हेट स्पीच के आरोपों पर असम के CM हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, FIR और SIT जांच की मांग
Praveen Mishra
11 Feb 2026 11:50 AM IST

सुप्रीम कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक और रिट याचिका दायर की गई है, जिसमें असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर राज्य के एक अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ कथित रूप से घृणा भाषण (हेट स्पीच) देने का आरोप लगाते हुए त्वरित हस्तक्षेप की मांग की गई है।
याचिकाकर्ताओं में वरिष्ठ शिक्षाविद् डॉ. हीरेन गोहाईं, असम के पूर्व पुलिस महानिदेशक हरेकृष्ण डेका, 'नॉर्थईस्ट नाउ' के संपादक परेश चंद्र मालाकार और वरिष्ठ अधिवक्ता शांतनु बोरठाकुर शामिल हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक भाषणों, मीडिया इंटरैक्शन और सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से बंगाली मूल के मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार तथा हिंसा को उकसाने वाले बयान दिए हैं।
सीनियर एडवोकेट रूपाली सैमुअल ने चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत के समक्ष मामले का उल्लेख करते हुए त्वरित सुनवाई की मांग की। उन्होंने अनुरोध किया कि इस याचिका को पहले से लंबित समान मुद्दे वाली याचिका के साथ सूचीबद्ध किया जाए, जिस पर CJI ने सहमति जताई। उल्लेखनीय है कि एक दिन पहले CPI(M) और CPI द्वारा भी सरमा के खिलाफ FIR दर्ज करने और न्यायालय-निगरानी में SIT जांच की मांग को लेकर याचिका का उल्लेख किया गया था।
याचिका में लगाए गए आरोप
याचिका में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री ने धर्म, भाषा, जन्मस्थान और निवास के आधार पर वैमनस्य और घृणा फैलाने वाले बयान दिए। इसमें आरोप है कि उन्होंने “मिया” और “बांग्लादेशी” जैसे शब्दों का प्रयोग किया, जिन्हें याचिका में बंगाली मूल के मुसलमानों के खिलाफ अपमानजनक बताया गया है, और समुदाय के सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार की अपील की।
याचिका के अनुसार, 25 और 27 जनवरी 2026 को असम में मतदाता सूची के संक्षिप्त पुनरीक्षण पर टिप्पणी करते हुए मुख्यमंत्री ने कथित रूप से कहा कि नोटिस चयनात्मक रूप से जारी किए जा रहे हैं और “मिया वोट” सीमित किए जाने चाहिए। यह भी आरोप है कि उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराने का निर्देश दिया।
एक अन्य कथित बयान में मुख्यमंत्री पर आरोप है कि उन्होंने लोगों से समुदाय को “परेशान करने” और ऐसी परिस्थितियां पैदा करने की अपील की, जिससे वे असम में रह न सकें। याचिका में 7 फरवरी 2026 को असम भाजपा के आधिकारिक X हैंडल पर साझा एक वीडियो का भी उल्लेख है, जिसमें सरमा कथित रूप से बंदूक पकड़े “पॉइंट ब्लैंक शूट” शब्दों का प्रयोग करते दिखाई दिए।
कानूनी आधार
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इन बयानों से प्रथम दृष्टया धार्मिक वैमनस्य और हिंसा भड़काने के अपराध बनते हैं, फिर भी राज्य पुलिस ने कोई स्वतः संज्ञान लेकर FIR दर्ज नहीं की। उनका कहना है कि जब कथित आरोपी स्वयं राज्य का सर्वोच्च कार्यकारी पद संभाल रहा हो, तब कानून प्रवर्तन एजेंसियों की निष्क्रियता दंडमुक्ति का माहौल पैदा करती है।
याचिका में Tehseen S. Poonawalla v. Union of India (2018) और Shaheen Abdulla v. Union of India के फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया है कि घृणा भाषण की स्थिति में राज्य की कार्रवाई वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य है, और बिना औपचारिक शिकायत के भी FIR दर्ज की जानी चाहिए।
मांगी गई राहत
याचिका में मुख्यमंत्री और उनके सहयोगियों द्वारा कथित हेट स्पीच को तत्काल रोकने, विशेष जांच दल (SIT) गठित करने या वैकल्पिक रूप से सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक आयोग बनाकर जांच की निगरानी करने का अनुरोध किया गया है। साथ ही, मुख्यमंत्री पर अनुच्छेद 164(3) के तहत लिए गए संवैधानिक शपथ के उल्लंघन के लिए कार्रवाई की मांग की गई है।
याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का त्वरित हस्तक्षेप आवश्यक है, ताकि अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत प्रदत्त समानता, गैर-भेदभाव, गरिमा और जीवन के अधिकार केवल “कागज़ी प्रावधान” बनकर न रह जाएं।

