जज खुद ही अलग-अलग जवाब दें तो लॉ स्टूडेंट से सही जवाब की उम्मीद नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट ने लॉ ऑफिसर परीक्षा में राहत दी

Shahadat

18 March 2026 9:36 AM IST

  • जज खुद ही अलग-अलग जवाब दें तो लॉ स्टूडेंट से सही जवाब की उम्मीद नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट ने लॉ ऑफिसर परीक्षा में राहत दी

    लॉ ऑफिसर की भर्ती के लिए हुई परीक्षा के एक सवाल के सही जवाब में अस्पष्टता के कारण सुप्रीम कोर्ट ने दो उम्मीदवारों के प्रतिस्पर्धी दावों को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने दोनों उम्मीदवारों को राहत देते हुए निर्देश दिया कि एक अतिरिक्त पद (Supernumerary Post) बनाकर दोनों को समायोजित किया जाए।

    यह मामला चंडीगढ़ नगर निगम द्वारा 2021 में लॉ ऑफिसर के एक पद के लिए आयोजित परीक्षा से जुड़ा था। इसमें चरण प्रीत सिंह का चयन हुआ। उनकी नियुक्ति को एक अन्य उम्मीदवार अमित कुमार शर्मा ने इस आधार पर चुनौती दी थी कि उन्हें गलत तरीके से नेगेटिव मार्किंग दी गई। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने 2022 में शर्मा का दावा स्वीकार किया। इसके बाद सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

    “संविधान की निम्नलिखित में से कौन सी अनुसूची मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा से मुक्त है?”

    दिए गए विकल्प थे:

    A) सातवीं अनुसूची

    B) नौवीं अनुसूची

    C) दसवीं अनुसूची

    D) उपरोक्त में से कोई नहीं।"

    भर्ती करने वाले प्राधिकरण ने विकल्प B, "नौवीं अनुसूची", को सही उत्तर माना। हालांकि, शर्मा ने विकल्प D, "उपरोक्त में से कोई नहीं", को चिह्नित किया; उनका तर्क था कि संवैधानिक न्यायशास्त्र के आलोक में किसी भी अनुसूची को न्यायिक समीक्षा से पूर्ण छूट प्राप्त नहीं है। इसलिए शर्मा को नकारात्मक अंक दिए गए।

    हाईकोर्ट के सिंगल जज ने उत्तर कुंजी को सही ठहराया और शर्मा की रिट याचिका खारिज की। सिंगल जज ने यह तर्क दिया कि अनुच्छेद 31B, नौवीं अनुसूची में रखे गए कानूनों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दिए जाने से छूट प्रदान करता रहता है। शंकरी प्रसाद, सज्जन सिंह जैसे पूर्व निर्णयों और केशवानंद भारती के बाद की स्थिति पर भरोसा करते हुए सिंगल जज ने यह माना कि नौवीं अनुसूची ऐसी छूट बनाए रखती है। हालांकि यह 'मूल संरचना सिद्धांत' के तहत सीमित जाँच के अधीन है। इसी तर्क के आधार पर विकल्प B को सही माना गया।

    हालांकि, अपील में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एक अलग दृष्टिकोण अपनाया। I.R. Coelho बनाम तमिलनाडु राज्य मामले का संदर्भ देते हुए खंडडपीठ ने यह माना कि नौवीं अनुसूची की छूट पूर्ण नहीं है। उसमें रखे गए कानून न्यायिक समीक्षा के लिए खुले रहते हैं, यदि वे संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करते हैं। खंडपीठ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह कहना पूरी तरह से गलत होगा कि कोई भी अनुसूची केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा से मुक्त है। इसलिए पीठ ने यह माना कि शर्मा का उत्तर, "उपरोक्त में से कोई नहीं", कानूनी रूप से सही था और उनके अंकों में संशोधन का निर्देश दिया, जिसके परिणामस्वरूप चयनित उम्मीदवार को पद से हटना पड़ा।

    हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि यह मुद्दा जटिल था और भर्ती प्राधिकरण तथा शर्मा दोनों के उत्तरों को पूरी तरह से गलत नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि सिंगल जज और खंडपीठ दोनों ने संवैधानिक निर्णयों की एक लंबी शृंखला की जांच की थी—जिसमें शंकरी प्रसाद, सज्जन सिंह, गोलक नाथ, केशवानंद भारती और I.R. Coelho के मामले शामिल हैं—फिर भी वे एक ही प्रश्न पर अलग-अलग निष्कर्षों पर पहुंचे।

    इस संदर्भ में, न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि जब जज स्वयं ऐसे जटिल संवैधानिक प्रश्न के सही उत्तर पर एकमत नहीं हैं तो यह अपेक्षा करना अनुचित होगा कि किसी प्रतियोगी परीक्षा में बैठने वाले विधि स्नातक (Law Graduates) किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंच पाएंगे। न्यायालय ने यह माना कि "एक विधि स्नातक के दृष्टिकोण से, दोनों ही “उत्तर सही हो सकते हैं।”

    खंडपीठ ने आगे यह भी कहा कि यद्यपि प्रश्न की सीधी-सादी भाषा के आधार पर विकल्प B (नौवीं अनुसूची) अधिक उपयुक्त प्रतीत हो सकता है, तथापि संवैधानिक न्यायशास्त्र के गहन विश्लेषण से इस मत की पुष्टि होती है कि कोई भी अनुसूची न्यायिक समीक्षा से पूर्णतः मुक्त नहीं है। इस प्रकार, विकल्प D भी एक मान्य उत्तर बन जाता है।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने यह टिप्पणी की:

    "जब हाईकोर्ट के जजों की भी राय सवाल नंबर 73 के सही जवाब को लेकर अलग-अलग है तो उन आम लॉ ग्रेजुएट्स से, जो म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में लॉ ऑफिसर के पद के लिए मुकाबला कर रहे हैं, यह उम्मीद करना तो बिल्कुल भी सही नहीं है कि वे कई दशकों में इस कोर्ट द्वारा दिए गए फैसलों और संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करके किसी मल्टीपल-चॉइस सवाल का सही जवाब दे पाएंगे। इसलिए हमारी यह सोच-समझकर बनी राय है कि दोनों उम्मीदवारों को नौकरी दी जानी चाहिए। एक लॉ ग्रेजुएट के नज़रिए से दोनों जवाब सही हो सकते हैं। हालांकि, पूछे गए सवाल की भाषा को देखते हुए ऑप्शन 'B' (नौवीं अनुसूची) ज़्यादा सही लगता है। हालांकि, ऊपर बताए गए इस कोर्ट के फैसलों का और गहराई से विश्लेषण करने पर ऑप्शन 'D' (ऊपर दिए गए विकल्पों में से कोई नहीं) को भी सही माना जा सकता है, जैसा कि डिवीज़न बेंच ने भी माना है।"

    निष्पक्ष रवैया अपनाते हुए कोर्ट ने चंडीगढ़ म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन को निर्देश दिया कि वह एक अतिरिक्त पद बनाकर दोनों उम्मीदवारों को नौकरी दे और अपीलकर्ता की नियुक्ति में कोई बदलाव किए बिना शर्मा को नियुक्त करे। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अपीलकर्ता, जो पहले ही नौकरी जॉइन कर चुका है, उसकी वरिष्ठता (Seniority) बनी रहेगी।

    Case : Charan Preet Singh v Municipal Corporation Chandigarh and another

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