CBSE के त्रि-भाषा नियम के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं पूर्व सांसद फ़ौज़िया खान, दी यह दलील
Shahadat
9 Jun 2026 11:26 AM IST

सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) के उस फ़ैसले को चुनौती देने वाले मामले में इंटरवेंशन एप्लीकेशन (हस्तक्षेप याचिका) दायर की गई है, जिसके तहत इस साल 1 जुलाई से कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीसरी भाषा अनिवार्य कर दी गई।
याचिकाकर्ता डॉ. फ़ौज़िया खान एक शिक्षाविद, पूर्व सांसद और महाराष्ट्र की पूर्व मंत्री हैं। उनका तर्क है कि यह सर्कुलर अनुचित है। उनका कहना है कि हालांकि यह नियम देखने में तो भारतीय भाषाओं को अनिवार्य करके भारत की भाषाई विरासत को बढ़ावा देने वाला लग सकता है, लेकिन यह इन भाषाओं की सार्थक पढ़ाई के लिए ज़रूरी संस्थागत ढांचा प्रदान करने में विफल रहता है। नतीजतन, उनका तर्क है कि यह नीति छात्रों पर केवल औपचारिक अनुपालन का बोझ डालती है, जबकि उन भाषाओं से जुड़ी वास्तविक विरासत और विद्वतापूर्ण परंपराएं लगातार कम होती जा रही हैं।
यह हस्तक्षेप याचिका उस जनहित याचिका (यशिका भंडारी जैन और अन्य बनाम भारत सरकार) में दायर की गई, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने पहले केंद्र सरकार, NCERT और CBSE से जवाब मांगा था।
सर्कुलर के अनुसार, CBSE ने कक्षा 9 के लिए तीन अनिवार्य भाषाएं (R1, R2 और R3) तय कीं, जिनमें से कम-से-कम दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए; यह नियम 1 जुलाई से लागू होगा। जो छात्र विदेशी भाषा पढ़ना चाहते हैं, वे इसे तीसरी भाषा के रूप में पढ़ सकते हैं (बशर्ते अन्य दो भारतीय भाषाएं हों) या फिर चौथी भाषा के रूप में पढ़ सकते हैं।
पहले के सर्कुलर के अनुसार, कक्षा 9 और 10 के छात्रों को केवल दो अनिवार्य भाषाएं पढ़नी होती थीं, जबकि तीसरी भाषा वैकल्पिक होती थी। इसके अलावा, 9 अप्रैल को CBSE ने 'कक्षा IX-X सत्र 2026-27 में भाषाओं से संबंधित सवालों के जवाब' शीर्षक से एक नोटिफिकेशन जारी किया, जिसमें उसने तीसरी भाषा को अनिवार्य बनाने के फ़ैसले को स्पष्ट रूप से शैक्षणिक सत्र 2029-30 तक के लिए टाल दिया था।
CBSE के पहले के सर्कुलर का हवाला देते हुए डॉ. फ़ौज़िया खान ने मुख्य याचिकाकर्ता जैसा ही रुख अपनाया। उनका तर्क है कि 15 मई का सर्कुलर बोर्ड के 9 अप्रैल के नोटिफिकेशन के खिलाफ है। अपनी इंटरवेंशन एप्लीकेशन में, वह कहती हैं कि 36 दिनों के अंदर CBSE का अचानक रुख बदलना मनमाना और बेतुका है, खासकर इसलिए, क्योंकि छात्रों, माता-पिता या शिक्षकों को कोई कारण नहीं बताया गया और यह फ़ैसला बिना सही सलाह-मशविरे या संबंधित लोगों की बात सुने बिना लिया गया।
डॉ. फ़ौज़िया ने तीसरी भाषा को अनिवार्य करने के कुछ नतीजों का ज़िक्र किया। उदाहरण के लिए, दक्षिण भारत में केंद्रीय विद्यालयों और CBSE से जुड़े स्कूलों में R3 कैटेगरी में आने वाली भाषाओं के लिए योग्य शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं।
याचिका में कहा गया,
"विवादित सर्कुलर खुद ही शिक्षकों की इस कमी को मानता है। फिर भी इसे लागू करने का आदेश देता है। नतीजा यह है कि दक्षिणी राज्यों में इस सर्कुलर का एकमात्र व्यावहारिक मकसद हिंदी को अनिवार्य रूप से लागू करना है, और उत्तरी राज्यों में संस्कृत को अनिवार्य रूप से लागू करना है, जबकि इसके पीछे कोई शैक्षिक तर्क नहीं दिया गया।"
उन्होंने कहा कि गैर-हिंदी राज्यों को R3 के तौर पर हिंदी या संस्कृत लागू करने के लिए मजबूर करना राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का भी उल्लंघन है। डॉ. खान ने 15 मई के उस सर्कुलर पर भी सवाल उठाए हैं जिसमें कक्षा 9 के छात्रों को सेकेंडरी स्टेज की पाठ्यपुस्तकें तैयार होने तक कक्षा 6 की R3 पाठ्यपुस्तकों को मुख्य शिक्षण संसाधन के तौर पर इस्तेमाल करने का निर्देश दिया गया। इससे योग्य भारतीय भाषा शिक्षकों की भारी कमी का पता चलता है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने इस स्थापित सिद्धांत की ओर भी इशारा किया है कि भाषा सीखना तब सबसे असरदार और स्थायी होता है, जब इसे शुरुआती चरण में खासकर किंडरगार्टन स्तर से ही शुरू किया जाए।
आगे कहा गया,
"जब राज्य बुनियादी स्तर पर भाषा नीति लागू करने में नाकाम रहा है तो वह उस नाकामी को ठीक करने के लिए सेकेंडरी शिक्षा ले रहे किशोर छात्रों पर पिछली तारीख से नई भाषा की लिपि, शब्दावली और व्याकरण सीखने का बोझ नहीं डाल सकता, जबकि वे पहले से ही बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी में व्यस्त हैं। ऐसा कदम छात्रों पर अनुचित और ज़रूरत से ज़्यादा बोझ डालता है, जिसका किसी भी जायज़ शैक्षिक मकसद से कोई तार्किक संबंध नहीं है।"
इसके अलावा, दखल देने वाली पक्षकार (intervenor) ने बताया कि शिक्षा 'लिस्ट III' (समवर्ती सूची) का विषय है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि केंद्र सरकार राज्यों से सलाह किए बिना और बिना किसी उचित कारण के किसी प्रशासनिक सर्कुलर के ज़रिए कोई अनिवार्य भाषा थोप सकती है। उनका तर्क है कि यह संघीय सिद्धांत का उल्लंघन है, जिसे एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) मामले में संविधान का 'मूल ढांचा' (basic structure) माना गया।
याचिका में तर्क दिया गया,
"विवादित सर्कुलर एकता और विविधता के उन मूल्यों पर चोट करता है, जो भारतीय गणराज्य की नींव हैं। भारत का संविधान भाषाई रूप से एक जैसे (homogeneous) राष्ट्र की कल्पना नहीं करता; यह एक ऐसे विविधतापूर्ण राष्ट्र की कल्पना करता है जहाँ क्षेत्रीय भाषाओं, अल्पसंख्यक भाषाओं और शास्त्रीय परंपराओं की समृद्धि को संरक्षित और सम्मानित किया जाता है। ऐसा सर्कुलर जो व्यावहारिक रूप से तमिलनाडु या कर्नाटक के छात्रों को हिंदी पढ़ने और हिंदी भाषी राज्यों के छात्रों को संस्कृत या कोई अन्य क्षेत्रीय भाषा पढ़ने के लिए मजबूर करता है। साथ ही सभी छात्रों को वैश्विक व्यापार और कूटनीति की उन भाषाओं को पढ़ने की आज़ादी से वंचित करता है, जिन्हें उन्होंने सही तरीके से चुना था, उसे राष्ट्रीय एकता के संवैधानिक उद्देश्य को आगे बढ़ाने वाला नहीं कहा जा सकता।"
डॉ. खान ने यह भी तर्क दिया है कि CBSE का सर्कुलर संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत संरक्षित धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक संस्थानों को बहुत ज़्यादा प्रभावित करता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि अल्पसंख्यक संगठन सालों से उर्दू को R1, अंग्रेज़ी को R2 और एक विदेशी भाषा के तौर पर पढ़ाते रहे हैं। हालांकि, अब अंग्रेज़ी को विदेशी भाषा घोषित कर दिया गया, जिससे छात्र एक अतिरिक्त विदेशी भाषा पढ़ने के लिए मजबूर हो गए।
दखल देने वाली पक्षकार ने 15 मई के सर्कुलर को रद्द करने की मांग की, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 21A और 'बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009' का उल्लंघन करता है। उन्होंने देवेश शर्मा बनाम भारत संघ (2023) के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि अनुच्छेद 21A गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को अनिवार्य बनाता है और शिक्षक की योग्यता या शिक्षण संसाधनों से कोई भी समझौता संवैधानिक आदेश का उल्लंघन होगा।
इसके अलावा, CBSE से यह निर्देश देने की भी मांग की गई कि 9 अप्रैल को आधिकारिक तौर पर घोषित भाषा ढांचे की स्थिति को बहाल किया जाए।
यह अर्ज़ी एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड राहुल श्याम भंडारी के ज़रिए दायर की गई।

