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लॉकडाउन के दौरान प्रवासी श्रमिकों को मजदूरी का भुगतान करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, इन असामान्य हालात में सभी अपना सर्वश्रेष्ठ करने की कोशिश कर रहे हैं

LiveLaw News Network
21 April 2020 8:31 AM GMT
लॉकडाउन के दौरान प्रवासी श्रमिकों को मजदूरी का भुगतान करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, इन असामान्य हालात में सभी अपना सर्वश्रेष्ठ करने की कोशिश कर रहे हैं
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को COVID19 महामारी के कारण लगाए गए लॉकडाउन के कारण सख्त परेशानी झेल रहे प्रवासी कामगारों की मजदूरी के भुगतान पर दायर याचिका पर सुनवाई की।

जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने कहा कि देश असामान्य स्थिति का सामना कर रहा है और इसमें शामिल सभी हितधारक अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की कोशिश कर रहे हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर और अंजलि भारद्वाज द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत केंद्र सरकार द्वारा लगाया गया लॉकडाउन का आदेश इस समान आपदा से प्रभावित नागरिकों के बीच मनमाने ढंग से भेदभाव कर रहा है।

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, याचिकाकर्ताओं के लिए पेश हुए और कहा कि अभी भी हजारों प्रवासी कामगार हैं जिनके पास भोजन और आश्रय नहीं है। उन्होंने ने कहा, "उन्होंने व्यवस्था का मजाक बनाया है।"

भूषण ने आगे कहा कि अनुसंधान और अध्ययनों के अनुसार जो रिकॉर्ड पर रखा गया था, 96% को सरकार से राशन नहीं मिला।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भूषण की दलीलों के स्रोत पर सवाल उठाते हुए कहा कि पूरे देश में सतर्क हेल्पलाइन हैं जो भोजन को उन लोगों तक पहुंचाने के लिए लगाए गए हैं जिन्हें इसकी जरूरत है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा,

"हेल्पलाइन नंबर, कोई भी इस हेल्पलाइन तक पहुंच सकता है और एक घंटे के भीतर, भोजन जरूरतमंद व्यक्तियों तक पहुंच जाएगा। उनकी पीआईएल समाचार रिपोर्टों पर आधारित है।"

शीर्ष अदालत ने मामले को स्थगित कर दिया।

31 मार्च को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट ने प्रवासी मज़दूर मामले में कहा था कि "कंट्रोल रूम से प्राप्त विवरण के अनुसार… प्रवासी श्रमिकों के लिए केंद्र सरकार के निर्देशों के अनुसार राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा 21,064 राहत शिविर पहले ही स्थापित किए जा चुके हैं, जिसमें वे आवश्यकता के अनुसार भोजन, आश्रय और चिकित्सा सुविधाएं प्राप्त कर रहे हैं। लगभग 6,66,291 व्यक्तियों को आश्रय प्रदान किया गया है और 22,88,279 व्यक्तियों को भोजन उपलब्ध कराया गया है।"

मंदर का कहना है कि इन संख्याओं को सही मानते हुए भी, अकेले दिल्ली में प्रवासी श्रमिकों की संख्या (अनुमानित 1.5 मिलियन) है। विभिन्न प्रेस रिपोर्टों का उल्लेख करते हुए, उन्होंने कहा कि इनमें से कई प्रवासी श्रमिक अभी भी उन शहरों में हैं जहां वे काम करते हैं, लेकिन काम करने के साधनों, मजदूरी, पैसे से वंचित हैं और उन तक भोजन पहुंचना भी मुश्किल हो रहा है।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में एक अतिरिक्त हलफनामा दायर किया था, जिसमें कहा गया था कि सरकार द्वारा दिए गए आदेशों के बावजूद कई प्रवासी श्रमिक अभी भी कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकारों के आदेश के बावजूद कि ठेकेदारों को इन श्रमिकों को पूरी मजदूरी का भुगतान करना होगा, ठेकेदार मज़दूरों को कम भुगतान कर रहे हैं।

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