जस्टिस शील नागू ने भ्रष्टाचार के आरोपों की CBI जांच के खिलाफ पंजाब सरकार की याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग किया

  • जस्टिस शील नागू ने भ्रष्टाचार के आरोपों की CBI जांच के खिलाफ पंजाब सरकार की याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग किया

    सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस शील नागू ने शुक्रवार (9 अक्टूबर) को पंजाब सरकार की उस याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया, जिसमें पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) को पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के कार्यालय से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्देश दिया गया।

    यह मामला आज (शुक्रवार) जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच के सामने लिस्ट किया गया था।

    जब मामले पर सुनवाई शुरू हुई तो जस्टिस दत्ता ने कहा,

    "जस्टिस नागू इसकी सुनवाई नहीं कर सकते; CJI इसे किसी दूसरी बेंच को सौंपेंगे।"

    याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट जयदीप गुप्ता ने कहा कि जस्टिस नागू ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर कुछ आदेश पारित किए, जिनमें PIL याचिकाकर्ता (जिसकी याचिका पर हाई कोर्ट ने विवादित आदेश पारित किया) की याचिकाओं को खारिज कर दिया गया था। हालांकि, गुप्ता ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार उन आदेशों पर निर्भर नहीं है।

    हालांकि, जस्टिस दत्ता ने कहा कि जज खुद को मामले से अलग कर रहे हैं।

    उन्होंने कहा,

    "मिस्टर गुप्ता, हम बहुत मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। कोई नहीं जानता कि हमला कहां से होगा। 17 अन्य बेंच भी हैं।"

    गुरुवार को यह मामला एक बेंच के सामने आया था, लेकिन बेंच ने इसे शुक्रवार के लिए टाल दिया था, क्योंकि जस्टिस नागू फाइलें नहीं देख पाए थे क्योंकि वे देर से मिली थीं। जून 2026 में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत होने से पहले जस्टिस नागू पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस थे।

    राज्य सरकार ने सोमवार को हाईकोर्ट द्वारा पारित आदेश को चुनौती देते हुए स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) दायर की थी। मंगलवार को सिंह ने भारत के चीफ जस्टिस के सामने इस मामले का ज़िक्र करते हुए इसे जल्द लिस्ट करने की मांग की थी। सिंह ने तब दावा किया कि यह मामला राजनीतिक रूप से प्रेरित है। इसे केवल इसलिए आगे बढ़ाया जा रहा है, क्योंकि राज्य में जल्द ही चुनाव होने वाले हैं।

    सिंह ने CJI के सामने कहा कि हाईकोर्ट ने यह निर्देश इस आधार पर दिया कि राज्य पुलिस ने 'प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' की धारा 66(2) के तहत 'एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट' (ED) से मिली जानकारी पर कोई कार्रवाई नहीं की। उन्होंने तर्क दिया कि पुलिस को तभी कार्रवाई करनी चाहिए जब जानकारी से किसी 'कॉग्निज़ेबल ऑफ़ेंस' (गंभीर अपराध) का पता चले, और दावा किया कि हाई कोर्ट का निर्देश 'विजय मदनलाल चौधरी' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ है।

    CJI ने उसी दिन सुनवाई की मांग को तो ठुकरा दिया, लेकिन मामले को गुरुवार को लिस्ट करने पर सहमति जताई।

    चीफ़ जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की हाईकोर्ट बेंच ने सोमवार को CBI को निर्देश दिया कि वह मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के OSD (ऑफ़िसर ऑन स्पेशल ड्यूटी) राजबीर सिंह घुमन के ख़िलाफ़ लगे आरोपों की आपराधिक केस दर्ज करके जांच करे। बेंच ने पंजाब सरकार और पंजाब पुलिस को यह भी निर्देश दिया कि वे निष्पक्ष जांच के लिए CBI को पूरी मदद दें।

    ये निर्देश वकील निखिल सराफ़ की जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान दिए गए। PIL में आरोप लगाया गया कि 'एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट' (ED) द्वारा घुमन के ख़िलाफ़ आरोपों की जांच की मांग करने के बावजूद पंजाब पुलिस ने कोई उचित कार्रवाई नहीं की। हाईकोर्ट में दी गई जानकारी के अनुसार, ED ने नितिन गोहल से जुड़े आरोपों की ओर इशारा किया, जो कथित तौर पर पंजाब सरकार से कई तरह के फ़ायदे चाहने वाले लोगों के लिए बिचौलिये का काम करता था।

    इन आरोपों में तबादले करवानेस सरकारी गोपनीय दस्तावेज़ों तक पहुँच दिलाने, हथियारों के लाइसेंस दिलाने और अन्य फ़ायदे हासिल करने जैसी बातें शामिल हैं। हाई कोर्ट ने अपने सामने रखे गए तथ्यों पर विचार करने के बाद CBI को आपराधिक केस दर्ज करने और आरोपों की जांच करने का निर्देश दिया। पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर हाई कोर्ट के CBI जांच के निर्देश को पलटने की मांग की।

    Case Title : State of Punjab v Nikhil Saraf

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