विधायी विशेषाधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट के रेफरेंस में पत्रकार सीमा चिश्ती ने दी दखल देने की अर्ज़ी
Shahadat
30 Sept 2026 6:45 PM IST

'द वायर' की एडिटर और पत्रकार सीमा चिश्ती ने सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी दाखिल की। इसमें उन्होंने संविधान के आर्टिकल 194(3) के तहत विधायी विशेषाधिकारों के दायरे और आर्टिकल 19(1)(a) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी के मौलिक अधिकार के साथ उनके तालमेल से जुड़े लंबे समय से लंबित मामले में दखल देने की अनुमति मांगी।
एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड नेहा राठी के ज़रिए दाखिल अपनी अर्ज़ी में चिश्ती ने कहा कि विधायी विशेषाधिकार असीमित नहीं हैं और उनकी व्याख्या मौलिक अधिकारों - जिसमें आर्टिकल 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भी शामिल है - के साथ तालमेल बिठाते हुए की जानी चाहिए।
उन्होंने पत्रकारों, एडिटर्स, पब्लिशर्स और सार्वजनिक चर्चा में शामिल नागरिकों के खिलाफ विधायी विशेषाधिकारों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक मानक तय करने में कोर्ट की मदद करने की कोशिश की।
याचिका में कहा गया,
“मौजूदा कार्यवाही पहले के न्यायिक फैसलों में तालमेल बिठाने और स्पष्ट संवैधानिक मानक तय करने का मौका भी देती है, जो इनसे जुड़े हों: (i) (ii) (iii) आर्टिकल 194(3) का दायरा और सीमाएं; विधायी कार्यवाही की आलोचना कब विशेषाधिकार का उल्लंघन हो सकती है और कब नहीं; और सच्ची और सही रिपोर्टिंग से जुड़ी निष्पक्ष और नेक नीयत वाली सार्वजनिक चर्चा में शामिल पत्रकारों, एडिटर्स, पब्लिशर्स और नागरिकों को मिलने वाला संवैधानिक संरक्षण... याचिकाकर्ता सम्मानपूर्वक कहती हैं कि विधायी विशेषाधिकार और मौलिक अधिकार अलग-अलग, बंद खानों में काम नहीं करते, बल्कि उन्हें एक साथ, तालमेल के साथ पढ़ा जाना चाहिए, ताकि लोकतांत्रिक शासन की संवैधानिक व्यवस्था को पूरी तरह से लागू किया जा सके।”
यह अर्ज़ी 'एन. रवि और अन्य बनाम स्पीकर, लेजिस्लेटिव असेंबली, चेन्नई और अन्य' मामले में दाखिल की गई, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ 6 अक्टूबर से सुनवाई करने वाली है।
यह मामला इस बात पर अहम सवाल उठाता है कि संविधान के आर्टिकल 194 के तहत मिलने वाले विशेषाधिकार किस हद तक आर्टिकल 19 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों के खिलाफ काम कर सकते हैं।
कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा यह है कि क्या आर्टिकल 194 के तहत राज्य विधानसभाओं के सदस्यों को मिलने वाले विशेषाधिकार, आर्टिकल 19(1)(a) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी के मौलिक अधिकार से ऊपर हो सकते हैं। कोर्ट इस बात की भी जांच करेगा कि क्या पत्रकारों समेत नागरिकों के खिलाफ़ विधायी विशेषाधिकारों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जब उनके भाषण या प्रकाशन पर विधायी विशेषाधिकार के उल्लंघन का आरोप हो।
चिश्ती की अर्ज़ी सुप्रीम कोर्ट के 2024 के 'सीता सोरेन बनाम भारत संघ' मामले के फ़ैसले पर आधारित है। इस मामले में सात जजों की बेंच ने कहा था कि विधायी विशेषाधिकार कामकाज से जुड़े होते हैं और इनका मकसद सदन के सामूहिक कामकाज की रक्षा करना होता है, न कि विधायकों के लिए व्यक्तिगत छूट के तौर पर काम करना।
चिश्ती ने कहा कि विधायी विशेषाधिकारों का आकलन उनके संवैधानिक मकसद के संदर्भ में किया जाना चाहिए और उन्हें पूरी तरह से निरपेक्ष नहीं माना जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय संवैधानिक ढांचा, जो संवैधानिक सर्वोच्चता पर आधारित है, संसदीय संप्रभुता के पारंपरिक अंग्रेज़ी मॉडल से अलग है। साथ ही, अनुच्छेद 194 के तहत राज्य विधानसभाओं को मिली शक्तियां संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही होनी चाहिए।
चिश्ती ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि वह अनुच्छेद 194(3) के दायरे और सीमाओं को स्पष्ट करे। साथ ही कोर्ट यह भी बताए कि किन परिस्थितियों में विधायी कार्यवाही की आलोचना विशेषाधिकार का उल्लंघन मानी जा सकती है, और निष्पक्ष व नेक नीयत से सार्वजनिक चर्चा और सही रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों, संपादकों, प्रकाशकों और नागरिकों को कौन-कौन सी संवैधानिक सुरक्षा मिलती है।
Case Title : N. Ravi v. Speaker Legislative Assembly Chennai

