गाजियाबाद में वकीलों पर हमले का मामला: पुलिस की निष्क्रियता के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे वकील
Shahadat
2 Nov 2026 8:14 PM IST

अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने 'हत्या के प्रयास' (Attempt to Murder) के तहत FIR दर्ज नहीं की। यह घटना अवैध निर्माण विवाद से जुड़ी है, जिसमें कुछ अज्ञात लोगों ने वकीलों के एक समूह (जिसमें एक महिला वकील भी शामिल थीं) पर हमला कर दिया था।
याचिकाकर्ताओं 1 (ए. दीपा), 2 (ए. देब कुमार), 3 (विपिन शर्मा) और 4 (अनूप गोयल) का आरोप है कि 22 अक्टूबर को उन पर बेरहमी से हमला किया गया। याचिका में बताया गया कि रात करीब 9 बजे, अमित वर्मा और उनके बेटे राहुल वर्मा कुछ अज्ञात लोगों को रिहायशी परिसर में ले आए। इन लोगों ने चारों वकीलों और उन्हें बचाने की कोशिश कर रहे अन्य निवासियों के साथ मारपीट की।
इसके बाद याचिकाकर्ता 1 ने इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन में घटना की शिकायत दर्ज कराई। मेडिकल जांच के बाद और CCTV फुटेज की पुष्टि होने पर FIR दर्ज की गई। याचिकाकर्ताओं की शिकायत यह है कि पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की केवल हल्की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया, जैसे कि धारा 115(2) (जानबूझकर चोट पहुंचाने के लिए सजा), 131 (हमला या आपराधिक बल का प्रयोग), 191(2) (दंगा करना), और 352/352(2) (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना)।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से पुलिस महानिदेशक (DGP) और पुलिस आयुक्त (Commissioner of Police) को एक पत्र भी भेजा गया। इसमें कहा गया कि याचिकाकर्ता 1 ने हमले की भयावहता के बारे में विस्तृत बयान दिया था, लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने चोटों की गंभीरता को देखते हुए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कोई सख्त धारा नहीं लगाई है।
कहा गया,
"अब तक, FIR नंबर 880/2026 में BNS, 2023 की कोई भी सख्त धाराएं नहीं जोड़ी गई हैं। 7 दिन से अधिक का समय बीत चुका है और स्थानीय पुलिस आरोपियों को पकड़ने में नाकाम रही है। इससे पीड़ित और उनके परिवार लगातार बदले की कार्रवाई और गंभीर शारीरिक नुकसान के खतरे का सामना कर रहे हैं। इसलिए याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि BNS, 2023 की सख्त धाराएं जोड़ी जाएं, मामले की प्रभावी जांच हो, उचित सुरक्षा दी जाए और इस मामले में एक स्टेटस रिपोर्ट पेश की जाए।"
याचिकाकर्ताओं ने इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन को निर्देश देने की मांग की कि FIR में BNS की धारा 74 (महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग), धारा 109 (हत्या का प्रयास), और धारा 117(3) (जानबूझकर गंभीर चोट पहुंचाना, जिसके परिणामस्वरूप स्थायी विकलांगता या कोमा हो जाए) को जोड़ा जाए।
यह भी बताया गया कि 25 अक्टूबर को पुलिस ने वकीलों के खिलाफ एक क्रॉस-FIR दर्ज की थी। इसके बाद जांच अधिकारी को बदल दिया गया, जिसके बाद बयान फिर से दर्ज किए गए।
याचिकाकर्ताओं ने अनुरोध किया कि जांच को दिल्ली के किसी पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित किया जाए, क्रॉस-FIR को रद्द किया जाए, और यदि आवश्यक हो तो याचिकाकर्ताओं तथा उनके परिवार को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की जाए। उन्होंने घटना की निष्पक्ष जांच के लिए निर्देश देने की मांग की, जिसमें बयान दर्ज करना, CCTV फुटेज को सुरक्षित रखना और उसकी जांच करना, तथा अन्य संबंधित साक्ष्यों को जुटाना शामिल है।
यह रिट याचिका 30 अक्टूबर को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के समक्ष मामले का उल्लेख किए जाने के बाद दायर की गई, जिन्होंने ऐसा करने का निर्देश दिया।
इसे वकील प्रणय कुमार महापात्रा के माध्यम से दायर किया गया।
Case Title : A DEEPA & ORS v STATE OF UTTAR PRADESH & ORS

