हाईकोर्ट को आम तौर पर ट्रायल पर रोक नहीं लगानी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट ने रिविज़न पावर के बिना सोचे-समझे इस्तेमाल पर चिंता जताई

Shahadat

31 Aug 2026 5:44 PM IST

  • हाईकोर्ट को आम तौर पर ट्रायल पर रोक नहीं लगानी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट ने रिविज़न पावर के बिना सोचे-समझे इस्तेमाल पर चिंता जताई

    सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा अंतरिम आदेशों (Interlocutory Orders) को चुनौती देने पर सुनवाई करते हुए ट्रायल पर रोक लगाने की आम प्रैक्टिस को गलत बताया। कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसी रोक तभी दी जानी चाहिए, जब ट्रायल जारी रहने से रिविज़न की कार्यवाही पर गंभीर और कभी न ठीक होने वाला असर पड़े या पार्टियों पर बुरा असर पड़े।

    कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 115 के तहत रिविज़न अधिकार क्षेत्र (Revisional Jurisdiction) के बिना सोचे-समझे इस्तेमाल पर भी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट रिविज़न का इस्तेमाल ऐसे नहीं कर सकता जैसे वह अपील सुनने का अधिकार क्षेत्र (Appellate Jurisdiction) हो।

    कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के 117 पेज का फैसला रद्द किया। इस फैसले में CPC, 1908 की धारा 115 के तहत रिविज़न याचिकाओं को मंज़ूरी दी गई और CPC के ऑर्डर VII नियम 11 के तहत शिकायत (Plaint) को खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने अपने रिविज़न अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया और "ट्रायल कोर्ट की भूमिका अपना ली"।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने यह फैसला बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच द्वारा 2024 में दिए गए एक साझा फैसले के खिलाफ दायर दो जुड़ी हुई अपीलों पर सुनाया।

    अपीलकर्ता ने प्रतिवादियों के खिलाफ एक सिविल केस दायर किया। इसमें मांग की गई कि 2015 और 2017 के दो सेल डीड (Sale Deeds) को अमान्य घोषित किया जाए और यह माना जाए कि प्रतिवादी विवादित संपत्ति पर गैर-कानूनी रूप से कब्ज़ा किए हुए हैं। साथ ही, नुकसान और मुआवज़े की भी मांग की गई।

    केस दायर होने के तुरंत बाद प्रतिवादियों ने CPC के ऑर्डर VII नियम 11 के तहत शिकायत को खारिज करने के लिए आवेदन दायर किए। उनका तर्क था कि शिकायत में कार्रवाई का कोई आधार (Cause of Action) नहीं बताया गया और यह CPC की धारा 11 और 47 के तहत वर्जित है। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने आवेदन खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादियों द्वारा पेश किए गए दस्तावेज़ों पर उस चरण में विचार नहीं किया जा सकता और केवल शिकायत और उसके साथ लगे दस्तावेज़ों की ही जांच की जानी चाहिए। यह भी कहा गया कि 'रेस ज्यूडिकाटा' (Res Judicata - पहले से तय मामले) और 'लिमिटेशन' (समय-सीमा) के मुद्दों पर ट्रायल के दौरान फैसला किया जाएगा।

    ट्रायल कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर प्रतिवादियों ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के सामने रिविज़न याचिकाएं दायर कीं। हाईकोर्ट ने रिविज़न याचिकाओं को मंज़ूरी दी और दोनों प्रतिवादियों के मामले में शिकायत खारिज की। इसके बाद वादी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

    हाईकोर्ट का फ़ैसला देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा,

    "अगर विवादित फ़ैसले को गहराई से पढ़ा जाए तो हैरानी की बात है कि इसमें एक खास सवाल पर कोई चर्चा नहीं की गई: CPC के ऑर्डर VII रूल 11 के तहत अर्ज़ियों को खारिज करते समय ट्रायल कोर्ट ने कहां और/या कैसे गलती की? यह एक अनोखा मामला लगता है, जहां फ़ैसले के 118 (एक सौ अठारह) पैराग्राफ़ में एक भी वाक्य ऐसा नहीं है, जो ट्रायल कोर्ट की उस गलती के बारे में हो, जिसके आधार पर रिविज़नल अधिकार क्षेत्र (Revisional Jurisdiction) का इस्तेमाल करते हुए दखल दिया जा सके।"

    बेंच ने यह भी नोट किया कि प्रतिवादियों के वकीलों ने इस बात पर कोई आपत्ति नहीं जताई।

    कोर्ट ने CPC की धारा 115 की स्थापित स्थिति को दोहराने के लिए 'शिव शक्ति को-ऑप. हाउसिंग सोसाइटी बनाम स्वराज डेवलपर्स' मामले में अपने पहले के फ़ैसले का हवाला दिया और साफ़ किया कि अपील के अधिकार के विपरीत, "धारा 115 के तहत अर्ज़ी देने का कोई ऐसा ठोस अधिकार नहीं है," और यह प्रावधान "असल में हाई कोर्ट को निचली अदालतों की निगरानी करने की शक्ति देता है," न कि यह किसी मुक़दमेबाज़ को दिया गया कोई अधिकार है।

    बेंच ने 'रिविजनल ज्यूरिस्डिक्शन' (पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र) के गलत इस्तेमाल को लेकर चिंताओं का ज़िक्र किया। इसके लिए उन्होंने 1958 में तत्कालीन अटॉर्नी-जनरल एमसी सेतलवाड़ द्वारा सौंपी गई 'लॉ कमीशन ऑफ़ इंडिया' की 14वीं रिपोर्ट का हवाला दिया। इस रिपोर्ट में बताया गया कि अंतरिम आदेशों (Interlocutory Orders) के खिलाफ बड़ी संख्या में दायर 'रिविजन एप्लीकेशन' (पुनरीक्षण याचिकाएं) "बिना किसी ठोस आधार के होती हैं और उन्हें केवल कार्यवाही में देरी करने के मकसद से दायर किया जाता है।"

    बेंच ने यह भी देखा कि लगभग सात दशक पहले ये चिंताएं उठाए जाने के बावजूद, "हालात और खराब ही हुए हैं।" इसी वजह से विधायिका को 1999 के संशोधन और बाद में 'कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015' की धारा 8 के ज़रिए 'रिविजनल इंटरफेरेंस' (पुनरीक्षण के तहत हस्तक्षेप) के दायरे को सीमित करना पड़ा।

    मौजूदा मामले में बेंच ने पाया कि ट्रायल कोर्ट की किसी गलती की पहचान करने में नाकाम रहने के अलावा, हाईकोर्ट ने खुद को ऐसे पेश किया जैसे वह 'प्लेन्ट' (वाद-पत्र) को खारिज करने की याचिका पर सुनवाई करने वाली मूल अदालत (Original Court) हो।

    बेंच ने कहा,

    "अपने सामने आई रिविजन एप्लीकेशन पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की भूमिका अपना ली। अगर अदालत की पहचान न बताई गई होती, तो फैसले को पढ़ने वाला कोई भी व्यक्ति निश्चित रूप से इस नतीजे पर पहुँचता कि यह मूल अदालत का फैसला है, जिसमें 'प्लेन्ट' को खारिज किया गया।"

    बेंच ने आगे कहा कि हाईकोर्ट ने 'ऑर्डर VII रूल 11' के तहत जांच के सीमित दायरे से बाहर जाकर ऐसे तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर टिप्पणियां कीं, जो 'प्लेन्ट' का हिस्सा नहीं थे।

    बेंच ने कहा,

    "गहरे दुख के साथ हमें यह कहना पड़ रहा है कि मौजूदा मामले में 'ऑर्डर VII रूल 11, CPC' के तहत किसी आवेदन पर विचार करने के बुनियादी सिद्धांतों को हाईकोर्ट ने शायद ध्यान में नहीं रखा।"

    बेंच ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि हाईकोर्ट ने "एक गैर-ज़रूरी मुद्दे पर लंबा फैसला" सुनाने में बहुत ज़्यादा न्यायिक समय बर्बाद किया।

    बेंच ने कहा,

    "वही समय किसी ज़रूरी मुकदमे (lis) पर लगाया जा सकता था।"

    साथ ही चेतावनी दी कि इस तरह की गलत कोशिशों से "संस्थागत उद्देश्यों को फायदा होने के बजाय नुकसान ज़्यादा होता है।"

    यह देखते हुए कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद से मुकदमे की सुनवाई रुकी हुई है और मुकदमा शुरू होने के नौ साल बाद भी सुनवाई शुरू नहीं हो पाई, बेंच ने सुनवाई पर रोक लगाने की आम चलन की आलोचना की।

    बेंच ने अफ़सोस जताते हुए कहा,

    “अंतरिम आदेशों को चुनौती देने पर नोटिस जारी करते समय ट्रायल पर रोक लगाने की हाईकोर्ट की आम प्रैक्टिस को सही नहीं माना जा सकता। जब तक हाईकोर्ट सतही तौर पर नहीं बल्कि गहराई से जांच करके इस नतीजे पर न पहुंचे कि ट्रायल जारी रहने से रिविज़न के नतीजे पर गंभीर और कभी न सुधरने वाला असर पड़ेगा या पार्टियों को नुकसान होगा, तब तक ट्रायल पर रोक नहीं लगानी चाहिए।”

    इसके बाद अपीलें मंज़ूर कर ली गईं और हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द कर दिया गया, जिससे ट्रायल कोर्ट में मुक़दमा फिर से शुरू हो गया। यह देखते हुए कि ट्रायल सात साल से रुका हुआ था, कोर्ट ने प्रतिवादियों को आठ हफ़्ते के अंदर लिखित बयान (अगर पहले से दाखिल नहीं किए गए हों) दाखिल करने की छूट दी और ट्रायल कोर्ट से कहा कि वे उसके बाद अगले छह हफ़्ते के अंदर मुद्दे तय करें। हालांकि, 'हाईकोर्ट बार एसोसिएशन इलाहाबाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले का हवाला देते हुए बेंच ने ट्रायल पूरा करने के लिए कोई समय-सीमा तय करने से इनकार किया।

    यह भी साफ़ किया गया कि ट्रायल कोर्ट सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट की किसी भी टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना आगे बढ़ेगा।

    Case: Madhav Vidarbha Estate Pvt Ltd v Praharsh Corporation Pvt Ltd & Ors (with connected matter Madhav Vidarbha Estate Pvt Ltd v Shri Sawan Nandkumar Bhatewara & Ors)

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