34 की क्षमता वाले ए.एन. झा डीयर पार्क में 400 हिरण रखना 'घोर क्रूरता': सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

24 March 2026 8:00 PM IST

  • 34 की क्षमता वाले ए.एन. झा डीयर पार्क में 400 हिरण रखना घोर क्रूरता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली के ए.एन. झा डीयर पार्क में, जिसकी क्षमता सिर्फ़ 34 हिरणों की है, 400 चित्तीदार हिरणों को रखना 'घोर क्रूरता' है। कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति (CEC) द्वारा पहचाने गए वन क्षेत्रों में इन हिरणों को स्थानांतरित करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच दिल्ली के ए.एन. झा डीयर पार्क से राजस्थान में चित्तीदार हिरणों को स्थानांतरित करने से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी।

    नवंबर 2025 में बेंच ने हिरणों को स्थानांतरित करते समय दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की ओर से 'लापरवाही के परेशान करने वाले रवैये' को देखते हुए स्थानांतरण पर रोक लगाई थी।

    कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया, जिसमें हाईकोर्ट ने ए.एन. झा डीयर पार्क के कामकाज में DDA के लगातार कुप्रबंधन में दखल देने से इनकार किया। इसके बजाय कोर्ट ने केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) को स्वतंत्र, ज़मीनी मूल्यांकन करने के लिए नियुक्त किया। इस मूल्यांकन में डीयर पार्क में हिरणों की वास्तविक संख्या, उसकी पारिस्थितिक वहन क्षमता, राजस्थान में पहले से स्थानांतरित किए गए हिरणों के जीवित रहने की स्थिति और भविष्य में किसी भी स्थानांतरण के लिए एक वैज्ञानिक और कल्याण-अनुकूल रूपरेखा तैयार करना शामिल था।

    इसके अलावा, कोर्ट ने DDA से आठ हफ़्तों के भीतर ए.एन. झा डीयर पार्क के क्षेत्रफल में हुई कमी के बारे में स्पष्टीकरण देने और अब से पार्क को व्यावसायिक कार्यक्रमों के लिए किराए पर देना बंद करने को कहा।

    सुनवाई के दौरान, बेंच को बताया गया कि CEC ने अपनी रिपोर्ट जमा की। रिपोर्ट का ज़िक्र करते हुए जस्टिस मेहता ने कहा कि फ़िलहाल पार्क में हिरणों को रखने की क्षमता सिर्फ़ 34 है, जबकि अभी वहां 400 हिरण मौजूद हैं।

    "क्षमता शायद 34 की है, और फ़िलहाल उस पार्क में 400 हिरण हैं, जो अपने आप में एक घोर क्रूरता है। इसलिए हम अधिकारियों से कहेंगे कि वे स्थानांतरण के मामले में CEC के निर्देशों के अनुसार आगे बढ़ें।"

    जस्टिस मेहता ने आगे कहा कि पहले किए गए स्थानांतरण के प्रयासों के दौरान हिरणों के जीवित रहने की दर बहुत कम रही थी। CEC ने अब रणपुर मिशदाड़ी और मुकुंदराम (वन क्षेत्रों) में हिरणों के लिए बाड़े बनाने की सिफ़ारिश की।

    जब याचिकाकर्ताओं के वकील ने आपत्ति जताई तो जस्टिस मेहता ने कहा:

    "आखिरकार, यह कोर्ट और अधिकारियों के बीच का मामला है कि क्या निर्देश दिए जाने हैं। हम सीधे-सीधे दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहरा सकते थे, लेकिन हमें वन्यजीवों की चिंता थी; इसीलिए हमने इस मामले को अपने हाथ में लिया।"

    याचिकाकर्ताओं के वकील ने इस बात पर ज़ोर दिया कि CEC में केवल सरकार के शीर्ष अधिकारी ही शामिल थे और उसमें स्वतंत्र विशेषज्ञ निकायों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं था।

    उन्होंने इस बात पर रोशनी डाली कि रिपोर्ट में विरोधाभासी बातें कही गईं। एक तरफ, इसमें कहा गया कि हिरणों की गिनती में कमी के लिए WII (भारतीय वन्यजीव संस्थान) के कर्मचारी ज़िम्मेदार थे, जबकि दूसरी तरफ इसमें यह सिफ़ारिश की गई कि DDA को WII को "उनकी गड़बड़ी को ठीक करने" के लिए फंड देना चाहिए।

    उन्होंने यह भी जोड़ा, "हर जगह 'लैंड बैंक' की संस्कृति पनप रही है; अगर आपके पास पैसा और ताक़त है तो आप जानवरों को ले लेते हैं।"

    बेंच ने याचिकाकर्ताओं को अपनी लिखित दलीलें जमा करने के लिए दो हफ़्ते का समय दिया और DDA को अपना जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय दिया। इसके बाद बेंच ने आगे के कदमों पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।

    Case Details : NEW DELHI NATURE SOCIETY THROUGH VERHAEN KHANNA VERSUS DIRECTOR HOTRICULTURE DDA & ORS.| SLP(C) No. 013374 - 013375 / 2025

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