'चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है'ः सर्वोच्च न्यायालय ने केरल में पंचायत अध्यक्ष पदों के आरक्षण के खिलाफ दायर याचिका खारिज की

LiveLaw News Network

24 Dec 2020 5:30 PM IST

  • चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता हैः सर्वोच्च न्यायालय ने केरल में पंचायत अध्यक्ष पदों के आरक्षण के खिलाफ दायर याचिका खारिज की

    सुप्रीम कोर्ट की अवकाश पीठ ने गुरुवार को उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें राज्य चुनाव आयोग द्वारा स्थानीय निकाय प्रमुखों के लिए जारी आरक्षण अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। अधिसूचना को चुनौती देते हुए कहा गया था कि इससे पंचायत अध्यक्षों और नगर पालिका चेयरपर्सन के पदों का क्रमिक/ लगातार आरक्षण होगा।

    जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस हेमंत गुप्ता की खंडपीठ ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि,''चुनाव प्रक्रिया को बीच में नहीं रोका जा सकता है।''

    पीठ ने उल्लेख किया कि स्थानीय निकाय चुनावों के परिणाम 16 दिसंबर को घोषित किए गए थे और पंचायत अध्यक्षों का चुनाव 30 दिसंबर को होना है।

    याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि पंचायत में अध्यक्ष का पद अनुसूचित जाति समुदाय के लिए लगातार दो बार आरक्षित किया गया है। इस तथ्य के बावजूद कि पिछले कार्यकाल 2015-2020 के दौरान इस पद के लिए अनुसूचित जाति का आरक्षण था, वर्तमान में भी 2020-2025 के कार्यकाल के लिए भी इस पद को अनुसूचित जाति के लिए अधिसूचित कर दिया गया है।

    केरल राज्य की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने पीठ को बताया कि हाईकोर्ट ने लगातार किए गए आरक्षण की वैधता के संबंध में कानून का सवाल ओपन छोड़ दिया है, और यह निर्णय संकीर्ण प्रेमिस पर आधारित था कि चुनाव प्रक्रिया में उस समय हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है जबकि यह चल रही हो।

    यद्यपि याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया था कि अध्यक्ष का चुनाव स्थानीय निकाय प्रतिनिधियों के चुनाव से अलग है,परंतु पीठ इस तर्क से सहमत नहीं हुई।

    वरिष्ठ अधिवक्ता गुप्ता ने कहा कि एक ही चुनाव अधिसूचना दोनों प्रक्रियाओं को कवर करती है और एक को दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है।

    पीठ ने कहा कि वह हाईकोर्ट के फैसले से सहमत हैं। उसमें भारत के संविधान के अनुच्छेद 243 के तहत संवैधानिक रोक का भी हवाला दिया है, जो चुनावी मामलों में अदालतों के हस्तक्षेप को रोकती है। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता अपनी शिकायतों के संबंध में कानून के अनुसार उचित फोरम के समक्ष चुनाव याचिका दायर कर सकता है।

    विशेष अवकाश याचिका यानी एसएलपी केरल हाईकोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ के फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसने एक सदस्यीय खंडपीठ द्वारा दायर निर्देश को रद्द कर दिया था। एक सदस्यीय खंडपीठ ने राज्य चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि पंचायतों के अध्यक्षों और नगर पालिकाओं के चेयरपर्सन के पदों के लिए किए गए अनुसूचित जाति और महिलाओं के आरक्षण में बदलाव किया जाए।

    16 नवंबर को, न्यायमूर्ति ए मुहम्मद मुस्तकी की एकल पीठ ने निर्देश जारी किया था कि आरक्षण को रद्द कर दिया जाए क्योंकि स्थानीय निकायों के अध्यक्षों और चेयरपर्सन के कार्यालयों में लगातार आरक्षण करना अवैध है।

    एकल पीठ ने कहा था कि,''मेरा विचार है कि संवैधानिक निर्देशों की अनदेखी करके अध्यक्ष और चेयरपर्सन के कार्यालयों के लिए किया गया क्रमिक आरक्षण गैरकानूनी और अरक्षणीय है। यह मनमाना भी है क्योंकि यह गैर आरक्षित वर्गों के उम्मीदवारों की आकांक्षाओं को अस्वीकार करेगा जो अध्यक्ष या चेयरपर्सन के कार्यालयों में चुनाव जीत कर तैनात होना चाहते हैं। रोटेशन का पालन करने पर जोर देकर, संविधान रिवर्स भेदभाव से बचने का इरादा रखता है। इस प्रकार, रोटेशन का पालन करने में विफल रहना अवसर की समानता से इनकार करना होगा। इस प्रकार, याचिकाकर्ताओं ने हस्तक्षेप के लिए एक मामला बनाया है।''

    14 दिसंबर को, हाईकोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने उपरोक्त दिशा निर्देश को रद्द करते हुए कहा था कि चुनाव में खलल ड़ाले बिना ,आरक्षण में बदलाव करना असंभव होगा।

    मुख्य न्यायाधीश एस मणिकुमार और न्यायमूर्ति शाजी पी चैली की खंडपीठ ने कहा था कि,''राज्य चुनाव आयोग पहले से ही चुनाव प्रक्रिया शुरू कर चुका है,ऐसे में एकल न्यायाधीश द्वारा निर्देशित बदलाव करने के लिए चुनाव प्रक्रिया को रोकना होगा, जो चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप है। चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना सही नहीं है। विशेषकर जब एकल न्यायाधीश के निर्देश को लागू करना एक जटिल और उलझी हुई प्रक्रिया हो।''

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