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अग्रिम जमानत देने के लिए एफआईआर दर्ज करने में हुई लंबी देरी एक वैध विचार : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
4 Dec 2020 5:30 AM GMT
अग्रिम जमानत देने के लिए एफआईआर दर्ज करने में हुई लंबी देरी एक वैध विचार : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एफआईआर दर्ज करने में हुई लंबी देरी अग्रिम जमानत देने के लिए एक वैध विचार हो सकता है।

न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), सुमेध सिंह सैनी के अग्रिम जमानत आवेदन को स्वीकार करते हुए की है। सैनी ने वर्ष 1991 के बलवंत सिंह मुल्तानी हत्या मामले में जमानत की मांग की थी।

इस पीठ में जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस एमआर शाह भी शामिल थे। पीठ ने कहा कि,

''हालांकि, इस तथ्य पर विचार किया गया है कि घटना की तारीख से लगभग 29 साल की अवधि के बाद और इस अदालत द्वारा दविंदर पाल सिंह भुल्लर (सुप्रा) मामले में दिए गए फैसले की तारीख से 9 साल की अवधि के बाद, मृतक के भाई द्वारा यह प्राथमिकी दर्ज करवाई गई है। वहीं रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है कि इस अवधि के बीच में उन्होंने आपराधिक कार्यवाही शुरू करने और / या प्राथमिकी दर्ज करने के लिए कोई भी कदम उठाया था। इसलिए हमारी राय है कि अपीलकर्ता को सीआरपीसी की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत देने के लिए मामला बनता है। कई बार, देरी आपराधिक कार्यवाही के लिए घातक नहीं हो सकती है। हालांकि, यह हमेशा प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। वहीं वर्तमान मामले की तरह 29 साल की लंबी देरी निश्चित रूप से अग्रिम जमानत देने के लिए एक वैध विचार हो सकती है।''

प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि बलवंत सिंह मुल्तानी को दिसंबर 1991 के आसपास राज्य-समर्थित उन्मूलन में मार दिया गया था। कथित तौर पर एसएसपी, चंडीगढ़ के रूप में कार्यरत सुमेध सिंह सैनी के कार्यकाल के दौरान, 11 दिसम्बर 1991 की सुबह चंडीगढ़ की पुलिस ने मृतक के आवास पर घेराबंदी की और उसे बिना कोई कारण बताए जबरन और अवैध तरीके से अपने साथ ले गए।

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सैनी की तरफ से दायर अग्रिम जमानत की याचिका को खारिज कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील में, सैनी ने तर्क दिया था कि वर्तमान प्राथमिकी राज्य में सत्ता में मौजूद पार्टी के इशारे पर उसे परेशान करने के इरादे से दायर की गई है। यह भी प्रस्तुत किया गया था कि वर्तमान एफआईआर बनाए रखने योग्य नहीं है क्योंकि यह समान तथ्यों के आधार पर दर्ज की जाने वाली दूसरी प्राथमिकी है और कथित घटना के 29 साल बाद दर्ज की गई है।

अदालत ने कहा कि क्या वर्तमान कार्यवाही कानूनन अनुमन्य है या नहीं, इस पर न्यायालय द्वारा विचार किया जाना बाकी है? जो उपरोक्त प्राथमिकी को रद्द करने के लिए लंबित कार्यवाही के दौरान किया जाएगा। हालांकि सैनी को अग्रिम जमानत देते हुए, पीठ ने कहा किः

''अपीलकर्ता के स्टे्टस को देखते हुए और यह भी बताया गया है कि वह वर्ष 2018 में 30 साल की सेवा के बाद पुलिस महानिदेशक, पंजाब के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं और कथित घटना वर्ष 1991 की है और यहां तक कि वर्तमान प्राथमिकी में भी शुरू में आईपीसी की धारा 302 के तहत अपराध के लिए कोई आरोप नहीं लगाया था और मामले में आईपीसी की धारा 364,201,344,330,219 और 120-बी के तहत आरोप लगाए गए थे,जिनके तहत अपीलकर्ता को अग्रिम जमानत दी जा चुकी है और आईपीसी की धारा 302 के तहत अपराध को बाद में दो अप्रूवर जागीर सिंह और कुलदीप सिंह के बयान में आधार पर जोड़ा गया है,हमारा मानना है कि अपीलकर्ता के पक्ष में अग्रिम जमानत देेने का मामला बनता है।''

केस- सुमेध सिंह सैनी बनाम पंजाब राज्य,आपराधिक अपील नंबर 827/2020

कोरम-जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी, जस्टिस एमआर शाह

प्रतिनिधित्व-सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी, सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा, के.वी. विश्वनाथन

आदेश डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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