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"व्हाट्सएप की अपडेटेड प्राइवेसी पॉलिसी अत्यधिक आक्रामक", इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दायर किया

LiveLaw News Network
31 Jan 2021 6:27 AM GMT
व्हाट्सएप की अपडेटेड प्राइवेसी पॉलिसी अत्यधिक आक्रामक, इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दायर किया
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इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) ने व्हाट्सएप की अपडेटेड प्राइवेसी पॉलिसी और गाइडलाइंस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। दायर आवेदन में पॉलिसी पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की गई है।

2017 में कर्मण्या सिंह सरीन और श्रेया सेठी द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका में हस्तक्षेप आवेदन दायर किया गया है, जिसमें कंपनी की 2016 की गोपनीयता नीति को चुनौती दी गई थी। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा सुनवाई की जा रही है।

एडवोकेट टीवीएस राघवेंद्र श्रेयस द्वारा दायर त्वरित आवेदन में, IFF ने कहा है कि व्हाट्सएप की 2021 नीति अत्यधिक आक्रमणकारी है और भारतीय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं पर एकतरफा थोपी गई है।

आवेदन में अदालत से अस्‍थायी आदेश देने का आग्रह किया गया है, जिससे विपणन या अन्य उद्देश्यों के लिए फेसबुक के साथ व्हाट्सएप द्वारा उपयोगकर्ताओं के किसी भी व्यक्तिगत डेटा को साझा करने पर रोक लगे।

व्हाट्सएप को अन्य निजी मैसेजिंग ऐप की तरह नहीं

आवेदक ने कहा है कि व्हाट्सएप को किसी अन्य निजी संदेश सेवा प्रदाता की तरह नहीं माना जा सकता है और उसे पूर्ववर्ती आचरण में संलग्न होने की अनुमति नहीं दी जा सकती है क्योंकि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने पाया है कि व्हाट्सएप भारत ओवर दी टॉप मैसेजिंग सर्व‌िस के बाजार में प्रमुख स्थान रखता है।

आवेदन में कहा गया है, व्हाट्सएप के माध्यम से सम्मन भेजने और वर्चुअल कोर्ट के लिंक साझा करने जैसे उदाहणों से "व्हाट्सएप सेवाओं की अपरिहार्य प्रकृति पर सरकार और सार्वजनिक अधिकारियों ने भी अपनी निर्भरता स्पष्ट की है।"

अपडेटेड पॉलिसी अत्यधिक आक्रामक

आवेदक में कहा गया है कि 2021 नीति व्हाट्सएप द्वारा इकट्टा किए गए उपयोग और लॉग की जानकारी, डिवाइस और कनेक्शन की जानकारी, और स्थान की जानकारी के बारे में अधिक खुलासा करती है, और व्हाट्सएप द्वारा एकत्रित मेटाडेटा के अत्यधिक आक्रामक और विस्तृत प्रकृति का खुलासा करती है।

इसके अलावा, यह निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए फेसबुक के साथ डेटा साझा करता है: (i) सुविधाओं और सामग्री को निजीकृत करना; (ii) खरीद और लेनदेन को पूरा करना; (iii) उपयोगकर्ता के व्हाट्सएप अनुभवों को अन्य फेसबुक कंपनी उत्पादों के साथ जोड़ने के लिए एकीकरण प्रदान करना।

इसके अलावा, आवेदन में कहा गया है कि उपयोगकर्ता की बातचीत की सामग्री को संरक्षित करने वाले गारंटीकृत एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन से आगे बढ़ते हुए, 2021 नीति में कहा गया है कि फेसबुक की उन संदेशों तक पहुंच हो सकती है, जो उपयोगकर्ता व्हाट्सएप पर व्यवसायों के साथ साझा करते हैं।

मेटाडेटा की रक्षा करने की आवश्यकता है

अपडेटेड प्राइवेसी पॉल‌िसी के तहत, व्हाट्सएप का कहना है कि इसके प्लेटफॉर्म पर बातचीत एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड है और कंपनी केवल मेटाडेटा का उपयोग करेगी।

याचिकाकर्ता ने हालांकि कहा है कि मेटाडेटा वह डेटा है जो अन्य डेटा के बारे में जानकारी प्रदान करता है, और व्हाट्सएप जैसे निजी मैसेजिंग प्लेटफार्मों के संदर्भ में, मेटाडेटा किसी व्यक्ति के जीवन के बारे में उतनी ही संवेदनशील जानकारी प्रकट कर सकता है जितना कि संदेश की वास्तविक सामग्री।

इस पृष्ठभूमि में, याचिकाकर्ता ने केएस पुट्टस्वामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एंड अदर्स (2017) 10 एससीसी 1, में नौ न्यायाधीशों के फैसले पर भरोसा किया है, जहां अदालत ने एकत्रीकरण के खतरों को पहचाना था, जब छोटी-छोटी जानकारियों को जोड़कर किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व की पूरी तस्वीर प्रकट की जा सकती थी।

आवेदन में कम्यूनिकेशन सर्व‌िलांस के संदर्भ में मानव अधिकार से संबंध‌ित अंतर्राष्ट्रीय सिद्धांतों का हवाला भी दिया गया है, जो इंटरनेट सर्विलांस के संबंध में सर्वोत्तम अंतरराष्ट्रीय व्यवहार हैं, जिन्हें का सितंबर 2013 में जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की बैठक की साइडलाइंन पर लॉन्च किया गया था। इस दस्तावेज के अनुसार , मेटाडाटा किसी व्यक्ति के बारे में संचार की सामग्री से भी अधिक खुलासा कर सकता है, और इस प्रकार, समकक्ष सुरक्षा का हकदार है।

इसके रोशनी में याचिकाकर्ता ने कहा है कि व्हाट्सएप की डेटा संग्रह और साझाकरण की प्रथा, जो उसकी गोपनीयता नीतियों में निहित हैं, व्यक्ति के निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हैं और असंवैधानिक है।

पृष्ठभूमि

मौजूदा मामले में मुख्य याचिका व्हाट्सएप की अगस्त 2016 की गोपनीयता नीति को चुनौती देते हुए दायर की गई थी, जब व्हाट्सएप ने अपने उपयोगकर्ताओं के डेटा को विपणन और विज्ञापन उद्देश्यों के लिए फेसबुक के साथ साझा करना शुरू किया था।

इस मामले को अंतिम बार 9 सितंबर, 2017 को सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने सुना था और उसके बाद न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बीएन श्रीकृष्ण की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक समिति नियुक्त करने के केंद्र सरकार के निर्णय के आधार पर मामले को स्थगित कर दिया गया था।

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