SIR की आड़ में ECI नागरिकता टेस्ट नहीं कर सकता: याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में बताया

  • SIR की आड़ में ECI नागरिकता टेस्ट नहीं कर सकता: याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में बताया

    स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रोसेस को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के सामने दलील दी कि इलेक्शन कमीशन ऑफ़ इंडिया (ECI) के पास SIR एक्सरसाइज की आड़ में किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का कोई अधिकार नहीं है।

    चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच कई राज्यों में शुरू किए गए SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। पिछले हफ्ते याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ द पीपल एक्ट, 1950 ECI को मौजूदा रूप में SIR करने का अधिकार नहीं देता है।

    अलग-अलग याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट ए एम सिंघवी ने कहा कि SIR में इनडायरेक्टली वोटर्स को ECI के सामने अपनी नागरिकता साबित करने की ज़रूरत होती है।

    उन्होंने दलील दी,

    "ECI के पास आर्टिकल 324 के तहत नागरिकता टेस्ट करने का कोई अधिकार नहीं है।"

    उन्होंने समझाया कि यह प्रोसेस उन लोगों की एक लिस्ट बनाता है, जिन्हें वोटर माना जाता है और फिर उन पर अपनी नागरिकता साबित करने का बोझ डालता है।

    उन्होंने कहा,

    “इससे मुझे एक टेम्पररी नागरिकता लिस्ट में डाल दिया जाता है। फिर मुझे यह साबित करना होगा कि मैं एक नागरिक हूं। यह बहुत सीरियस बात है। आपने खुद से कुछ ऐसा कर लिया है, जो है ही नहीं।”

    सिंघवी ने ज़ोर देकर कहा कि सिर्फ़ केंद्र सरकार ही सिटिज़नशिप एक्ट की धारा 8 और 9 के तहत या फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल एक्ट के तहत कोर्ट ही सिटिज़नशिप तय कर सकती है। उन्होंने आगे कहा कि चुनाव अधिकारी ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि यह असल में NRC-टाइप प्रोसेस जैसा होगा।

    उन्होंने तर्क दिया कि EROs से सिटिज़नशिप डॉक्यूमेंट्स की जांच करने, संदिग्ध गैर-नागरिकों को मार्क करने या उन्हें होम डिपार्टमेंट को रिपोर्ट करने की ज़रूरत संविधान के खिलाफ है और पार्लियामेंट की मंज़ूरी के बिना एक इनडायरेक्ट NRC बनाता है।

    उन्होंने अपनी दलीलों को मज़बूत करने के लिए लाल बाबू हुसैन (1995) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि लाल बाबू हुसैन फैसले के अनुसार, वोटर लिस्ट में शामिल व्यक्ति को भारतीय नागरिक माना जाता है और यह साबित करने की ज़िम्मेदारी विरोध करने वाले की है कि ऐसा नहीं है। हालांकि, SIR में पूरा बोझ उलट दिया गया और वोटर्स से नागरिकता साबित करने के लिए कहा जाता है, भले ही वे वोटर लिस्ट में शामिल हों।

    आर्टिकल 14 पर सिंघवी ने SIR के तहत बनाए गए तीन सब-क्लासिफिकेशन पर सवाल उठाया। उन्होंने 2003 के कट-ऑफ के आधार पर सवाल उठाया और 2003 के बाद लिस्ट में शामिल होने वाले सभी वोटर्स को अपने माता-पिता/पूर्वजों की डिटेल्स दिखाने की ज़रूरत बताई। सिंघवी ने कहा कि कट-ऑफ मनमाना है और आर्टिकल 14 का उल्लंघन करता है।

    उन्होंने यह भी दोहराया कि 1950 के एक्ट के तहत SIR को सिर्फ़ खास चुनाव क्षेत्रों के लिए टारगेटेड एक्सरसाइज़ के तौर पर देखा गया, न कि पूरे राज्य में एक साथ बदलाव के तौर पर। उन्होंने इस बात को समझाने के लिए एक्ट के सेक्शन 21 (3) का सहारा लिया।

    बिहार SIR डेटा - सिर्फ़ 6 महीने में महिला वोटर्स में भारी गिरावट : एडवोकेट वृंदा ग्रोवर हाइलाइट्स

    एडवोकेट वृंदा ग्रोवर ने बताया कि उन्होंने SIR प्रोसेस के बाद बिहार वोटर लिस्ट का अलग-अलग डेटा मांगने के लिए एक एप्लीकेशन दी थी।

    ECI के 30 अक्टूबर, 2025 के जवाब का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया कि जनवरी, 2025 में महिला वोटर्स की संख्या 3 करोड़ 70 लाख थी, लेकिन 1 जुलाई, 2025 तक घटकर 3 करोड़ 49 लाख हो गई।

    ग्रोवर ने कहा,

    “छह परसेंट महिला वोटर्स गायब हैं। सेक्स रेश्यो 914 से गिरकर 892 हो गया,” और कहा कि छह महीने में इतनी बड़ी गिरावट सिर्फ़ SIR की वजह से हो सकती है।

    उन्होंने उन प्रैक्टिकल दिक्कतों पर ज़ोर दिया, जिनका सामना महिलाओं को डॉक्यूमेंट्स बनाने में करना पड़ता है, खासकर शादी और दूसरी जगह जाने के बाद। बिहार में सिर्फ़ 28.8 परसेंट औरतें Class 10 तक पढ़ी-लिखी हैं, इसलिए उन्होंने कहा कि परिवार के वंशावली रिकॉर्ड लेने जैसी ज़रूरतें असलियत से परे हैं और सिस्टम में नुकसान पहुंचाती हैं।

    ग्रोवर ने कहा,

    "एक शादीशुदा औरत के लिए, जिस गांव में आप अभी रह रही हैं, वहां सरपंच के पास जाकर अपनी पंशावली या परिवार की वंशावली लेना मुमकिन नहीं है। इसलिए औरतों को एक खास सिस्टम में नुकसान उठाना पड़ेगा, जिसके लिए SIR में कोई जगह नहीं दी गई, फॉर्म 6 के उलट।"

    बहुत ज़्यादा काम के दबाव की वजह से 30 BLO ने सुसाइड किया; ECI ट्रांसपेरेंट नहीं: प्रशांत भूषण का तर्क

    ADR की तरफ से पेश हुए प्रशांत भूषण ने SIR के दौरान काम के बहुत ज़्यादा प्रेशर की वजह से 30 बूथ लेवल ऑफिसर्स के सुसाइड करने की रिपोर्ट्स पर ज़ोर दिया। उन्होंने इस काम की इतनी जल्दी और इस उम्मीद पर सवाल उठाया कि BLOs कम समय में करोड़ों लोगों से फॉर्म इकट्ठा करेंगे, जिसमें माइग्रेंट वर्कर्स भी शामिल हैं।

    आगे कहा गया,

    "इस तरह का काम पहले कभी नहीं किया गया। इतनी जल्दी क्यों? इससे ऐसी हालत क्यों हो रही है कि 30 BLOs ने सुसाइड कर लिया। आप कह रहे हैं कि आप करोड़ों लोगों से यह गिनती का फॉर्म भरवाते हैं। हर BLO को घर-घर जाना होता है, माइग्रेंट वर्कर्स का क्या होगा? वे कैसे भरेंगे? आपने इतना कम समय दिया है और इतना बेवजह प्रेशर डाला है, किसलिए?"

    भूषण ने ECI की भी आलोचना की कि उसने मशीन से पढ़ा जा सकने वाला वोटर डेटा देने से मना कर दिया और इलेक्शन मैनुअल के मुताबिक नाम जोड़ने और हटाने की डिटेल्स पब्लिश नहीं कीं। उन्होंने कहा कि ट्रांसपेरेंसी की कमी पब्लिक स्क्रूटनी में रुकावट डालती है।

    उन्होंने आगे कहा,

    "इसके ऊपर से आप कहते हैं कि आप ट्रांसपेरेंसी के किसी भी नियम का पालन नहीं करेंगे... आप वोटर्स लिस्ट को मशीन से पढ़े जा सकने वाले रूप में नहीं देंगे ताकि लोग एनालाइज़ कर सकें और आसानी से और जल्दी से जांच कर सकें कि आपका नाम उसमें है या नहीं; कितने और कौन डुप्लीकेट वोटर हैं।"

    उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि ECI भी नाम जोड़ने/हटाने के एप्लीकेशन का डेटा वेबसाइट पर पब्लिश नहीं कर रहा है, जैसा कि इलेक्शन मैनुअल के तहत ज़रूरी है।

    भूषण ने तर्क दिया,

    "हम इस बात से अपनी आँखें बंद नहीं कर सकते कि आज इस देश में बहुत से लोग ECI को तानाशाह मानते हैं। यह ऐसी चीज़ है जिससे हम अपनी आँखें बंद नहीं कर सकते।"

    हालांकि, सीजेआई ने बीच में टोकते हुए कहा,

    "हमें सिर्फ़ दलीलों तक ही सीमित रहना चाहिए। कोई बयान नहीं देना चाहिए।"

    बेंच 4 दिसंबर को मामले की सुनवाई जारी रखेगी।

    Case Details : ASSOCIATION FOR DEMOCRATIC REFORMS AND ORS. Versus ELECTION COMMISSION OF INDIA & connected matters

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