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किसान संगठन संशोधन पर चर्चा के लिए समिति के समक्ष पेश नहीं होंगे, वे पूरी तरह आश्वस्त हैं कि कृषि कानूनों को निरस्त करने की आवश्यकताः दवे, भूषण ने सुप्रीम कोर्ट को बताया

LiveLaw News Network
20 Jan 2021 10:06 AM GMT
किसान संगठन संशोधन पर चर्चा के लिए समिति के समक्ष पेश नहीं होंगे, वे पूरी तरह आश्वस्त हैं कि कृषि कानूनों को निरस्त करने की आवश्यकताः दवे, भूषण ने सुप्रीम कोर्ट को बताया
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किसान संगठन 'पूरी तरह आश्वस्त' हैं कि कृषि कानूनों को निरस्त करने की आवश्यकता है, इसलिए संशोधन पर चर्चा करने के लिए वे समिति के समक्ष पेश नहीं होंगे। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे और अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने यह प्रस्तुती दी।

भूषण और दवे उन आठ किसान संगठनों की ओर से पेश हुए, जिन्हें पिछले साल दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादी के रूप में जोड़ा था। उन्हें दिल्ली सीमा पर विवादास्पद कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों को हटाने की मांग कर रहे मामलों में प्रतिवादी बनाया गया था।

भूषण ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की अगुवाई वाली खंडपीठ को बताया कि किसान विशेष रूप से इस‌लिए आंदोलन कर रहे हैं क्योंकि विवाद‌ित कानून बिना किसी चर्चा के पारित हो गए थे, और राज्यसभा में इन पर मतदान तक नहीं किया गया।

भूषण और दवे ने पीठ को बताया कि उनके मुवक्किलों ने 12 जनवरी को कृ‌षि कानूनों पर बातचीत करने के लिए अदालत द्वारा गठित समिति द्वारा आयोजित वार्ता में भाग नहीं लेने का फैसला किया है।

ज‌स्ट‌िस एएस बोपन्ना और वी रामसुब्रमणियन की पीठ ने भारतीय किसान महापंचायत द्वारा समिति के पुनर्गठन के लिए दायर एक आवेदन पर नोटिस जारी करने के आदेश में इन प्रस्तुतियों को दर्ज किया।

दवे ने यह भी स्पष्ट किया कि 12 जनवरी को उनकी गैर-उपस्थिति इसलिए थी कि उनकी 'बोना फाइड समझ' थी कि मामला आदेश के लिए सूचीबद्ध था, ना कि सुनवाई के लिए।

उन्होंने यह सफाई सीजेआई के यह पूछने के बाद दी कि समिति के गठन का आदेश पारित होने समय वह पेश क्यों नहीं हुए थे।

किसाना संगठनों को रवैया बदलने की सलाह दें, सीजेआई ने भूषण से कहा

सीजेआई एसए बोबडे ने बुधवार को कहा कि प्रदर्शनकारी किसानों और उनकी यूनियनों को अपने रवैये को बदलने और विवाद के समाधान के लिए तत्पर रहना चाहिए।

उन्होंने एडवोकेट प्रशांत भूषण से कहा, "अपने मुवक्किलों को इस प्रकार समझाएं कि शांति स्‍थापित हो। हम विवाद का समाधान चाहते हैं।"

हम आपसे अनुरोध कर रहे हैं कि उन्हें अपना रवैया बदलने की सलाह दें।"

भूषण ने अदालत को बताया कि विवादास्पद कृषि कानूनों पर केंद्र सरकार के साथ बातचीत के लिए नियुक्त समिति के समक्ष पेश होने के लिए किसान संगठन तैयार नहीं हैं।

हालांकि भूषण ने खंडपीठ को आश्वासन दिया कि वह शांति बनाए रखने के लिए यूनियनों को समझा रहे हैं। उन्होंने बताया कि किसान संगठन गणतंत्र दिवस की रैली को भी शांतिपूर्वक करने की इच्छा रखते हैं।

भूषण ने कहा, "उन्होंने कॉल जारी की है कि पूर्ण शांति होनी चाहिए।"

इस बिंदु पर, अटॉर्नी जनरल ने कहा कि 5,000 ट्रैक्टरों को गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में प्रवेश करने की संभावना है और इसलिए सड़कों को बना कर रखना असंभव होगा। वे पूरे शहर में फैल जाएंगे।

सीजेआई ने हालांकि, भूषण की प्रस्तुतियों पर भरोसा जताया कि किसान शांतिपूर्वक प्रदर्शन करना चाहते हैं, और एजी को बताया कि मामला विशुद्ध रूप से कार्यकारी के क्षेत्र में है।

सुनवाई के दरमियान सीजेआई ने एजी को बताया कि दिल्ली में प्रवेश का सवाल कानून और व्यवस्था की स्थिति है, जिसे पुलिस द्वारा निर्धारित किया जाना है।

सीजेआई ने कहा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "मानदंड यह है कि पुलिस तय करती है कि अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं। आप देश के कार्यकारी हैं और निर्णय लेने का अधिकार है। आपके पास उचित आदेश पारित करने की शक्तियां हैं। न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता।"

सीजेआई की टिप्पणी के बाद दिल्ली पुलिस ने रैली के खिलाफ निषेधाज्ञा की मांग करते हुए अपना आवेदन वापस ले लिया।

12 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कृषि कानूनों के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी थी और किसानों के साथ बातचीत के लिए एक समिति का गठन किया था। समिति को 2 महीने के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था।

हालांकि, प्रदर्शनकारी यूनियनों ने कहा कि वे समिति के सामने पेश नहीं होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा था कि इस कार्यान्वय को स्‍थगित करने से "किसानों की भावनाओं को लगी ठेस" कम होगी और यह "उन्हें वापस लौटने के लिए प्रोत्साहित करेगा"।

समिति की संरचना की एक उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि सभी चार सदस्यों- बीएस मान, अशोक गुलाटी, डॉ प्रमोद कुमार जोशी और अनिल घणावत ने कृषि कानूनों के कार्यान्वयन के समर्थन में खुल कर विचार प्रकट कर चुके हैं।

प्रदर्शनकारी यूनियनों ने कहा कि वे एक ऐसी समिति के सामने पेश नहीं होंगे, जिसमें केवल एक पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य हों।

विरोध के बाद, बीएस मान ने घोषणा की ‌थी कि वह अदालत द्वारा नियुक्त समिति से हट रहे हैं।

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