सरकार द्वारा बनाए गए 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स 2025' में बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट खोलने के लिए माता-पिता की सहमति की बात कही गई।

    Case: Just Rights for Children Alliance v. Union of India and Anr., W.P.(C) No. 1120/2026

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