कानून में 'मैरिटल रेप एक्सेप्शन' होने के बावजूद पति पर पत्नी के साथ रेप का केस कैसे चलाया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट का सवाल

Shahadat

9 Sept 2026 8:30 PM IST

  • कानून में मैरिटल रेप एक्सेप्शन होने के बावजूद पति पर पत्नी के साथ रेप का केस कैसे चलाया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट का सवाल

    IPC/BNS के तहत 'मैरिटल रेप एक्सेप्शन' (शादी के दौरान रेप से छूट) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि क्या कोर्ट इस छूट की संवैधानिक वैधता पर फैसला आने तक किसी पति पर अपनी पत्नी के साथ 'रेप' का केस चला सकती है।

    कोर्ट ने यह सवाल कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के संदर्भ में उठाया, जिसमें कहा गया कि यह छूट पूरी तरह से लागू नहीं होती है, और जो पति अपनी पत्नी के साथ बिना उसकी मर्जी के सेक्स करता है, उस पर IPC की धारा 376 के तहत केस चलाया जा सकता है।

    जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने पूछा,

    "जब तक हम इस छूट की संवैधानिक वैधता पर कोई फैसला नहीं ले लेते, क्या [मैरिटल रेप के लिए] मुकदमा चलाने की इजाज़त दी जा सकती है? हम निश्चित रूप से पीड़ितों की सुरक्षा करेंगे। लेकिन क्या किसी ऐसे व्यक्ति पर मुकदमा चलाना अभियोजक (Prosecutor) के अधिकार क्षेत्र में आता है, जिसके मामले में IPC की धारा 375 (या संबंधित BNS प्रावधान) में छूट की स्पष्ट परिभाषा दी गई?"

    सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जब टिप्पणी की कि उन्हें इस बात की "जानकारी" नहीं है कि किसे "पीड़ित" कहा जा रहा है तो जज ने जवाब दिया कि सीनियर एडवोकेट एनएस नप्पिनाई के तर्क के अनुसार, शादी के दौरान बिना मर्जी के यौन संबंध बनाने पर मजबूर की गई महिला "पीड़ित" है। कोर्ट के लिए एकमात्र सवाल यह है कि क्या राज्य शिकायत वाली घटना को 'रेप' मानता है या नहीं।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच IPC की धारा 375 (अब BNS की धारा 63) के तहत 'मैरिटल रेप एक्सेप्शन' (अपवाद 2) को चुनौती देने/समर्थन करने वाले कई मामलों पर सुनवाई कर रही है।

    सीनियर एडवोकेट करुणा नंदी, इंदिरा जयसिंह, गोपाल शंकरनारायणन, एनएस नप्पिनाई, सिद्धार्थ दवे, कॉलिन गोंसाल्वेस, महालक्ष्मी पावनी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद, कोर्ट ने मामले को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह दोनों सवालों पर विचार करेगा - (a) क्या 'मैरिटल रेप एक्सेप्शन' (MRE) के बने रहने पर भी मुकदमा चलाया जा सकता है, और (b) क्या MRE खुद ही खत्म हो जाता है।

    सुनवाई की तारीख जल्द ही बताई जाएगी। सुनवाई की शुरुआत उस SLP पर बहस से होगी, जो कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर की गई, जिसमें पति (सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ दवे द्वारा प्रतिनिधित्व) के ख़िलाफ़ वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape) का मुक़दमा चलाने को सही ठहराया गया।

    इस मुद्दे को उठाने वाली कई याचिकाओं को चार तरह से बांटा जा सकता है – पहली, वैवाहिक बलात्कार से छूट (Exception) पर दिल्ली हाई कोर्ट के बंटे हुए फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील; दूसरी, वैवाहिक बलात्कार से छूट के ख़िलाफ़ दायर PILs; तीसरी, कर्नाटक हाई कोर्ट के उस फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका जिसमें पत्नी के साथ ज़बरदस्ती सेक्स करने के लिए IPC की धारा 376 के तहत पति पर लगाए गए आरोपों को सही ठहराया गया था; और चौथी, इंटरवेनिंग एप्लीकेशन (बीच में शामिल होने के लिए आवेदन)।

    2024 के एक हलफ़नामे में केंद्र सरकार ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाने का विरोध किया। इसमें कहा गया कि शादीशुदा महिलाओं को यौन हिंसा से बचाने के लिए क़ानून में पहले से ही दूसरे उपाय मौजूद हैं और शादी के रिश्ते में "बलात्कार" का अपराध लागू करना "बहुत ज़्यादा सख़्त" और ज़रूरत से ज़्यादा हो सकता है।

    केंद्र सरकार ने कहा कि इस मामले पर फ़ैसला लेने के लिए सभी राज्यों के साथ ठीक से बातचीत करने के बाद एक व्यापक नज़रिए की ज़रूरत है। उसने यह भी कहा कि अभी कोर्ट के सामने जो मुद्दा उठाया गया, वह 'कानूनी' से ज़्यादा 'सामाजिक' है और वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाना विधायी नीति (Legislative Policy) के दायरे में आता है।

    Case Title: Hrishikesh Sahoo v. State of Karnataka And Ors. SLP(Crl) No. 4063-4064/2022 (and connected cases)

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