AI सहायक हो सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में बढ़ते मामलों का सामना केवल ज़्यादा जज ही कर सकते हैं: जस्टिस दीपांकर दत्ता

Praveen Mishra

27 Jan 2026 2:08 PM IST

  • AI सहायक हो सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में बढ़ते मामलों का सामना केवल ज़्यादा जज ही कर सकते हैं: जस्टिस दीपांकर दत्ता

    सुप्रीम कोर्ट में मुकदमों की “बाढ़” पर चिंता जताते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) या कोई भी तकनीकी हस्तक्षेप, न्यायाधीशों की भारी कमी की भरपाई नहीं कर सकता।

    उन्होंने स्पष्ट किया कि तेजी से बढ़ते मामलों के बोझ के सामने समस्या जनता के अदालत तक पहुँचने की नहीं, बल्कि प्रणाली की सीमाओं की है।

    सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन द्वारा आयोजित पैनल चर्चा “Law, Lawyers, and AI: The Next Frontier” में बोलते हुए न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होने वाले मामलों की संख्या अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है, जिससे संस्था और न्यायाधीशों पर अत्यधिक दबाव पड़ा है।

    उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा,

    “2018 में सुप्रीम कोर्ट में लगभग 40,000 मामले दाखिल हुए थे, जबकि स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या 31 थी। 2019 के मध्य में यह संख्या 34 हुई, और आज भी हम 34 पर ही हैं। सात साल में दाखिले 43,000 से बढ़कर 75,000 हो गए हैं।”

    जस्टिस दत्ता ने माना कि AI शोध, केस की तैयारी और अन्य सहायक कार्यों में उपयोगी हो सकता है, लेकिन निर्णय देना एक संवैधानिक दायित्व है, जिसमें मानवीय तत्वों और मंशाओं का मूल्यांकन शामिल होता है—और यह कार्य फिलहाल केवल मानव न्यायाधीश ही कर सकते हैं।

    उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों का काम केवल कानून लागू करना नहीं, बल्कि मुकदमे के पीछे मौजूद मानवीय भावनाओं और उद्देश्यों—जैसे हिंसा, लोभ, काम और क्रोध—का आकलन करना भी है।

    उनके अनुसार, AI अदालत और वादकारियों के बीच मानवीय संवाद का विकल्प नहीं हो सकता।

    अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए न्यायमूर्ति दत्ता ने बताया कि वे अपने न्यायिक कार्य में AI का सीमित उपयोग करते हैं—मुख्यतः कानूनी शोध या भाषा को परिष्कृत करने के लिए। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि निर्णय का मूल विश्लेषण वे स्वयं करते हैं।

    उन्होंने कहा,

    “जो आप अपने हाथ से लिखते हैं, वही सबसे बेहतर होता है।”

    AI की सीमाओं को रेखांकित करते हुए उन्होंने एक निजी अनुभव साझा किया कि उन्होंने दो बार खुली अदालत में आदेश डिक्टेट किया, लेकिन फाइल दोबारा देखने के बाद उस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के अनुसार, जब तक आदेश पर हस्ताक्षर नहीं होते, न्यायाधीश अपने निर्णय में बदलाव कर सकता है—ऐसी आत्म-सुधार की मानवीय क्षमता AI के लिए कठिन है।

    जस्टिस दत्ता ने बार और बेंच के बीच विश्वास को “नाज़ुक” बताते हुए कानूनी पेशे के लिए एक सख्त नैतिक चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि यदि AI का उपयोग कर भ्रामक दलीलें दी गईं या अदालत को गुमराह किया गया, तो यह इस विश्वास को अपूरणीय क्षति पहुँचाएगा।

    उन्होंने कहा कि AI से उत्पन्न सामग्री की सत्यता की जाँच करना वकीलों का अनिवार्य दायित्व है, जिसे टाला नहीं जा सकता।

    उन्होंने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में प्रशासनिक स्तर पर उन्नत AI टूल्स विकसित करने की आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि फिलहाल रजिस्ट्री विभिन्न प्रकार की ज़मानत अर्ज़ियों—जैसे नियमित ज़मानत और धारा 389 के तहत अपील में ज़मानत—के बीच सही ढंग से वर्गीकरण नहीं कर पाती, जबकि इन मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण अलग-अलग होता है।

    AI की नैतिक सीमाओं पर बात करते हुए जस्टिस दत्ता ने राजा और बंदर के रूपक का इस्तेमाल करते हुए कहा कि AI को “पैरों में रहने वाला सेवक” बनाया जाना चाहिए, न कि “सिर पर बैठने वाला मालिक”।

    उन्होंने सार्वजनिक AI प्लेटफॉर्म्स, जैसे ChatGPT, के गैर-जिम्मेदाराना उपयोग को लेकर चेतावनी दी और कहा कि ड्राफ्ट फैसलों को ऐसे टूल्स पर अपलोड करना गोपनीय जानकारी को सार्वजनिक करने के समान है, क्योंकि मशीन हर इनपुट से सीखती है।

    अपने संबोधन के अंत में जस्टिस दत्ता ने कहा कि भले ही वे अपने कार्यकाल के शेष समय में AI के विकास को “झेलेंगे”, लेकिन वकालत की आत्मा आज भी नैतिक साहस में ही निहित है—यानी ऐसे मामलों को भी निडरता से उठाने का साहस, जो लोकप्रिय न हों।

    उन्होंने कहा कि यह गुण किसी मशीन में नहीं हो सकता।

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