CJI सूर्यकांत लॉ ग्रेजुएट कर रहे स्टूडेंट्स को किया संबोधित, कहा- पेशे में कबड्डी रेडर की तरह का अनुशासन अपनाएं

Shahadat

15 March 2026 8:23 PM IST

  • CJI सूर्यकांत लॉ ग्रेजुएट कर रहे स्टूडेंट्स को किया संबोधित, कहा- पेशे में कबड्डी रेडर की तरह का अनुशासन अपनाएं

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने शनिवार को लॉ के ग्रेजुएट स्टूडेंट्स से आग्रह किया कि वे अपने पेशेवर जीवन में एक कबड्डी रेडर जैसा अनुशासन अपनाएं। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि महत्वाकांक्षा के साथ-साथ संयम, विनम्रता और अपनी जड़ों से लगातार जुड़े रहना कितना ज़रूरी है।

    महेंद्रगढ़ में हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के 12वें दीक्षांत समारोह में अपना संबोधन देते हुए चीफ जस्टिस ने एक कबड्डी रेडर का उदाहरण देकर समझाया कि लोगों को अपने मूल्यों और सीमाओं को नज़रअंदाज़ किए बिना सफलता की ओर कैसे बढ़ना चाहिए।

    हरियाणा से गहरे तौर पर जुड़े इस खेल का ज़िक्र करते हुए CJI ने बताया कि कैसे एक रेडर विरोधी टीम के पाले में "एक ही सांस में" प्रवेश करता है, लगातार "कबड्डी" का जाप करता रहता है और अपनी तरफ लौटने से पहले किसी डिफेंडर को छूने की कोशिश करता है। उन्होंने कहा कि यह जाप अनुशासन और आत्म-नियंत्रण का प्रतीक है।

    CJI ने समझाया,

    "जिस पल वह गलत पाले में दूसरी सांस लेता है, उसका खेल खत्म हो जाता है।"

    उन्होंने आगे कहा कि यह जाप रेडर को याद दिलाता है कि वह केवल उतनी ही दूर तक आगे बढ़ सकता है, जहाँ से वह सुरक्षित रूप से वापस लौट सके।

    CJI के अनुसार, सबसे बेहतरीन रेडर वे नहीं होते जो विरोधी टीम के इलाके में सबसे अंदर तक जाते हैं, बल्कि वे होते हैं, जो महत्वाकांक्षा और अति-महत्वाकांक्षा (हद पार करने) के बीच की सही सीमा को पहचानते हैं।

    उन्होंने कहा,

    "उनकी महानता उस दूरी में नहीं है, जो वे तय करते हैं, बल्कि उस सटीकता में है, जिससे वे महत्वाकांक्षा और अति-महत्वाकांक्षा के बीच की सीमा को पहचानते हैं।"

    इस तुलना को पेशेवर जीवन तक विस्तार देते हुए चीफ जस्टिस ने ग्रेजुएट छात्रों से कहा कि उनका करियर ही उनकी "रेड" होगी, उनकी परवरिश ही उनका "पाला" (कोर्ट) बनी रहेगी और उनकी शिक्षा ही वह "सांस" होगी, जो उन्हें ज़िंदा रखेगी। उन्होंने कहा कि इन तीनों से जुड़े रहना यह सुनिश्चित करेगा कि जीवन की चुनौतियों में वे कभी "आउट" न हों।

    अपनी खुद की यात्रा पर विचार करते हुए CJI ने बताया कि वे हरियाणा के अलग-अलग हिस्सों में पले-बढ़े और पढ़े-लिखे, और उन्होंने बिना किसी पेशेवर नेटवर्क के सहारे अपने कानूनी करियर की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि कई ग्रेजुएट छात्र भी ऐसे ही पृष्ठभूमि से आते हैं, जहां यूनिवर्सिटी की डिग्री मिलना कोई तय बात नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार की एक साझा आकांक्षा होती है।

    उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि पेशेवर जीवन में सफलता अक्सर क्लासरूम की प्रतिभा पर कम और परवरिश से मिले गंभीरता और जुझारूपन पर ज़्यादा निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि जो लोग अपने परिवारों को अभावों का सामना गरिमा और समझदारी से करते हुए देखते हुए बड़े होते हैं, और यह समझते हैं कि कड़ी मेहनत एक स्थायी सच्चाई है, उनमें अक्सर ज़िम्मेदारी और संयम की ऐसी भावना होती है, जो केवल औपचारिक शिक्षा से नहीं सीखी जा सकती।

    लोकतंत्र में उच्च शिक्षा की भूमिका पर ज़ोर देते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि यूनिवर्सिटी को सरकारी खजाने से पैसा मिलता है, इसलिए स्नातकों पर समाज के प्रति योगदान देने की एक नैतिक ज़िम्मेदारी बन जाती है। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाले संसाधन नागरिकों के टैक्स से आते हैं, जिनमें से कई लोगों को शायद खुद कभी विश्वविद्यालय जाने का मौका ही न मिले।

    इस संदर्भ में, उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि शिक्षित नागरिकों को उन संस्थाओं के साथ सक्रिय रूप से जुड़ना चाहिए, जो लोकतांत्रिक जीवन को बनाए रखती हैं, चाहे वे सार्वजनिक सेवा में हों या निजी पेशों में। उन्होंने कहा कि जो इंजीनियर ज़िम्मेदारी से निर्माण करते हैं, जो शिक्षक ईमानदारी से पढ़ाते हैं। साथ ही, जो पेशेवर काम में कोई कोताही नहीं बरतते, वे सभी गणतंत्र को मज़बूत बनाने में अपनी भूमिका निभाते हैं।

    CJI ने यूनिवर्सिटी को उसकी स्थापना के बाद से हुई प्रगति पर बधाई भी दी। साथ ही यह भी बताया कि इस साल पचास स्वर्ण पदक विजेताओं में से तीस महिलाएं थीं; उन्होंने इसे उच्च शिक्षा में लैंगिक अंतर को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

    अपने संबोधन के अंत में चीफ जस्टिस ने ग्रेजुएट से आग्रह किया कि वे अपने परिवारों के बलिदानों, अपनी परवरिश के अनुशासन और उन्हें मिली शिक्षा को हमेशा याद रखें। उन्होंने कहा कि सफलता पाने की चाह तो होनी चाहिए, लेकिन यह समझ भी होनी चाहिए कि कितनी दूर तक जाना है। साथ ही वह विवेक भी होना चाहिए, जिससे वे उन मूल्यों की ओर लौट सकें जिन्होंने उन्हें गढ़ा है।

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