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त्रिपुरा हाईकोर्ट ने कहा, सरकारी कर्मचारियों को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार

Avanish Pathak
12 Jan 2020 9:15 AM GMT
त्रिपुरा हाईकोर्ट ने कहा, सरकारी कर्मचारियों को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार
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त्रिपुरा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सरकारी कर्मचारी, त्रिपुरा सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1988 के नियम 5 के तहत लगाए गए प्रतिबंधों के अधीन, अपनी राजनीतिक मान्यताओं को रखने और व्यक्त करने के हकदार हैं।

चीफ जस्टिस अकिल कुरैशी ने कहा कि- "एक सरकारी कर्मचारी के रूप में, याचिकाकर्ता अभिव्यक्‍ति की आजादी के अधिकार से वंचित नहीं है, जो कि एक मौलिक अधिकार और जिस पर केवल वैध कानून के ज‌रिए ही रोक लगाई जा सकती है। वह अपने विचारों को रखने और उन्हें, जैसे भी चाहती है वैसे, व्यक्त करने की हकदार है, हालांकि वह कंडक्ट रूल्स के नियम 5 के उप-नियम (4) में तय की गई सीमाओं के अधीन हो।"

रूल 5(1) में कहा गया है कि कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी राजनीतिक दल या किसी ऐसे संगठन, जो राजनीति में हिस्‍सा लेता है, का सदस्य नहीं होगा, उससे अन्यथा जुड़ा नहीं होगा, ना ही किसी राजनीतिक आंदोलन या गतिविधि में शामिल होगा, सहायता के लिए सदस्यता लेगा, या किसी अन्य ढंग सहायता करेगा।

नियम 5 (4) में कहा गया है कि कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी भी विधायिका या स्थानीय अथॉरिटी के चुनाव में भाग नहीं ले सकता है, या उसमें प्रचार या हस्तक्षेप नहीं कर सकता है, या अपने प्रभाव का उपयोग कर सकता है।

दिसंबर 2017 में एक राजनीतिक कार्यक्रम में भाग लेने और फेसबुक पर एक राजनीतिक पोस्ट करने के लिए याचिकाकर्ता लिपिका पॉल को सेवानिवृत्ति से एक दिन पहले ‌निलंब‌ित कर दिया गया, जो स्टेट फीशरीज़ ‌डिपार्टमेंट में यूडीसी के रूप में कार्यरत थीं।

उनके खिलाफ कंडक्‍ट रूल 5 और सेंट्रल सिविल सर्विश (पेंशन) रूल, 1972 के नियम 9 (2) (बी) के तहत राजनीतिक रैली में भाग लेने के लिए और किसी राजनीतिक पार्टी के खिलाफ प्रचार करने और राजनेताओं के खिलाफ अपमानजनक और अभद्र टिप्पणी करने का आरोप लगाया गया था।

अनुशासनात्मक कार्रवाई के मामलों में अपने सीमित अधिकार क्षेत्र की ओर ध्यान दिलाते हुए, कोर्ट ने कहा,

"आमतौर पर न्यायालय ऐसे स्तर पर हस्तक्षेप नहीं करेगा, जहां विभाग ने केवल एक आरोप-पत्र जारी किया है और विभागीय जांच अभी पूरी नहीं की गई है ... हालांकि, ऐसे मामले आने चाहिए...जिसमें कोर्ट के हाथों बारीकी से जांच की आवश्यकता होगी और शुरुआत में ही विचार करने के लिए कि क्या आरोप-पत्र में लगाए गए आरोप सही है या नहीं। "

कोर्ट ने कहा कि कि भले ही पॉल राजनीतिक रैली में मौजूद थे, लेकिन उनकी "भागीदारी" में कोई संकेत नहीं है। जस्टिस कुरैशी ने एक रैली में मौजूद होने और सहभागी के बीच अंतर किया। उन्होंने कहा कि एक राजनीतिक रैली में याचिकाकर्ता की उपस्थिति मात्र से उसकी राजनीतिक संबद्धता तय नहीं होती।

" आरोपों से यह संकेत नहीं मिलता कि याचिकाकर्ता की गतिविधि से किसी भी तरीके से कंडक्ट रूल्स के नियम 5 के उप-नियम (4) का उल्लंघन हुआ है... एक रैली में मौजूद रहने और एक रैली में भागीदारी करने में के बीच महत्वपूर्ण अंतर है। जैसे कि सभी को पता है कि चुनाव के समय, राजनीतिक दलों, उनके नेताओं और नामांकित उम्मीदवारों द्वारा रैलियां निकाली जाती हैं, सभाएं होती है। ऐसे रैलियों और सभाओं में मौजूद दर्शक के रूप में मौजूद हर व्यक्ति के बारे में ये नहीं कहा जा सकता कि वो रैली में भाग ले रहा है। किसी व्यक्ति रैली में मौजूदा होना उसके राजनैतिक जुड़ाव को स्थापित नहीं करता है।"

अदालत ने पॉल के फेसबुक पोस्ट का भी अवलोकन किया और कहा कि उन्होंने अपनी पोस्ट में किसी भी राजनीतिक दल के पक्ष में या खिलाफ प्रचार नहीं किया है।

कोर्ट ने पॉल के निलंबन आदेश और अनुशासनात्मक कार्यवाही रद्द करने का आदेश दिया और उन्हें दो महीने की अवधि के भीतर सभी सेवानिवृ‌त्त‌ि के सभी लाभ देने का आदेश दिया।

पिछले साल, केरल हाईकोर्ट ने केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के खिलाफ की गई कथित अपमानजनक टिप्पणी को फारवर्ड करने के आरो‌प में निलंबित किए गए KSRTC के कंडक्टर को बहाल करने का निर्देश दिया था। हालांकि, उनकी बहाली अनुशासनात्मक कार्यवाही के अधीन थी।

जस्टिस मुहम्मद मुस्ताक ने उस फैसले में कहा था कि एक व्यक्ति को केवल एक कर्मचारी होने के कारण अपने विचारों को व्यक्त करने से रोका नहीं जा सकता है। लोकतांत्रिक समाज में, प्रत्येक संस्था लोकतांत्रिक मानदंडों द्वारा शासित होती है। स्वस्थ आलोचना एक बेहतर तरीका है। ।

जस्टिस मुस्ताक ने नवंबर 2018 में कहा था कि महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के एक का कर्मचारी का निलंबन, जिसने विश्वविद्यालय कर्मचारी संघ की सदस्यता से हटाने के बाद सोशल मीडिया पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियां कीं, अनुचित था।

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