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अपार्टमेंट क्रेता समझौते में एकतरफा और अनुचित धाराओं को शामिल करने से अनुचित व्यापार प्रथा का गठन होता है : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
12 Jan 2021 5:37 AM GMT
अपार्टमेंट क्रेता समझौते में एकतरफा और अनुचित धाराओं को शामिल करने से अनुचित व्यापार प्रथा का गठन होता है : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि अपार्टमेंट क्रेता समझौते में एकतरफा और अनुचित धाराओं को शामिल करने से उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 2 (1) (आर) के तहत एक अनुचित व्यापार प्रथा का गठन होता है।

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस इंदु मल्होत्रा ​​और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की पीठ ने कहा कि डेवलपर अपार्टमेंट खरीदारों को अपार्टमेंट क्रेता समझौते में निहित एकतरफा अनुबंध शर्तों से बाध्य होने के लिए मजबूर नहीं कर सकता है।

अदालत ने इस तरह से राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग द्वारा पारित एक आदेश के खिलाफ एक डवलपर द्वारा दायर की गई अपील का निपटारा करते हुए यह निर्देश दिया कि निर्माण पूरा करने और कब्जे का प्रमाण पत्र प्राप्त करने में देरी के कारण अपार्टमेंट खरीदारों द्वारा जमा की गई धनराशि वापस कर दी जाए।

शीर्ष न्यायालय के समक्ष अपील में निम्नलिखित मुद्दे उठाए गए थे:

(i) उस तिथि का निर्धारण, जिसमें से कब्जे को सौंपने के लिए 42 महीने की अवधि की गणना खंड 13.3 के तहत की जानी है, चाहे वह डवलपर द्वारा उल्लिखित अग्नि एनओसी जारी करने की तारीख के अनुसार हो ; या, अपार्टमेंट खरीदारों द्वारा उल्लिखित बिल्डिंग प्लान की मंजूरी की तारीख से; (ii) क्या अपार्टमेंट क्रेता के समझौते की शर्तें एकतरफा हैं, और अपार्टमेंट खरीदार उससे बाध्य नहीं होंगे; (iii) क्या उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम,1986 के प्रावधानों पर रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम,2016 के प्रावधानों को प्रमुखता दी जानी चाहिए; (iv) क्या कब्जे को सौंपने में देरी के कारण, अपार्टमेंट खरीदार समझौते को समाप्त करने के हकदार थे, और ब्याज के साथ जमा की गई राशि की वापसी का दावा कर सकते थे।

दूसरे मुद्दे पर चर्चा करते हुए, बेंच ने समझौते की धाराओं का उल्लेख किया और कहा कि वही अपार्टमेंट क्रेता समझौते के पूर्णतया एकतरफा शब्दों को दर्शाता है, जो पूरी तरह से डवलपर के पक्ष में झुकते हैं, और हर कदम पर आवंटियों के खिलाफ होते हैं। अदालत ने कहा कि अपार्टमेंट क्रेता समझौते की शर्तें दमनकारी और पूरी तरह से एकतरफा हैं, और ये उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत एक अनुचित व्यापार व्यवहार का गठन करेंगी।

"हमारा विचार है कि अपार्टमेंट क्रेता समझौते में ऐसे एकतरफा और अनुचित खंडों को शामिल करना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 2 (1) (आर) के तहत एक अनुचित व्यापार प्रथा है। यहां तक ​​कि 1986 के अधिनियम के तहत उपभोक्ता मंचों पर किसी भी तरह से अनुचित या प्रतिबंधात्मक व्यापार प्रथाओं को रोकने की शक्ति की घटना के रूप में एक संविदात्मक शब्द को अनुचित या एकतरफा घोषित करने के लिए रोक नहीं लगाई गई है। 2019 अधिनियम के तहत एक "अनुचित अनुबंध" को परिभाषित किया गया है, और राज्य उपभोक्ता मंचों और राष्ट्रीय आयोग को शक्तियां हैं कि वो अनुबंध की शर्तों को, जो अनुचित हैं उन्हें शून्य और निर्रथक घोषित करें । यह एक शक्ति की वैधानिक मान्यता है जो 1986 अधिनियम के तहत निहित थी। उपरोक्त के मद्देनज़र, हम मानते हैं कि डवलपर अपार्टमेंट खरीदारों को अपार्टमेंट क्रेता समझौते में निहित एकतरफा संविदात्मक शर्तों से बाध्य होने के लिए मजबूर नहीं कर सकता है।"

तीसरे मुद्दे का जवाब देने के लिए पीठ ने मेसर्स इम्पीरिया स्ट्रक्चर्स लिमिटेड बनाम अनिल पाटनी और अन्य में हाल के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें यह देखा गया था कि रेरा अधिनियम की धारा 79 एक आवंटी की ओर से दाखिल शिकायत पर सुनवाई से उपभोक्ता मंच को रोकती नही है। अन्य मुद्दों का भी आवंटियों के पक्ष में जवाब दिया गया था।

मामला: IREO ग्रेस रियलटेक प्राइवेट लिमिटेड बनाम :अभिषेक खन्ना [ सिविल अपील संख्या 5785/ 2019 ]

पीठ : जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस इंदु मल्होत्रा ​​और जस्टिस इंदिरा बनर्जी

उद्धरण: LL 2021 SC 14

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