फाइनेंसर ज़बरदस्ती गाड़ियां ज़ब्त नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रक मालिक को 10 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया

Shahadat

16 Sept 2026 10:13 PM IST

  • फाइनेंसर ज़बरदस्ती गाड़ियां ज़ब्त नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रक मालिक को 10 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गिरवी रखी गई गाड़ी को खुद से ज़ब्त करने का फाइनेंसर का अधिकार ज़बरदस्ती, धोखे या लोन एग्रीमेंट की शर्तों का उल्लंघन करके इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। लोन की वसूली या गाड़ी ज़ब्त करने का काम सिर्फ़ कानूनी तरीकों से ही किया जा सकता है।

    कोर्ट ने एक ट्रक मालिक को मुआवज़ा देने का भी आदेश दिया, जिसकी गाड़ी को बिना किसी पहले नोटिस के रात 1 बजे स्टीयरिंग लॉक तोड़कर ज़ब्त कर लिया गया।

    जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की रिट याचिका यह कहते हुए खारिज की थी कि गाड़ी बिक चुकी थी, उसने हाईकोर्ट में देर से अपील की थी और लोन की किश्तें चुकाने में भी चूक की थी।

    अपीलकर्ता ने 2019 में चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड से अपने ट्रक के लिए कमर्शियल गाड़ी का लोन लिया था, जिसके लिए गाड़ी को गिरवी रखा गया। साथ ही जून 2021 में एक अतिरिक्त लोन भी लिया था। पेमेंट में चूक के बाद कंपनी ने 2022 में एक बार गाड़ी ज़ब्त की, कुछ पेमेंट होने के बाद उसे छोड़ दिया और लगातार चूक होने पर और नोटिस जारी किए।

    2023 में जब उसकी गाड़ी CCTV की निगरानी में खड़ी थी, तो चार अनजान लोगों ने स्टीयरिंग लॉक तोड़कर उसे चलाकर ले गए। उसने उसी दिन ई-FIR दर्ज कराई, जिस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिसके बाद उसने पुलिस अधीक्षक (SP) के पास शिकायत दर्ज कराई। फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। एक कानूनी नोटिस के ज़रिए उसे पता चला कि कंपनी ने गाड़ी ज़ब्त करके बेच दी थी और गाड़ी बिकने के बाद भी उस पर कुछ रकम बकाया थी।

    चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने क्रिमिनल प्रोसीजर कोड, 1973 (CrPC, अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 175(3)) की धारा 156(3) के तहत अपीलकर्ता द्वारा दायर शिकायत को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि चूक के कारण गाड़ी ज़ब्त की गई।

    इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की गई, जिसे भी खारिज कर दिया गया।

    हाईकोर्ट के फ़ैसले से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

    Case: Hari Dutta Sharma v State of UP & Ors

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