क्या 'इंट्रा-कोर्ट' अवमानना अपीलों पर रोक लगाने से न्याय तक पहुंच सीमित होती है? सुप्रीम कोर्ट ने 'राम किशन फौजी' मामले का फैसला बड़ी बेंच को भेजा
Shahadat
15 Oct 2026 11:37 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है कि क्या 'राम किशन फौजी बनाम हरियाणा राज्य' (2017) मामले में उसका फैसला—जिसने आपराधिक मामलों से जुड़ी कुछ रिट कार्यवाहियों में 'इंट्रा-कोर्ट' (हाई कोर्ट के भीतर ही होने वाली) अपीलों को सीमित कर दिया था—मुकदमेबाजों पर अनावश्यक बोझ डालता है? यह बोझ इसलिए पड़ता है, क्योंकि वे अवमानना मामले में सिंगल जज (एकल न्यायाधीश) द्वारा दिए गए फैसले को हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच (खंडपीठ) के सामने चुनौती नहीं दे पाते।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने में काफी खर्च आ सकता है। इसमें यात्रा, ठहरने-रुकने का खर्च, केस तैयार करने और पेश करने का खर्च, और एक अच्छे वकील को रखने का खर्च शामिल है।
कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। इस मामले में कोर्ट यह जांच कर रहा था कि क्या किसी रिट याचिका से जुड़ी अवमानना कार्यवाही में, सिंगल जज के आदेश के खिलाफ 'स्पेशल अपील' (इंट्रा-कोर्ट अपील) दायर की जा सकती है या नहीं।
कोर्ट ने कहा,
"सिर्फ लंबी दूरी ही एक बाधा नहीं है; बल्कि ठहरने-रुकने का भारी खर्च, केस को सही ढंग से पेश करना और इस कोर्ट के सामने उचित कानूनी प्रतिनिधित्व का खर्च भी इसमें शामिल है। विज्ञान और तकनीक ने भले ही व्यवस्था को बेहतर बनाने में मदद की हो, फिर भी ये चुनौतियां बनी हुई हैं।"
जस्टिस दत्ता द्वारा लिखे गए फैसले में 'राम किशन फौजी' मामले के उस दृष्टिकोण पर सवाल उठाया गया, जिसमें आपराधिक मामलों से जुड़ी कुछ रिट कार्यवाहियों को 'आपराधिक अधिकार क्षेत्र' (क्रिमिनल ज्यूरिसडिक्शन) का हिस्सा मान लिया गया, ताकि यह तय किया जा सके कि 'इंट्रा-कोर्ट अपील' हो सकती है या नहीं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'आपराधिक अधिकार क्षेत्र' का मतलब है किसी कोर्ट की वह शक्ति, जिसके तहत वह आपराधिक कार्यवाहियों को सुन सकती है, उन पर सुनवाई कर सकती है और फैसला सुना सकती है। यह अधिकार क्षेत्र कानून (जैसे 'कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर', 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' या कोई विशेष कानून) द्वारा दिया जाता है, जो भौगोलिक सीमा, विषय-वस्तु और पदानुक्रम (hierarchy) के नियमों के अनुसार तय होता है। इसलिए सिर्फ इसलिए कि किसी मुकदमेबाज का दावा ऐसे कानून से जुड़ा है जिसमें आपराधिक तत्व हैं, हाई कोर्ट का संवैधानिक 'रिट अधिकार क्षेत्र' बदलकर सामान्य 'आपराधिक अधिकार क्षेत्र' नहीं बन जाता। इस आधार पर 'लेटर्स पेटेंट' (Letters Patent) के तहत मिलने वाली 'इंट्रा-कोर्ट अपील' के अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा,“अनुच्छेद 226 के तहत 'रिट' (Writ) का उपाय एक 'पब्लिक लॉ' (सार्वजनिक कानून) से जुड़ा उपाय है। इसके इस्तेमाल के लिए यह जरूरी है कि इसमें 'पब्लिक लॉ' का कोई पहलू शामिल हो—यानी, किसी कानूनी रूप से संरक्षित अधिकार का उल्लंघन हुआ हो या किसी सार्वजनिक कर्तव्य का पालन न किया गया हो। अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) इस बात पर निर्भर नहीं करता कि मामला दीवानी (Civil) कानून से जुड़ा है या आपराधिक (Criminal) कानून से। महत्वपूर्ण यह है कि शिकायत किस तरह की है: क्या किसी कानूनी रूप से संरक्षित अधिकार का उल्लंघन हुआ है, और क्या उस अधिकार को 'रिट' के जरिए अदालत द्वारा लागू करवाया जा सकता है? 'रिट याचिका' का विषय—चाहे वह अनुबंध (Contract), सेवा, कराधान (Taxation) या आपराधिक शिकायत से जुड़ा हो—यह तय नहीं करता कि अधिकार क्षेत्र किस तरह का है; असल में यह देखा जाता है कि विवाद (lis) किस तरह का है और किस तरह की राहत मांगी गई। सिर्फ इसलिए कि जिस अधिकार का दावा किया गया, वह किसी ऐसे कानून से निकला है, जिसमें आपराधिक पहलू शामिल हैं, हाईकोर्ट्स को संविधान द्वारा दिए गए विशेष और अनन्य 'रिट अधिकार क्षेत्र' को सामान्य 'आपराधिक अधिकार क्षेत्र' में नहीं बदला जा सकता। ऐसा करना 'लेटर्स पेटेंट' (Letters Patent) के तहत होने वाली 'इंट्रा-कोर्ट अपील' (अदालत के भीतर की अपील) को निष्प्रभावी करने जैसा होगा।”
संक्षेप में मामला
कोर्ट ने कहा कि जब अवमानना (Contempt) की कार्यवाही में जुर्माना या सजा सुनाई जाती है तो इसे अपने आप 'आपराधिक अवमानना' (Criminal Contempt) नहीं माना जा सकता। इसका मतलब यह है कि रिट अधिकार क्षेत्र (Writ Jurisdiction) से जुड़ी अवमानना कार्यवाही में सिंगल बेंच के आदेश के खिलाफ 'इंट्रा-कोर्ट अपील' (Intra-Court Appeal) का विकल्प खत्म नहीं हो जाता।
सिंगल जज के आदेश के खिलाफ 'इंट्रा-कोर्ट अपील' कब दायर की जा सकती है?
कोर्ट ने यह भी कहा कि जहाँ 'लेटर्स पेटेंट' (Letters Patent) या हाई कोर्ट के नियमों के तहत अनुमति हो, वहां अवमानना कार्यवाही में सिंगल जज के आदेश के खिलाफ 'इंट्रा-कोर्ट अपील' की जा सकती है। बशर्ते, वह आदेश 'मिदनापुर पीपल्स को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम चुनीलाल नंदा (2006)' मामले में तय किए गए 'जजमेंट' (निर्णय) के मानदंडों को पूरा करता हो।
कोर्ट ने कहा,
"हमें लगता है कि 'इंट्रा-कोर्ट अपील' इन स्थितियों में की जा सकती है:
(i) ऐसा आदेश जो किसी ऐसे पक्ष को निर्देश देता है जो मूल आदेश से बंधा नहीं था, या जो मूल रिट कार्यवाही का हिस्सा नहीं था (सिवाय उस स्थिति के जहाँ वह पक्ष मूल प्रतिवादी की जगह ले लेता है और आदेश का पालन कराने की जिम्मेदारी उस पर आ जाती है)।
(ii) ऐसा आदेश जो अनुपालन (compliance) के दावे की जांच करने और उसे खारिज करने के बाद, मूल आदेश का फिर से पालन करने के लिए कहता है।
(iii) ऐसा आदेश जो उस मूल आदेश के दायरे से बाहर चला जाता है जिसके उल्लंघन का आरोप है, और ऐसे निर्देश देता है जो मूल आदेश में शामिल ही नहीं थे।
(iv) ऐसा आदेश जो तथ्य या कानून से जुड़े विवादित सवालों को तय करता है, जिससे पक्षों के अधिकार हमेशा के लिए निर्धारित हो जाते हैं।"
'राम किशन फौजी' मामले को पुनर्विचार के लिए भेजा गया
चूंकि 'राम किशन फौजी' मामले का फैसला तीन जजों की बेंच ने किया था, इसलिए वर्तमान दो जजों की बेंच ने इस मुद्दे को एक उपयुक्त बेंच के पास भेज दिया है। इन सवालों में यह शामिल है कि क्या उस फैसले में 'इंट्रा-कोर्ट अपील' से जुड़े 'लेटर्स पेटेंट' के प्रावधानों की सही व्याख्या की गई, क्या उसका तर्क 'न्याय तक पहुंच' (Access to Justice) के अनुरूप है, और क्या उस फैसले पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
कोर्ट ने 'राम किशन फौजी' मामले के फैसले को पलटा (Overrule) नहीं है; इन सवालों को आगे के विचार के लिए एक उपयुक्त बेंच के पास भेज दिया गया है, जो चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) द्वारा प्रशासनिक स्तर पर जारी किए जाने वाले किसी भी आदेश के अधीन होगा।
तय किए गए विचारणीय बिंदु (Terms of Reference) इस प्रकार है:
“क्या 'राम किशन फौजी बनाम हरियाणा राज्य' (2017) 5 SCC 533 के मामले में दिया गया फैसला, संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्राप्त अधिकार क्षेत्र की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए विभिन्न हाईकोर्ट्स को नियंत्रित करने वाले 'लेटर्स पेटेंट' (Letters Patent) की सही व्याख्या करता है? क्या यह फैसला, एक तरह से इंट्रा-कोर्ट अपील (अदालत के भीतर की अपील) के स्तर पर न्याय तक उचित पहुंच को खत्म नहीं करता? साथ ही, क्या यह अनुच्छेद 226 में एक ऐसा विभाजन पैदा नहीं करता, जिसकी कल्पना न तो 'लेटर्स पेटेंट' बनाने वालों ने की थी और न ही संविधान निर्माताओं ने? क्या इस राय के पैराग्राफ 49 से 51 में की गई चर्चाओं को देखते हुए 'राम किशन फौजी' मामले के फैसले पर फिर से विचार किया जाना चाहिए?”
इसके साथ ही सिंगल जज के समक्ष चल रही अवमानना (Contempt) की कार्यवाही पर भी दो महीने के लिए रोक लगा दी गई।
Case Title : SANJAY PRASAD VERSUS MADHUSUDAN DWIVEDI & ORS.

