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हाथरस केस: बलात्कार को साबित करने के लिए पी‌ड़िता के शरीर में वीर्य की मौजूदगी आवश्यक नहीं, उत्तर प्रदेश पुलिस का दावा कानून के विपरीत

LiveLaw News Network
2 Oct 2020 7:08 AM GMT
हाथरस केस: बलात्कार को साबित करने के लिए पी‌ड़िता के शरीर में वीर्य की मौजूदगी आवश्यक नहीं, उत्तर प्रदेश पुलिस का दावा कानून के विपरीत
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उत्तर प्रदेश पुलिस ने दावा किया है कि हाथरस की 19 वर्षीय दलित युवती के साथ बलात्कार नहीं हुआ। उल्लेखनीय है कि वारदात में आई चोटों के कारण युवती की हाल ही मौत हो गई ‌थी।

उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला के परिणाम में मृतक युवती के शरीर पर वीर्य के नमूनों की मौजूदगी नहीं दिखी है।

एडीजी (कानून व्यवस्था) प्रशांत कुमार ने कहा, "एफएसएल की रिपोर्ट भी आ चुकी है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नमूनों में वीर्य नहीं थे। यह स्पष्ट करता है कि कोई बलात्कार या सामूहिक बलात्कार नहीं हुआ था।"

इस प्रकार के बयानों के साथ, पुलिस ने 22 सितंबर को युवती द्वारा मृत्यु से पहले दिए गए बयान का खंडन करने का प्रयास किया है, जिसमें उसने कहा था कि उसके साथ चार पुरुषों ने बलात्कार किया था।

इस संबंध में, यह ध्यान रखना उचित है कि बलात्कार के अपराध को साबित करने के लिए युवती के शरीर में वीर्य के नमूनों की उपस्थिति स्थापित करना आवश्यक नहीं है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के पिछले संस्करण में कानून की स्थिति यही रही है।

धारा 375 का स्पष्टीकरण (जैसा कि पहले भी था) में यह स्पष्ट किया गया कि बलात्कार के अपराध के लिए आवश्यक यौन संभोग का गठन करने के लिए ल‌िंग का प्रवेश होना पर्याप्त है।

सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के कई फैसले में पहलू को स्पष्ट रूप से बताया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने परमिंदर उर्फ ​​लडका पोला बनाम दिल्ली राज्य (2014) 2 एससीसी 592, हाईकोर्ट के एक फैसले की पुष्टि की थी, जिसमें कहा गया था कि बलात्कार को साबित करने के लिए वीर्य की उपस्थिति आवश्यक नहीं है।

हाईकोर्ट ने मेडिकल ज्युरिसप्रुडेंस और टॉक्सिकोलॉजी (ट्वेंटी फर्स्ट संस्करण) में मोदी के निम्नलिखित पैसेज पर पर भरोसा किया था:

"इस प्रकार, बलात्कार के अपराध का गठन करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि लिंग के पूर्ण प्रवेश के साथ, हाइमन का टूटने और वीर्य के उत्सर्जन होना चाहिए। लेबिअ मजोर, वल्व या पुडेंडा के भीतर लिंग का आंशिक प्रवेश, वह भी वीर्य के उत्सर्जन के साथ या बिना, या प्रवेश का प्रयास ही कानून के उद्देश्य के लिए पर्याप्त है। इसलिए, जननांग पर किसी घाव के बिना या व‌ीर्य के दाग को छोड़े बिना कानूनी रूप से बलात्कार का अपराध करना संभव है।"

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की कार्रवाई को स्वीकार किया था।

वाहिद खान बनाम मध्य प्रदेश 2010 (2) एससीसी 9 में, सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि लिंग का थोड़ा प्रवेश भी ​​बलात्कार के अपराध के लिए पर्याप्त है। लिंग के प्रवेश की गहराई महत्वहीन है।

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम बाबूनाथ में (1994) 6 SCC 29, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था,

"... बलात्कार के अपराध का गठन करने के लिए यह बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है कि पुरुष अंग का पूर्ण प्रवेश हो, वीर्य का उत्सर्जन हो और हाईमन टूटे। पुरुष अंग का लेबिअ मजोर, वल्व या पुडेंडा में पुरुष अंग का आंशिक या थोड़ा प्रवेश, वीर्य उत्सर्जन के साथ या बिना, या यहां तक ​​कि पीड़िता के निजी अंग में प्रवेश का प्रयास आईपीसी की धारा 375 और 376 के उद्देश्य के लिए पर्याप्त होगा। ऐसा इसलिए है कि जननांगों पर घाव लगने या वीर्य के दाग छोड़े बिना भी बलात्कार का अपराध करना संभव है।"

योनि में लिंग का प्रवेश बलात्कार का गठन करने के लिए आवश्यक नहीं है, योन‌ि तक लिंग की पहुंच, योनि में लिंग के प्रवेश के बिना भी, बलात्कार का गठन करेगी, अगर लिंग, प्रवेश की प्रक्र‌िया में युवती के जननांगों किसी भी बाहरी भाग, जैसे कि लेबिअ मजोर, वल्वा या पर्डेंडा आदि के संपर्क में आता है, तो बलात्कार के अपराध का गठन होगा। योनि में प्रवेश का प्रयास योनि तक पहुंचने के बराबर होगा, और यहां तक ​​कि योनी या वल्वा या लेबिअ मजोर में थोड़ा प्रवेश भी "बलात्कार" का गठन करेगा, हालांकि ऐसे मामलों में योनि में कोई प्रवेश नहीं होगा।

वल्व या लेबिअ मजोर में पुरुष अंग का प्रवेश, वीर्य उत्सर्जन के साथ या बिना या पीड़ित के निजी अंग में प्रवेश करने का प्रयास, आंशिक या थोड़ा, धारा 376 आईपीसी के तहत अपराध का गठन करेगा। अपराध के गठन के लिए उत्सर्जन आवश्यक नहीं है। (देखें - तारकेश्वर साहू बनाम बिहार राज्य 2006 (8) एससीसी 560, मदन गोपाल कक्कड़ बनाम नवल दुबे 1992 (3) एससीसी 204, अमन कुमार बनाम हरियाणा राज्य 2004 ( 4) एससीसी 379)।

केरल हाईकोर्ट द्वारा की गई कुछ टिप्पणियां भी इस संदर्भ में प्रासंगिक हैं,

" लैंगिक संवेदनशील उच्चतम न्यायालय सहित भारतीय न्यायपालिका ने धारा 375 आईपीसी के तहत "बलात्कार" के अपराध के लिए व्यावहारिक अर्थ दिया है। पुरुष अंग का युवती निजी अंग के बाहरी हिस्सों जैसे लेबिअ मजोर या वुल्व में प्रवेश करना भी बलात्कार का गठन करने के लिए पर्याप्त है। बलात्कार के अपराध को इससे नहीं मापा जाना च‌ाहिए है कि लिंग योनि में कितने इंच या मिलीमीटर प्रवेश किया है। यदि कोई पुरुष किसी स्‍त्री के शरीर की गोपनीयता में घुसपैठ करता है, विशेष रूप से निजी हिस्से में , तो अदालत को यह तय करने लिए कि कानून के अनुसार बलात्कार है या नहीं, यह देखने की आवश्यकता नहीं है कि पुरुष अंग कितने इंच या मिलीमीटर योनि में प्रवेश किया है, पुरुष अंग का युवती के निजी अंग के बाहरी हिस्सों में प्रवेश करना पर्याप्त है। यह संदेश सुप्रीम कोर्ट और इस न्यायालय के विभिन्न निर्णयों में दिया गया है।" (कुंजुमोन बनाम केरल राज्य, 2011)

बलात्कार के अपराध में आईपीसी में 2013 के संशोधन के बाद भारी बदलाव आया है, जिसमें अपराध के दायरे का विस्तार किया गया था, जिसमें लिंग-योनि प्रवेश के अलावा अन्य मामले शामिल किए गए थे।

नई परिभाषा के अनुसार, किसी भी हद तक प्रवेश बलात्कार का गठन करेगा।

राज भौमिक बनाम त्रिपुरा राज्य में, त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने कहा, ".. वीर्य या शुक्राणु की उपस्थिति और यहां तक ​​कि वीर्य का उत्सर्जन भी बलात्कार के अपराध का गठन करने के लिए अनिवार्य नहीं है। यह आवश्यक नहीं है कि वीर्य के उत्सर्जन के साथ लिंग का पूरा प्रवेश होना चाहिए और अधिक से अधिक किसी भी मामूली सीमा तक प्रवेश , न कि स्‍खलन, बलात्कार के अपराध के लिए पर्याप्त है।"

उत्तराखंड हाईकोर्ट दल चंद्र बनाम उत्तराखंड राज्य (2018) में कहा था, योनि के स्वाब में वीर्य का न होना, अपने आप में, बलात्कार के सिद्धांत को बाहर करता है।

वी अरुमुगम गोविंदस्वामी और अन्य बनाम राज्य (2017) में कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था कि वीर्य के दाग छोड़े बिना भी बलात्कार का अपराध करना संभव है।

यह भी तय कानून है कि बलात्कार-पीड़ित की गवाही की पुष्टि की आवश्यकता नहीं होती है और उसी के आधार पर दोष संभव है। बलात्कार पीड़ितों द्वारा मरते समय दिए गए बयानों के आधार पर बलात्कार आरोपी को दोषी ठहराए जाने की कई मिसालें हैं।

इस मामले में पीड़िता से 14 सितंबर को यूपी के हाथरस जिले में चार लोगों ने कथित रूप से प्रताड़ित किया और सामूहिक बलात्कार किया। आरोप है कि अपराधियों ने पीड़िता की जीभ काट दी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह पुलिस को कोई बयान न दे और कई दिनों तक उसके परिवार को धमकी देती रहे।

उसे गंभीर हालत में खेत से बरामद किया गया और इलाज के लिए अलीगढ़ के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। 28 सितंबर को, उसे दिल्ली स्थानांतरित किया गया, जहां अस्पताल में अगले दिन उसने दम तोड़ दिया।

उसके परिवार की मर्जी के खिलाफ 29 सितंबर की सुबह में उसके शव का पुलिस ने अंतिम संस्कार कर दिया। पीड़ित परिवार ने शिकायत की कि उन्हें अंतिम संस्कार करने की अनुमति नहीं दी गई और दाह संस्कार के दौरान पुलिस द्वारा जबरन उन्हें घर में बंद कर दिया गया।

इस घटना पर आक्रोश व्यक्त करते हुए, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने स्वत: संज्ञान लिया और गृह सचिव, डीजीपी (पुलिस), एडीजीपी (कानून एवं व्यवस्था), जिला मजिस्ट्रेट, हाथरस को 12 अक्टूबर को अदालत में पेश होने के लिए कहा है।

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