I-PAC छापे के दौरान ममता बनर्जी केवल TMC की गोपनीय फाइलें ही ले गईं, यह नहीं कहा जा सकता : सुप्रीम कोर्ट में ED

Praveen Mishra

19 Feb 2026 5:27 PM IST

  • I-PAC छापे के दौरान ममता बनर्जी केवल TMC की गोपनीय फाइलें ही ले गईं, यह नहीं कहा जा सकता : सुप्रीम कोर्ट में ED

    प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने IPAC (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) कार्यालय में छापे के दौरान पश्चिम बंगाल प्रशासन के हस्तक्षेप के खिलाफ दायर याचिका में एक प्रत्युत्तर हलफनामा (rejoinder affidavit) दाखिल किया है। इसमें राज्य सरकार के उस दावे का कड़ा विरोध किया गया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तलाशी स्थल से सामग्री ED की सहमति से ली थी।

    ED ने कहा कि जब सामग्री तलाशी स्थल से ले जाई गई, तब यह तय करना संभव नहीं रहा कि वह केवल तृणमूल कांग्रेस से संबंधित गोपनीय दस्तावेज थे या जांच से जुड़े आपत्तिजनक सबूत भी उनमें शामिल थे। एजेंसी ने आरोप लगाया कि इससे जांच प्रभावित हुई।

    याचिका की स्वीकार्यता (Maintainability) पर ED का पक्ष

    ED ने कहा कि उसकी याचिका दो वर्गों के मौलिक अधिकारों से जुड़ी है —

    आम जनता के अधिकार (कानून व्यवस्था और विधि शासन का अधिकार)

    ED अधिकारियों के अधिकार (व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अपने कर्तव्यों के निर्वहन हेतु स्वतंत्र आवागमन का अधिकार)

    एजेंसी के अनुसार, धनशोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) कानून के उचित क्रियान्वयन का अधिकार हर नागरिक को है। PMLA के तहत जांच में बाधा डालना कानून के शासन और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है। ED ने यह भी कहा कि अवैध खनन से अर्जित धन के कथित अपराध का वास्तविक पीड़ित आम जनता है, जिसे निष्पक्ष जांच का अधिकार है।

    ED अधिकारियों के अधिकारों का उल्लंघन

    हलफनामे में कहा गया कि अधिकारियों को डराना-धमकाना, बल प्रयोग, अवैध रूप से रोकना और उन्हें अपने वैधानिक कर्तव्य निभाने से रोकना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

    FIR और जांच की मांग

    ED ने कहा कि वह इस चरण पर केवल FIR दर्ज कर जांच की मांग कर रही है, अंतिम निर्णय नहीं। यदि आरोप प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध (cognizable offence) दर्शाते हैं, तो FIR दर्ज होना चाहिए। एजेंसी ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि FIR दर्ज होने से पहले आरोपी को सुनना आवश्यक नहीं होता।

    संघ-राज्य विवाद नहीं

    राज्य सरकार के इस तर्क को भी ED ने खारिज किया कि मामला संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत केंद्र-राज्य विवाद का है। ED ने कहा कि यह संघीय संबंधों का मुद्दा नहीं, बल्कि राज्य अधिकारियों द्वारा “स्पष्ट रूप से शक्ति के दुरुपयोग” और अपराध करने का मामला है।

    छापे में हस्तक्षेप पर आरोप

    राज्य सरकार ने दावा किया था कि हथियारबंद व्यक्तियों के केंद्रीय एजेंसी अधिकारी बनकर परिसर में घुसने की सूचना पर पुलिस ने हस्तक्षेप किया। ED ने इसे “छलावा” बताते हुए कहा कि उसके अधिकारियों ने अपनी पहचान पत्र और तलाशी अनुमति दिखाकर स्वयं को स्पष्ट किया था।

    एजेंसी ने आरोप लगाया कि राज्य पुलिस ने जानबूझकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उस परिसर में प्रवेश करने में सहायता की, जहां वैधानिक तलाशी चल रही थी, और इस दौरान आपत्तिजनक सामग्री “जब्त” कर ली गई।

    “सहमति से सामग्री लेने” के दावे का खंडन

    ED ने राज्य सरकार के इस दावे को भी खारिज किया कि मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से अनुमति लेकर डिजिटल उपकरण और दस्तावेज लिए थे। एजेंसी के अनुसार, टकराव से बचने के लिए उसे तलाशी बीच में ही समाप्त करनी पड़ी।

    हलफनामे में कहा गया कि भारी पुलिस बल और वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में दबाव का माहौल था, जिसके कारण दस्तावेज और सबूत जबरन ले जाए गए, बावजूद इसके कि ED अधिकारियों ने ऐसा न करने का अनुरोध किया था।

    पंचनामा पर सफाई

    ED ने यह भी कहा कि तलाशी शांतिपूर्ण होने का उल्लेख करने वाला पंचनामा दबाव में तैयार किया गया था। इसका अर्थ केवल इतना था कि ED अधिकारियों ने बल प्रयोग नहीं किया, लेकिन माहौल भयपूर्ण और दबावपूर्ण था।

    अन्य आरोप

    एजेंसी ने यह भी कहा कि कुछ प्रतिवादियों के हलफनामों में मुख्यमंत्री द्वारा लिए गए दस्तावेजों का उल्लेख ही नहीं है, जिससे पक्षपात और तथ्यों में विरोधाभास का संकेत मिलता है।

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