अनजाने में हुई टाइपिंग की गलतियों के लिए न्यायिक अधिकारी की आलोचना नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट ने जज के खिलाफ की गई टिप्पणियों को हटाया
Shahadat
3 Nov 2026 8:33 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा स्पेशल जज के खिलाफ अपने फैसले में की गई प्रतिकूल टिप्पणियों और आलोचनाओं को हटा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारी को अपनी बात रखने का मौका दिए बिना ही उनके खिलाफ ये प्रतिकूल टिप्पणियां की थीं।
जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की बेंच ने कहा,
"...हमारा मानना है कि हाईकोर्ट द्वारा अपीलकर्ता-न्यायिक अधिकारी के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियां और आलोचनाएं अनावश्यक थीं और इनसे बचा जा सकता था।"
यह टिप्पणी राजस्थान के झुंझुनू जिले में तैनात POCSO स्पेशल जज की याचिका पर सुनवाई करते हुए की गई, जिसमें उन्होंने हाईकोर्ट द्वारा की गई इन प्रतिकूल टिप्पणियों और आलोचनाओं को हटाने की मांग की थी।
दो मामलों में फैसले सुनाते समय याचिकाकर्ता-जज से अनजाने में एक मामले के सबूतों या आंकड़ों का कुछ हिस्सा दूसरे मामले के फैसले में शामिल हो गया। इस पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी करते हुए कहा कि वह फैसला लिखने में समय नहीं दे रही हैं, बल्कि पूरी तरह से स्टेनोग्राफर पर निर्भर हैं। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने यह भी लिखा कि चूंकि याचिकाकर्ता अपनी जिम्मेदारी से बच रही हैं, इसलिए वे न्यायिक सेवा में बने रहने की हकदार नहीं हैं।
साथ ही हाईकोर्ट ने राजस्थान न्यायिक अकादमी के प्रभारी को निर्देश दिया कि वे पीठासीन अधिकारी (जज) को फैसला लिखने के बारे में प्रशिक्षण दें। साथ ही हाईकोर्ट ने अपने इस आदेश की एक प्रति वर्ष 2024 के लिए जज की ACR (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) में शामिल करने का भी निर्देश दिया।
इससे व्यथित होकर जज ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और मांग की कि उनके खिलाफ की गई उन प्रतिकूल टिप्पणियों को हटा दिया जाए, जो उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिए बिना ही की गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष न्यायिक अधिकारी ने स्पष्ट किया कि फैसले में हुई गलतियां—जिनमें अभियोजन पक्ष के गवाहों के गलत सीरियल नंबर शामिल थे—केवल अनजाने में हुई टाइपिंग की गलतियां थीं। उनके अनुसार, इन गलतियों से न तो फैसले के नतीजे पर कोई असर पड़ा और न ही फैसले के मूल अर्थ में कोई बदलाव आया। फैसले में दर्ज हुए एक जैसे तथ्यों के बारे में न्यायिक अधिकारी ने स्पष्टीकरण दिया कि दोनों मामले आपस में बहुत गहराई से जुड़े हुए, क्योंकि दोनों मामलों में गवाह और मुख्य सबूत लगभग एक जैसे ही थे। इसके अलावा, उन्होंने बताया कि सीमित संसाधनों और अपने आशुलिपिक (स्टेनोग्राफर) के छुट्टी पर होने के कारण, अनजाने में एक गलती हो गई।
उनके स्पष्टीकरण को सही मानते हुए जस्टिस मेहता द्वारा लिखे गए फैसले में हाई कोर्ट की टिप्पणियों को अनावश्यक बताया गया। हाईकोर्ट राज्य के न्यायिक अधिकारियों का संरक्षक होता है, इसलिए ऐसी प्रतिकूल टिप्पणियां न्यायिक अधिकारी के करियर को बर्बाद कर सकती हैं और पूरी जिला न्यायपालिका पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं।
अदालत ने कहा,
"ये अपमानजनक टिप्पणियां और आलोचनाएं न्यायिक पक्ष की ओर से दर्ज की गईं, जबकि अपीलकर्ता न्यायिक अधिकारी को अपना पक्ष रखने या स्पष्टीकरण देने का कोई मौका नहीं दिया गया। इसलिए, यह 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' (Principles of Natural Justice) का उल्लंघन है।"
अदालत ने हाईकोर्ट को सलाह दी कि वे अपनी शक्तियों का इस्तेमाल अधिक उदारता के साथ करें।
अदालत ने कहा,
"हमारी राय में यह एक ऐसा मामला था जहां हाईकोर्ट को अपनी पर्यवेक्षी शक्तियों (Superintendence Powers) का इस्तेमाल करते समय अधिक उदारता दिखानी चाहिए थी। भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत, जिला न्यायपालिका के अधिकारियों के संरक्षक के रूप में हाई कोर्ट को अपनी भूमिका को सही भावना के साथ निभाना चाहिए था... किसी न्यायिक अधिकारी को फैसले में हुई अनजाने टाइपिंग की गलतियों के लिए फटकार लगाना, जिसका मामले के नतीजे पर कोई असर नहीं पड़ा, पूरी तरह से टाला जा सकता था।"
अदालत ने कहा,
"इन परिस्थितियों को देखते हुए हम हाईकोर्ट के इस विचार से सहमत नहीं हैं कि 20 जनवरी, 2024 का फैसला सुनाते समय अपीलकर्ता न्यायिक अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहीं।"
अदालत ने आदेश दिया कि 1 मई, 2025 के आदेश के पैराग्राफ 9, 10 और 11 में अपीलकर्ता-न्यायिक अधिकारी के खिलाफ की गई सख्त टिप्पणियां और प्रतिकूल बातें, तथा पैराग्राफ 17 और 18 में उनकी ACR (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) में प्रशिक्षण और पदस्थापन (प्लेसमेंट) के संबंध में दिए गए निर्देश, कायम नहीं रखे जा सकते; इसलिए इन्हें हटा दिया गया और रद्द कर दिया गया। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि इस आदेश की कॉपी राजस्थान हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी जाए, ताकि इसे माननीय चीफ जस्टिस के समक्ष प्रस्तुत किया जा सके।
Case Title : IN RE: XXX, A JUDICIAL OFFICER IN THE DISTRICT JUDGE CADRE OF RAJASTHAN JUDICIAL SERVICES

