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गुजरात दंगे- माया कोडनानी को बरी करने के फैसले के खिलाफ कोई अपील दायर नहीं की गई; विहिप के लोगों को कई मामलों में अभियोजक नियुक्त किया गया: कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया

LiveLaw News Network
11 Nov 2021 7:12 AM GMT
गुजरात दंगे- माया कोडनानी को बरी करने के फैसले के खिलाफ कोई अपील दायर नहीं की गई; विहिप के लोगों को कई मामलों में अभियोजक नियुक्त किया गया: कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया
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सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने बुधवार को गुजरात दंगों की साजिश के मामले में यह दिखाने के लिए कि एसआईटी ने उचित जांच नहीं की थी, सुप्रीम कोर्ट को बताया कि एसआईटी ने नरोदा से भाजपा की पूर्व विधायक माया कोडनानी को बरी करने के गुजरात हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती नहीं दी है, जबकि उन्हें निचली अदालत ने 2002 के नरोदा पाटिया नरसंहार में 'किंगपिन' के रूप में पहचाना था।

जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी ने गुजरात में दंगों के मामलों की जांच अपने हाथ में ली थी, उस समय कोडनानी को मामले में एक प्रमुख आरोपी के रूप में नामित किया गया था। एसआईटी के अनुसार 28 फरवरी, 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में आग लगने के एक दिन बाद जब विश्व हिंदू परिषद (विहिप) द्वारा बुलाए गए बंद को लागू कराने के लिए भीड़ जमा हुई थी, उस समय कोडनानी ने, विहिप के गुजरात सचिव जयदीप पटेल के साथ भीड़ को भड़काने के इरादे से हेट स्पीच दी थी। घटना के 11 चश्मदीद थे। मुकदमे में विशेष अदालत ने पाया कि हिंसा की भयावहता काफी हद तक कोडनानी के कारण थी। अदालत ने उन्हें 28 साल की कैद की सजा सुनाते हुए कहा कि उन्होंने बंद के उद्देश्य से जमा हुई भीड़ को भड़काने में अहम भूमिका निभाई थी।

उन्हें सह-षड्यंत्रकारियों को अपराध के लिए उकसाने और साजिश को अंजाम देने के लिए गैरकानूनी भीड़ को जमा करने का उत्तरदायी ठहराया गया था। 2012 में विशेष अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया था, जिसके बाद 32 दोषियों ने गुजरात हाईकोर्ट में अपील की थी, जिनमें कोडनानी भी एक थी। उनकी अपील पर लगभग छह रेक्यूजल देखे गए थे। 2014 में गुजरात हाईकोर्ट ने बीमारी के आधार पर उन्हें जमानत दे दी और उनकी सजा को निलंबित कर दिया गया। बाद में 2018 में यह देखते हुए कि 11 गवाहों के बयानों में विसंगतियां उनके अपराध को निर्णायक रूप से स्थापित करने में विफल रहीं, हाईकोर्ट ने कोडनानी को बरी कर दिया। कोर्ट ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि एसआईटी के सामने आने के बाद ही उसका नाम दंगों से जुड़ा।

कोडनानी को बरी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा, "डॉ मायाबेन सुरेंद्रभाई कोडनानी, जो मूल रूप से 2009 के सेसंस केस नंबर.243 की अभियुक्त संख्या 37 है, को....उन अपराधों से बरी किया जाता है, जिन पर उन्हें संदेह का लाभ देकर आरोपित किया गया था।"

हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती नहीं देने के एसआईटी के राजनीतिक महत्व पर इशारा करते हुए, श्री सिब्बल ने टिप्पणी की - "यही दिखाता है!"

वह कांग्रेस नेता एहसान जाफरी की विधवा जकिया जाफरी की याचिका पर बहस कर रहे थे, जो 2002 के दंगों के दौरान गुलबर्ग सोसाइटी नरसंहार में मारे गए थे। उन्होंने दंगों के पीछे की बड़ी साजिश में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्य के अन्य उच्च पदाधिकारियों को एसआईटी द्वारा दी गई क्लीन चिट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

'विहिप के व्यक्तियों को लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त किया गया; आरोपी को जमानत का विरोध नहीं किया'

जाकिरा जाफरी की सुनवाई में सिब्बल ने यह भी बताया कि 2002 के दंगों के समय, विहिप से संबद्ध अधिवक्ताओं को लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्होंने 17.05.2010 की एसआईटी रिपोर्ट को पढ़कर सुनाया, "ऐसा प्रतीत होता है कि लोक अभियोजकों की नियुक्ति के लिए अधिवक्ताओं की राजनीतिक संबद्धता सरकार के लिए मायने रखती थी।"

सिब्बल ने संकेत दिया कि इन नियुक्तियों ने अंततः विहिप और अन्य संबद्ध दलों के सदस्यों को जमानत पाने में मदद की, क्योंकि लोक अभियोजक ने जानबूझकर जमानत आवेदनों का विरोध नहीं किया। हालांकि एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में टिप्पणियां की थीं, लेकिन दंगा मामलों के संबंध में लोक अभियोजकों की नियुक्तियों की कोई जांच नहीं हुई।

उन्होंने तर्क दिया कि एसआईटी ने जांच में "जानबूझकर कमियां" छोड़ी और दोषियों को पकड़ने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किए गए।

सिब्बल ने तर्क दिया कि एसआईटी ने किसी भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया, उनके बयान दर्ज नहीं किए, उनके फोन जब्त नहीं किए, या घटना स्‍थल का दौरा नहीं किया। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि एसआईटी ने तहलका पत्रिका द्वारा किए गए स्टिंग ऑपरेशन के टेपों को नजरअंदाज कर दिया, जिसमें कई लोगों ने हथियारों और बमों को जुटाने और हिंसा में अपनी भागीदारी के बारे में खुले बयान दिए थे।

हालांकि नरोदा पाटिया मामले में दोषसिद्धि के लिए उन्हीं टेपों का इस्तेमाल किया गया था और हालांकि गुजरात हाईकोर्ट ने टेप की प्रामाणिकता का समर्थन किया था, लेकिन एसआईटी ने जकिया जाफरी की शिकायत में उनकी अनदेखी की। सिब्बल ने प्रस्तुत किया कि एसआईटी ने स्टिंग टेप में व्यक्तियों के फोन भी जब्त नहीं किए और उनके कॉल डेटा रिकॉर्ड एकत्र नहीं किए।

सिब्बल ने इस बात पर प्रकाश डाला कि एसआईटी ने गुजरात के तत्कालीन एडीजीपी आरबी श्रीकुमार आईपीएस की गवाही को इस आधार पर खारिज कर दिया कि वह पदोन्नति से इनकार करने के कारण बयान दे रहे थे।

सिब्बल ने कहा, "उनकी (श्रीकुमार) गवाही की पुष्टि अन्य अधिकारियों ने की थी और इसलिए इसे खारिज नहीं किया जा सकता था।"

सिब्बल ने यह भी कहा कि पुलिस और प्रशासन की मिलीभगत की ओर इशारा करने वाले कारक थे, जिन्हें एसआईटी ने नजरअंदाज कर दिया।

सिब्बल ने कहा, "गोधरा में तुरंत कर्फ्यू घोषित कर दिया गया..लेकिन अहमदाबाद में 12 बजे तक कर्फ्यू घोषित नहीं किया गया था। और सुबह 7 बजे तक हजारों लोग इकट्ठा हो गए थे। वे स्वयं सेवक थे। उन्हें संदेश किसने दिया? कोई भी पुलिस अधिकारी तुरंत कर्फ्यू घोषित कर सकता था, ताकि हिंसा से बचा जा सके।"

उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक तनाव के संबंध में राज्य की खुफिया रिपोर्टों की अनदेखी की गई।

सिब्बल ने तहलका की रिपोर्ट के अंशों को भी पढ़ा और कहा कि उन्होंने 27 फरवरी 2002 से पहले बजरंग दल, विहिप और संघ परिवार के सदस्यों द्वारा हथियार जमा करने, डीजल और पाइप बम बनाने और अन्य राज्यों से गोला-बारूद आयात करने की साजिश को दिखाया था। उन्होंने बताया कि उन टेपों ने अहमदाबाद में एक विहिप कार्यकर्ता द्वारा संचालित खदान से डायनामाइट बमों की तस्करी की साजिश का सुझाव दिया था। सिब्बल ने कहा, इन पहलुओं की एसआईटी ने जांच नहीं की।

जस्टिस एएम खानविलकर, दिनेश माहेश्वरी और सीटी रविकुमार की बेंच के समक्ष आज भी सुनवाई जारी रहेगी।

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