लाखों नागरिकों को वोट के अधिकार से वंचित करना संविधान की मूल भावना के खिलाफ: जस्टिस उज्जल भुइयां
Amir Ahmad
4 Oct 2026 8:03 PM IST

सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि भारतीय नागरिक का वोट देने का अधिकार संविधान की मूल संरचना का अभिन्न हिस्सा है। ऐसी कोई भी प्रक्रिया जिसके कारण लाखों नागरिक अपने मताधिकार से वंचित हो जाएं स्वभाव से ही मनमानी होगी और संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 326 का उल्लंघन करेगी।
उन्होंने कहा कि किसी भी प्राधिकरण को संविधान के तहत नागरिकों को मिले मताधिकार से इस तरह वंचित करने का अधिकार नहीं है और कोई अदालत भी ऐसी प्रक्रिया को मंजूर नहीं कर सकती।
19वें नालसार-जस्टिस बीआर सावनी स्मृति मूट कोर्ट प्रतियोगिता' के समापन समारोह में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों के दो वर्गों की कल्पना नहीं करता। एक वर्ग ऐसा नहीं हो सकता, जिसे वोट देने का अधिकार हो और दूसरा ऐसा जिसे इस अधिकार से वंचित कर दिया जाए। उनके मुताबिक लाखों भारतीय नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित कर उन्हें अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बना देना संविधान की मूल व्यवस्था के खिलाफ होगा।
उन्होंने कहा,
“अगर कोई प्रक्रिया लाखों-लाखों भारतीय नागरिकों को वोट के अधिकार से वंचित करके उन्हें अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बना देती है तो ऐसी प्रक्रिया स्वभाव से ही मनमानी है। कोई भी तर्क इसे सही नहीं ठहरा सकता। यह संविधान की मूल भावना पर सीधा प्रहार है।”
हालांकि जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में चुनाव आयोग की ओर से कराए जा रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया लेकिन उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई, जब मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण और पात्र मतदाताओं के नाम हटने की आशंकाओं को लेकर व्यापक बहस चल रही है।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं माना गया, लेकिन यह निश्चित रूप से संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने जनहित याचिका संबंधी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मताधिकार का स्रोत संविधान का अनुच्छेद 326 है। यह अनुच्छेद लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वयस्क मताधिकार की व्यवस्था करता है।
उन्होंने कहा कि कानून मताधिकार के इस्तेमाल को नियंत्रित कर सकता है लेकिन ऐसा कोई भी कानून संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 की सीमाओं के भीतर होना चाहिए। इन संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ जाने वाला कानून अमान्य होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिए भी किसी नागरिक के वोट देने के अधिकार को तर्कहीन या अनुचित तरीके से सीमित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल विशेषताओं में शामिल हैं और मताधिकार इसी व्यवस्था का आधार है। वोट देने का अधिकार ही वह माध्यम है, जिसके जरिए देश का सामान्य नागरिक शासन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करता है। उन्होंने कहा कि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार भारत के स्वतंत्रता संघर्ष और संविधान की बुनियादी सोच का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 326 समानता के सिद्धांत को वास्तविक अर्थ देता है, क्योंकि मतदान के जरिए आर्थिक और सामाजिक रूप से अलग-अलग वर्गों के नागरिकों को शासन में समान भागीदारी मिलती है। उनके अनुसार, किसी नागरिक के मताधिकार को उसकी नागरिकता से अलग नहीं किया जा सकता।
जस्टिस भुइयां ने कहा,
“मताधिकार नागरिकता का सार है। यह वह माध्यम है जिसके जरिए भारत का एक सामान्य नागरिक देश के शासन में भाग ले सकता है।”
उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिक के वोट देने के अधिकार का संबंध देश की आजादी के लंबे संघर्ष और उसमें दिए गए बलिदानों से भी है। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 326 के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा,
“कोई भी प्राधिकरण ऐसा नहीं कर सकता और कोई अदालत भी इसे मंजूर नहीं कर सकती। संविधान से ऊपर कोई नहीं है।”
मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पर भी जस्टिस भुइयां ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
उन्होंने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत मतदाता का नाम हटाने से पहले उचित प्रक्रिया अपनाने और संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी मृत मतदाता के मामले को छोड़कर, मतदाता सूची में दर्ज व्यक्ति का नाम बिना नोटिस और सुनवाई के नहीं हटाया जा सकता।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 2023 के अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ फैसले का भी उल्लेख किया।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि नागरिक के वोट देने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 326 से अलग करके नहीं देखा जा सकता और मतदाता बनने तथा मतदान करने का अधिकार स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की नींव है।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों को मतदान के अधिकार वाले और मतदान के अधिकार से वंचित नागरिकों के दो वर्गों में नहीं बांटता। यदि कोई प्रक्रिया बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों को मताधिकार से वंचित करती है और उन्हें अपने ही देश में बिना वोट के नागरिक बना देती है तो ऐसी प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14 और 326 की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकती।

