CEC प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की हिंसा का मामला: केरल यूनियन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

  • CEC प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की हिंसा का मामला: केरल यूनियन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

    केरल यूनियन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (KUWJ), दिल्ली यूनिट ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। वह 10 और 11 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में छात्रों के विरोध प्रदर्शन को कवर कर रहे पत्रकारों को कथित तौर पर गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लेने, शारीरिक रूप से हमला करने, बदसलूकी करने और डराने-धमकाने के मामले में तुरंत दखल की मांग कर रहे हैं।

    KUWJ, दिल्ली यूनिट के सचिव डॉ. डी. धनसुमोद के ज़रिए दायर इस रिट याचिका में पत्रकारों की सुरक्षा, प्रेस की आज़ादी और संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a) और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों के कथित उल्लंघन को लेकर गंभीर चिंताएं जताई गईं।

    याचिका के अनुसार, विरोध प्रदर्शनों को कवर कर रहे कई मान्यता प्राप्त पत्रकारों को दिल्ली पुलिस और सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज़ (CAPF) के जवानों ने कथित तौर पर निशाना बनाया, जब वे घटना स्थल पर घटनाओं को रिकॉर्ड कर रहे थे।

    याचिका में जिन पत्रकारों का ज़िक्र है, उनमें शामिल हैं: सुहैल मुहम्मद (चीफ़ रिपोर्टर और न्यूज़ एंकर, 24 न्यूज़); वी.एस. राहुल (कैमरापर्सन, 24 न्यूज़); साजिन (रिपोर्टर, एशियानेट न्यूज़ और KUWJ सदस्य); रोशनी राजन और फरसाना (महिला पत्रकार); विष्णुप्रसाद (प्रेस फ़ोटोग्राफ़र, मातृभूमि); और मिजी पी. जोस (सीनियर रिपोर्टर, मनोरमा न्यूज़)।

    याचिका में आरोप लगाया गया कि प्रेस क्रेडेंशियल (पहचान पत्र) दिखाने के बावजूद पत्रकारों को शारीरिक रूप से रोका गया, घसीटा गया, उनके साथ बदसलूकी की गई और उन्हें हिरासत में लिया गया। इसमें यह भी आरोप है कि कुछ पत्रकारों से लंबी पूछताछ की गई और उनकी गहन तलाशी ली गई, जबकि एक फ़ोटोग्राफ़र का कैमरा छीनने की कोशिश की गई और एक महिला पत्रकार पर लाइव रिपोर्टिंग के दौरान शारीरिक हमला किया गया।

    याचिका में एक बहुत गंभीर चिंता यह भी जताई गई कि सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम निर्देशों की कथित तौर पर अनदेखी की गई। याचिका में डायरी नंबर 63560/2026 में 9 अक्टूबर के आदेश और उसके बाद अवमानना ​​याचिका (सिविल) डायरी नंबर 63801/2026 और रिट याचिका (आपराधिक) डायरी नंबर 63858/2026 में 11 अक्टूबर के आदेश का ज़िक्र किया गया। बाद वाले आदेश में साफ़ तौर पर कहा गया था कि "वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को उनके पेशेवर कर्तव्यों के पालन में किसी भी तरह से रोका नहीं जाएगा।"

    याचिका में कहा गया कि कथित घटनाओं की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए कि क्या पुलिस और सुरक्षा कर्मियों की कार्रवाई कोर्ट के निर्देशों और पत्रकारों को मिलने वाली संवैधानिक सुरक्षा के अनुरूप है या नहीं।

    रिट याचिका मुख्य रूप से कथित घटनाओं से जुड़े फ़ोटोग्राफ़िक मटीरियल और उस समय की वीडियो रिकॉर्डिंग पर आधारित है। इसमें संबंधित इलेक्ट्रॉनिक और दस्तावेज़ी सबूतों को सुरक्षित रखने और पेश करने की भी मांग की गई, जिसमें CCTV फ़ुटेज, बॉडी-वर्न कैमरा रिकॉर्डिंग, फ़ोटोग्राफ़, ड्रोन फ़ुटेज, पुलिस तैनाती के रिकॉर्ड, हिरासत रजिस्टर और आधिकारिक संचार शामिल हैं।

    सुप्रीम कोर्ट से मांगी गई राहत

    KUWJ, दिल्ली यूनिट ने इन घटनाओं की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच; ज़िम्मेदार पाए गए अधिकारियों के ख़िलाफ़ उचित कार्रवाई; सार्वजनिक कार्यक्रमों को कवर करने वाले पत्रकारों के काम में गैर-कानूनी दखल को रोकने के लिए निर्देश; और उनकी सुरक्षा व काम करने की आज़ादी सुनिश्चित करने के उपायों की मांग की।

    याचिका में संबंधित सबूतों को सुरक्षित रखने, प्रभावित पत्रकारों के लिए मुआवज़े, कोर्ट के आदेशों के कथित उल्लंघन के संबंध में उचित कार्यवाही और अपने पेशेवर कर्तव्यों का पालन करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा के लिए बाध्यकारी दिशानिर्देशों की भी मांग की गई।

    याचिका इस बात पर ज़ोर देती है कि प्रेस की आज़ादी एक काम करती हुई डेमोक्रेसी के लिए ज़रूरी है। पत्रकारों को बिना किसी गैर-कानूनी रुकावट, धमकी या दबाव के सार्वजनिक कार्यक्रमों को रिकॉर्ड करने और जनता से जुड़े मामलों की रिपोर्ट करने में सक्षम होना चाहिए। अपने पेशेवर कर्तव्यों का पालन कर रहे पत्रकारों के ख़िलाफ़ बल के किसी भी कथित इस्तेमाल की जांच संविधान और कानून के शासन के अनुसार निष्पक्ष और स्वतंत्र प्रक्रिया के ज़रिए की जानी चाहिए।

    KUWJ, दिल्ली यूनिट ने अपनी प्रतिनिधि हैसियत से सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया ताकि न केवल सीधे तौर पर प्रभावित पत्रकारों के लिए, बल्कि व्यापक पत्रकार बिरादरी और जनता के जानकारी पाने के अधिकार के लिए भी सुरक्षा की मांग की जा सके।

    याचिका में लगाए गए आरोपों की जांच सक्षम अधिकारियों और अदालत द्वारा की जानी है। मांगी गई राहत का मकसद जवाबदेही तय करना, मौलिक अधिकारों की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना है कि पत्रकार बिना किसी गैर-कानूनी दखल के अपनी पेशेवर जिम्मेदारियां निभा सकें।

    यह याचिका एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड सुश्री ऐनी मैथ्यू ने दायर की।

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