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अगर नियम अनुमति दें तो कर्मचारी को रिटायरमेंट के बाद भी अनुशासनात्मक जांच में बर्खास्त किया जा सकता है : सुप्रीम कोर्ट का 2:1 के बहुमत से फैसला

LiveLaw News Network
28 May 2020 9:10 AM GMT
अगर नियम अनुमति दें तो कर्मचारी को रिटायरमेंट के बाद भी अनुशासनात्मक जांच में बर्खास्त किया जा सकता है :  सुप्रीम कोर्ट का 2:1 के बहुमत से फैसला
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सुप्रीम कोर्ट (2:1) ने कहा है कि किसी कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने के बाद भी जारी रह सकती है और यदि संबंधित सेवा नियम इसकी अनुमति देते हैं तो उसे बर्खास्तगी या हटाने जैसी बड़ी सजा दी जा सकती है।

महानदी कोलफील्ड लिमिटेड द्वारा बनाए गए आचरण, अनुशासन और अपील के नियमों का नियम 34, कुछ मामलों में विशेष प्रक्रिया प्रदान करता है और जो किसी कर्मचारी की अंतिम सेवानिवृत्ति के बाद भी अनुशासनात्मक कार्यवाही जारी रखने की अनुमति देता है, बशर्ते कर्मचारी के सेवा में रहते हुए अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई हो, चाहे वह सेवानिवृत्ति से हो या दोबार रोजगार में आन के बाद हो। इसके अनुसार इस तरह की अनुशासनात्मक कार्यवाही जारी रखी जाएगी और उस प्राधिकरण द्वारा पूरी की जाएगा, जिसने इसे शुरु किया है, बिलकुल उसी तरह जैसे कर्मचारी के सेवा में रहते हुए की जाती है।नियम 34.3 में अनुशासनात्मक कार्यवाही की पेंडेंसी के दौरान ग्रेच्युटी के भुगतान को रोक देने का प्रावधान है और यह ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम की धारा 4 के उपधारा (6) में उल्लेख‌ित अपराधों/ दुराचार का दोषी पाए जाने पर या सेवा के दौरान कदाचार या लापरवाही से कंपनी को होने वाले किसी भी आर्थिक नुकसान की पूरी या आंशिक भरपाई की ग्रेच्युटी से से वसूली का आदेश देने की अनुमति देता है।

हाईकोर्ट ने इस मामले में जसवंत सिंह गिल बनाम भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (2007) 1 एससीसी 663 में दिए गए निर्णय पर भरोसा किया था और कहा था कि यदि अनुशासनात्मक जांच कर्मचारी की सेवानिवृत्त‌ि की उम्र से पहले शुरू की गई थी तो भी सेवा से हटाने या बर्खास्तगी जैसा बड़ा जुर्माना लगाने का सवाल ही नहीं उठता।

अपील में, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अनुशासनात्मक प्राधिकरण के पास सेवान‌िवृत्त‌ि के बाद भी प्रतिवादी पर बर्खास्तगी/ बड़ा जुर्माना लगाने का अधिकार है, क्योंकि कर्मचारी के सेवा में रहते हुए अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई थी। जसवंत सिंह गिल के फैसले को पलटते हुए, जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एमआर शाह ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम राम लाल भास्कर में (2011) 10 SCC 249 में तीन जजों की बेंच के फैसले का जिक्र किया और कहा-

"कई सेवा लाभ जांच के परिणाम पर निर्भर करते हैं, जैसे कि उस अवधि के संबंध में, जब तक जांच लंबित रही। यह सार्वजनिक नीति के खिलाफ होगा कि वह किसी कर्मचारी को विभिन्न सेवा लाभों को प्राप्त करने के बाद, जिनका कि वह हकदार नहीं होगा, बिना सजा के जाने की अनुमति दे और सेवानिवृत्त‌ि की उम्र उसके बचाव में नहीं आ सकती है और यह सजा से मुक्ति के बराबर होगा। नियमों के तहत प्रदान की गई कानूनी कल्पना के कारण, इसे उसी तरीके से पूरा किया जा सकता है जैसे कि कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद सेवा में बना रहे, और उसे उचित सजा दी जा सकती है।

ग्रेच्युटी अधिनियम के विभिन्न प्रावधान विभागीय जांच के आड़े नहीं आते हैं और जैसा कि धारा 4 (6) और नियम 34.3 में प्रदान किया गया है, बर्खास्तगी की स्‍थति में ग्रेच्युटी को आंशिक रूप से या पूर्ण रूप से वसूल किया जा सकता है और नुकसान की भी वसूली की जा सकती है।

संबंधित सेवा नियमों के तहत एक जांच जारी रखी जा सकती है क्योंकि यह पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 में प्रदान नहीं की गई है, जहां कहा गया है कि जैसे ही कर्मचारी सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त करता है, जांच समाप्त हो जाती है।

हम दोहरा रहे हैं कि अधिनियम अनुशासनात्मक जांच के मामले से डील नहीं करता है, यह किए गए कदाचार के अनुसार या पूरी तरह से या आंशिक रूप से ग्रेच्युटी की वसूली विचार करता है और संभावित दंड पर भी विचार नहीं करता और सीडीए नियम के नियम 34.2 और 34.3 को अधिक्रमित नहीं करता है।

तीन जजों की बेंच में जस्टिस अजय रस्तोगी ने उक्त फैसले से असहमति जताई और कहा कि अनुशासनात्मक जांच की समाप्त‌ि के बाद, यदि दोषी ठहराया जाता है, तो एक कर्मचारी/ दोषी को दंडित किया जा सकता है, जो सेवानिवृत्त हुआ और दंड की प्रकृति क्या होनी चाहिए, यह हमेशा नियमों की प्रासंगिक योजना और प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर पर निर्भर करता है, लेकिन नियम, 1978 के नियम 27 के तहत निर्दिष्ट कठोर दंडों में से किसी को भी, जिसमें सेवा से बर्खास्तगी शामिल है, अनुशासनात्मक कार्यवाही के समापन पर नहीं दी जाता है और नियम, 1978 के नियम 34 के तहत, 1978 अधिनियम, 1972 की धारा 4 की उपधारा (6) के साथ पढ़ें, अपराध की प्रकृति के अनुसार ग्रेच्युटी की वसूली की सजा से एक अपराधी कर्मचारी को दंडित किया जा सकता है।

पीठ के समक्ष एक अन्य मुद्दा यह था कि क्या कानून में अनुमति है कि कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही लंबित होने के के कारण सेवानिवृत्ति के बाद भी नियोक्ता उसकी ग्रेच्युटी का भुगतान रोक दे? पीठ (ज‌स्ट‌िस रस्तोगी ने इस मुद्दे पर बहुमत से सहमति जताई) ने कहा-

"यह माना जाता है कि एक बड़ी सजा, जिसमें सेवा से बर्खास्तगी शामिल है, दी जा सकता है, भले ही कर्मचारी ने सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त की हो और / या सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त करने के बाद सेवानिवृत्त‌ि की अनुमति दी गई हो, बशर्ते कर्मचारी सेवा में हो और अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई हो, ग्रेच्युटी एक्ट के भुगतान की धारा 4 के उपधारा 6 को लागू किया जाएगा और अनुशासनात्मक कार्यवाही समाप्त होने तक ग्रेच्युटी की राशि को वापस लिया जा सकता है। "

केस नं: CIVIL APPEAL NO। 9693 of 2013

केस टाइटल: अध्यक्ष सह प्रबंध निदेशक, महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड बनाम श्री रवींद्रनाथ चौबे

कोरम: जस्टिस अरुण मिश्रा, एमआर शाह और अजय रस्तोगी

वकील: सीनियर एडवोकेट महाबीर सिंह और अनुकुल चंद्र प्रधान

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