'बच्चों के मामले में भविष्य पर असर का ध्यान रखें': सुप्रीम कोर्ट ने दिया दुर्घटना में जीवन भर के लिए लकवाग्रस्त हुए शिशु को ₹83.38 लाख का मुआवज़ा
Shahadat
3 Aug 2026 7:46 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (3 अगस्त) को नाबालिग को दिए गए मुआवज़े को ₹45.40 लाख से बढ़ाकर ₹83.38 लाख किया। नाबालिग को रीढ़ की हड्डी में चोट के कारण 100% फंक्शनल डिसेबिलिटी (काम करने की क्षमता का नुकसान) हुई थी। कोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना के मामलों में मुआवज़ा पीड़ित की कमाई की क्षमता पर चोट के असल असर के आधार पर तय होना चाहिए, न कि सिर्फ़ मेडिकल डिसेबिलिटी के प्रतिशत के आधार पर।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने कहा,
"...जब किसी व्यक्ति को चोट के कारण स्थायी विकलांगता हो जाती है तो 'भविष्य की कमाई के नुकसान' के तहत मुआवज़े का आकलन इस बात पर निर्भर करेगा कि उस स्थायी दिव्यांगता का उसकी कमाई की क्षमता पर क्या असर पड़ा है। इसलिए यह देखना ज़रूरी है कि घायल व्यक्ति की कमाई की क्षमता पर स्थायी दिव्यांगता का क्या असर हुआ है... स्थायी दिव्यांगता वाले नाबालिग की तुलना ऐसे व्यक्ति से नहीं की जा सकती, जो कोई काम नहीं करता, सिर्फ़ इसलिए कि दुर्घटना के समय वह कोई नौकरी नहीं कर रहा था। बच्चों के मामलों में कानून को उस भविष्य को ध्यान में रखना चाहिए जो खो गया है, न कि सिर्फ़ उस स्थिति को जो दुर्घटना के समय थी।"
बेंच ने ओडिशा हाईकोर्ट के उस फ़ैसले में बदलाव किया, जिसमें बच्चे को ₹45.40 लाख का मुआवज़ा दिया गया। हाईकोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर उसकी स्थायी दिव्यांगता को 90% माना था और उसकी फंक्शनल डिसेबिलिटी पर विचार नहीं किया।
कोर्ट ने कहा,
"...हालांकि स्थायी शारीरिक दिव्यांगता का आकलन और सर्टिफ़िकेशन 90% किया गया, लेकिन फंक्शनल डिसेबिलिटी टेस्ट लागू करने पर यह साफ़ है कि उसके लिए जीविका कमाने के लिए कोई काम करना असंभव होगा। उसकी भविष्य की कमाई की क्षमता पूरी तरह से खत्म हो गई; बल्कि समाप्त हो गई। इसलिए हालांकि स्थायी शारीरिक दिव्यांगता का आकलन और सर्टिफ़िकेशन 90% किया गया, लेकिन उसकी फंक्शनल डिसेबिलिटी पूरी यानी 100% है। इसलिए उसकी दिव्यांगता को 100% माना जाएगा।"
यह मामला 2015 की एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है, जिसमें छह महीने के शिशु को रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोटें आईं और बाद में उसे 'पोस्ट-ट्रॉमा मायलोपैथी विद पैराप्लेगिया' (दुर्घटना के बाद रीढ़ की हड्डी में चोट से लकवा) का पता चला। कोर्ट के सामने पेश मेडिकल सबूतों से यह साबित हुआ कि बच्ची को 90% स्थायी दिव्यांगता है जो ठीक नहीं हो सकती, और उसे जीवन भर इलाज, दवा और मदद की ज़रूरत होगी।
MACT ने मुआवज़ा दिया था और हाईकोर्ट ने उस फ़ैसले में कुछ बदलाव किए, लेकिन बच्ची की माँ ने मुआवज़ा बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की। उनका तर्क था कि मुआवज़े में चोट के कारण जीवन भर भुगतने वाले नतीजों को ठीक से ध्यान में नहीं रखा गया।
अपील मंज़ूरी करते हुए जस्टिस भुयन के फ़ैसले में कहा गया:
"...गंभीर चोटों से पीड़ित बच्चों के मामलों में मुआवज़ा सिर्फ़ पारंपरिक आधारों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इस कोर्ट ने पीड़ित बच्ची को जीवन भर होने वाले नुकसान पर विचार किया और उसकी स्थायी निर्भरता, भविष्य की ज़रूरतों और सामान्य जीवन के पूरी तरह खत्म हो जाने को ध्यान में रखते हुए मुआवज़ा तय किया... इसलिए मुआवज़ा मांगने वाले घायल बच्चे बिल्कुल अलग स्थिति में होते हैं। ऐसे मामलों में मुआवज़ा तय करते समय कोर्ट को यह ध्यान रखना चाहिए कि जो चीज़ छिन गई, वह सिर्फ़ शारीरिक क्षमता नहीं, बल्कि बच्चे का पूरा भविष्य है।"
कोर्ट ने काजल बनाम जगदीश चंद मामले का ज़िक्र करते हुए यह बात कही, जिसमें माना गया कि "गंभीर दिव्यांगता से पीड़ित बच्चों के मामलों में सामान्य सिद्धांत लागू करने से पीड़ित को उचित मुआवज़ा नहीं मिल सकता।"
इस तरह कोर्ट ने 18 का मल्टीप्लायर (गुणांक) फिर से लागू किया (हाईकोर्ट द्वारा लागू 15 के बजाय), जैसा कि काजल और बेबी साक्षी ग्रेओला जैसे बच्चों से जुड़े हालिया मामलों में किया गया। साथ ही कोर्ट ने कहा कि बच्चों के मामले में संबंधित राज्य में कुशल मज़दूर (Skilled Workman) को मिलने वाली न्यूनतम मज़दूरी को ही काल्पनिक आय (Notional Income) माना जाना चाहिए, न कि अकुशल मज़दूर (unskilled labourer) की आय को।
कोर्ट ने कहा,
"MACT ने घायल बच्ची की आय को अकुशल मज़दूर की आय मानकर गलती की थी। दिलचस्प बात यह है कि हाई कोर्ट ने भी MACT के इस नज़रिए को सही और उचित माना था।"
नतीजतन, अपील मंज़ूर की गई।
कोर्ट ने कहा,
"इसके अनुसार, बीमा कंपनी द्वारा अपीलकर्ता को दिया जाने वाला मुआवज़ा 45,40,800.00 रुपये से बढ़ाकर 83,38,360.00 रुपये किया गया। अपीलकर्ता क्लेम याचिका दायर करने की तारीख से लेकर मुआवज़ा मिलने तक 9% सालाना की दर से ब्याज पाने का भी हकदार होगा।"
Cause Title: GAYATREE PATTNAIK FOR SHREEJITA PATTNAIK VERSUS ARUNDHATI SAHOO AND ANR.


