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कांग्रेस से भाजपा में शामिल 10 विधायकों की अयोग्यता पर गोवा विधानसभा अध्यक्ष आदेश पारित करने को सहमत : एसजी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया

LiveLaw News Network
6 April 2021 3:03 PM GMT
कांग्रेस से भाजपा में शामिल 10 विधायकों की अयोग्यता पर गोवा विधानसभा अध्यक्ष आदेश पारित करने को सहमत : एसजी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया
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सुप्रीम कोर्ट को मंगलवार को बताया गया कि गोवा विधानसभा अध्यक्ष ने कांग्रेस से भाजपा में जाने वाले विधायकों की अयोग्यता के संबंध में अपने अंतिम आदेश को पारित करने पर सहमति व्यक्त की है।

सीजेआई की अगुवाई वाली तीन जजों वाली बेंच गोवा कांग्रेस प्रमुख गिरीश चोडणकर द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें गोवा विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे अयोग्य ठहराए जाने की कार्यवाही का शीघ्र निपटारा करें।

कोर्ट ने 20 अप्रैल 2021 को स्पीकर के आदेशों के बाद 21 अप्रैल को मामले की अगली सुनवाई करने का फैसला किया है।

प्रारंभ में एसजी मेहता द्वारा न्यायालय को सूचित किया गया था कि 29 अप्रैल को अध्यक्ष द्वारा आदेश पारित किए जाएंगे। हालांकि कोर्ट ने कहा कि 29 अप्रैल बेंच के लिए स्वीकार्य नहीं है, और स्पीकर को इससे पहले मामले निपटाने के लिए कहा गया है।

बेंच ने अवलोकन किया,

"इतनी लंबी देरी नहीं हो सकती है। 24 तारीख के बाद हम इस मामले को नहीं सुन सकते। 29 अप्रैल इस बेंच के लिए स्वीकार्य नहीं है।"

पीठ ने आगे कहा,

"सॉलिसिटर जनरल के रूप में आप उन्हें इसे जल्द निपटाने के लिए कह सकते हैं। क्या आप चाहते हैं कि एक नई बेंच इस मामले को फिर से सुने?"

एसजी मेहता ने निर्देश लिए और अदालत को सूचित किया कि अध्यक्ष 22 अप्रैल को आदेश पारित करने के लिए तैयार हैं। हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तारीख के साथ अपनी अस्वीकृति व्यक्त की और कहा कि सीजेआई बोबडे के 24 अप्रैल को कार्यालय छोड़ने से एक सप्ताह पहले आदेश पारित किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि अध्यक्ष उक्त तिथि को आदेश पारित नहीं करते हैं तो उनके पास योग्यता पर बहस करने के लिए पर्याप्त समय होना चाहिए।

सिब्बल ने कहा कि वह पूरी प्रक्रिया का मजाक बना रहे हैं। न्यायालय ने फरवरी में उनके बयान को दर्ज किया था कि अध्यक्ष 26 फरवरी को इसका निपटारा करेंगे। उन्होंने कहा कि भले ही आदेश सुरक्षित कर दिए गए हों, लेकिन अध्यक्ष ने 26 फरवरी से अब तक इसे नहीं सुनाया है।

पीठ ने कहा कि फिर से पूछे जाने के बाद भी, अध्यक्ष ने कहा है कि वह केवल 22 अप्रैल को आदेश पारित कर सकते हैं।

सीजेआई ने कहा,

"हमने उन पर छोड़ दिया है, वह कह रहे हैं कि वह 22 तारीख को आदेश पारित करेंगे। हमें नहीं पता कि क्या करना है।"

सिब्बल ने यह कहते हुए जवाब दिया कि कोर्ट इन मामलों में असहाय नहीं हो सकता है।

सिब्बल ने कहा,

"यदि वह आदेश पारित नहीं करते हैं तो मैं योग्यता पर तर्क नहीं दे पाऊंगा। यह अनुचित है। वह आदेश पारित नहीं कर रहे हैं !"

इस समय, पीठ ने एसजी मेहता से निर्देश प्राप्त करने के लिए कहा कि क्या अध्यक्ष 20 अप्रैल को आदेश पारित कर सकते हैं। एसजी मेहता ने अदालत को सूचित किया कि अध्यक्ष 20 अप्रैल को आदेश पारित करने के लिए सहमत हो गए हैं।

बेंच ने जवाब दिया,

"माफ कीजिए. संवैधानिक मशीनरी का प्रतिनिधित्व करते हुए हमें ऐसा करना होता है, " एसजी ने कहा। "हम इसमें आपसे कहीं ज्यादा सचेत हैं।"

इससे पहले 16 जून 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने गोवा विधानसभा स्पीकर को एक महीने के भीतर कांग्रेस के 10 बागी विधायकों की अयोग्यता पर फैसला लेने का निर्देश देने की मांग करने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया था।

गोवा के कांग्रेस अध्यक्ष गिरीश चोडणकर द्वारा दायर याचिका पर मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने तीन सप्ताह के भीतर जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया था। याचिका में कहा गया है कि अयोग्य ठहराए जाने वाली याचिका अगस्त 2019 से पहले लंबित है, उस पर स्पीकर को शीघ्रता से फैसला करना चाहिए।

अतिरिक्त रूप से याचिका में 10 विधायकों को भाजपा विधायकों और मंत्रियों के रूप में कार्य करने से रोकने की मांग भी की गई है।

याचिका में कहा गया है कि स्पीकर ने अयोग्यता का फैसला करने के लिए 3 महीने की समयसीमा का उल्लंघन किया है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर विधायक दलबदल के मुद्दे से संबंधित अपने हालिया फैसले में निर्धारित किया है।

जुलाई 2019 में, गोवा में 15 कांग्रेस विधायकों में से दस ने पार्टी छोड़ दी और भाजपा में विलय कर लिया, जिससे सत्तारूढ़ पार्टी की ताकत 27 से बढ़कर 40 हो गई।

विपक्षी दल द्वारा 10 विधायकों के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिका अगस्त 2019 से विधानसभा स्पीकर राजेश पटनेकर के समक्ष लंबित है।

चोडणकर की याचिका में कांग्रेस के 10 विधायकों के भाजपा के साथ विलय को चुनौती दी गई है, क्योंकि पार्टी या गोवा इकाई में कोई "विभाजन" नहीं था।

याचिका सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर भी निर्भर करती है, जिसमें कहा गया था कि संसद को "पुनर्विचार" करना चाहिए कि क्या एक सदन के अध्यक्ष के पास विधायकों को अयोग्य ठहराने की शक्तियां जारी रखनी चाहिए क्योंकि वो "विशेष राजनीतिक दल के होते हैं।"

"यह समय है कि संसद को इस बात पर पुनर्विचार करना है कि क्या अयोग्य ठहराए जाने वाली याचिकाओं को अध्यक्ष को एक अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी के रूप में सौंपा जाना चाहिए, जबकि ऐसा अध्यक्ष किसी विशेष राजनीतिक दल से संबंधित होता है।

सुप्रीम कोर्ट,

संसद गंभीरता से संविधान में लोकसभा और विधानसभाओं के अध्यक्षों की बजाए अयोग्य ठहराए जाने के विवादों के मध्यस्थ के रूप में दसवीं अनुसूची के तहत एक स्थायी न्यायाधिकरण को नियुक्त कर सकती है, जिसकी अध्यक्षता किसी सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश करें या कुछ स्वतंत्र मैंकेनिज्म पर विचार कर सकती है, जो ये सुनिश्चित करे कि इस तरह के विवादों को तेज़ी से और निष्पक्ष रूप दोनों तरह से तय किया जाए, इस प्रकार दसवीं अनुसूची में निहित प्रावधानों को वास्तविक दांत प्रदान किए जा सकते हैं, जो हमारे लोकतंत्र के समुचित कार्य में महत्वपूर्ण हैं।"

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