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विकास और आर्थिक प्रगति को पर्यावरणीय विचारों पर प्रमुखता दी जाए: सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तार का बचाव करते हुए एटॉर्नी जनरल ने कहा

LiveLaw News Network
8 Dec 2020 6:08 AM GMT
विकास और आर्थिक प्रगति को पर्यावरणीय विचारों पर प्रमुखता दी जाए: सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तार का बचाव करते हुए एटॉर्नी जनरल ने कहा
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एटॉनी जनरल केके वेणुगोपाल ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया, "सतत विकास के लिए संतुलन की आवश्यकता होती है। पर्यावरणीय विचारों के विपरीत, देश को वस्तुओं और लोगों के आवागमन के लिए व्यापक राष्ट्रीय राजमार्गों की आवश्यकता होती है, राष्ट्रीय राजमार्गों की आवश्यकता को पर्यावरणीय विचारों पर प्रमुखता दी जानी चाहिए।"

जस्टिस एल नागेश्वर राव, हेमंत गुप्ता और अजय रस्तोगी की खंडपीठ राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रही थी। एनएचआई ने मद्रास हाईकोर्ट के 8 जनवरी के फैसले के खिलाफ, जिसमें एनएच -45 ए के विस्तार पर रोक लगा दी गई थी, जो केंद्र की भारतमाला परियोजना का हिस्सा है, विशेष अनुमति याचिका दायर की थी।

बेंच, 28 नवंबर, 2019 को कर्नाटक उच्च न्यायालय की ओर से द‌िए गए अंतरिम आदेश, जिसमें बेलगावी और गोवा के बीच एनएच-4 ए को चौड़ा करने के काम पर छह जनवरी तक रोक लगा दी गई थी, के खिलाफ दायर एनएचआई की याचिका पर भी सुनवाई कर रही थी। उक्त फैसले में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 9 मार्च को कहा था कि चौड़ीकरण का काम रोक दिया गया है, इसलिए, कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया जा रहा है।

भारतमाला के संबंध में, उच्च न्यायालय के समक्ष प्राथमिक विवाद यह था कि ईआईए अधिसूचना के संदर्भ में, 100 किलोमीटर से अधिक की लंबाई के किसी भी राष्ट्रीय राजमार्ग के विकास के लिए, ईआईए अध्ययन पर आधारित पर्यावरणीय मंजूरी अनिवार्य है- "चूंकि, कुल एनएच -45 ए के प्रस्तावित विस्तार में, विल्लुपुरम-नागपट्टिनम के बीच कुल दूरी 179.555 किलोमीटर है, इसलिए पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त करना अपरिहार्य है। पर्यावरणीय मंजूरी से बचने के लिए 179.555 किलोमीटर की पूरी दूरी को कृत्रिम रूप से और मनमाने ढंग से चार खंडों में विभाजित किया गया है, अनिवार्य ईआईए से बचने की प्रक्रिया में यी सुनिश्चित किया गया है कि प्रत्येक खंड 100 किलोमीटर के भीतर पड़े। यह पूर्वोक्त सूचनाओं की भावनाओं के विपरीत है।"

उल्लेखनीय है कि पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा दिनांक 14.09.2006 को SO1533 में जारी की गई अधिसूचना आर्थिक या सामाजिक-आर्थिक गतिविधि की विभिन्न श्रेणियों के लिए अनिवार्य पर्यावरणीय मंजूरी का प्रावधान करती है, और इसके लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) की आवश्यकता अनिवार्य है। इस अधिसूचना में प्रदान की गई अनुसूची में विभिन्न प्रकार की गतिविधियों को शामिल किया गया है। इसमें, Sl.No.7 (f) प्रमुख राजमार्गों से संबधित है। इस अधिसूचना में अन्य बातों के साथ यह आवश्यक है कि "30 किमी से अधिक लंबे राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तार के मामलों में, जिसमें सड़क के साथ 20 मीटर से अधिक भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता हो और वह एक से अधिक राज्य से गुजरता हो," तो पर्यावरणीय मंजूरी की आवश्यकता होती है। इसलिए, ईआईए लिया जाता है। इस अधिसूचना में बाद में पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा दिनांक 22.08.2013 को जारी SO No 2559 (E) को जारी आदेश के जर‌िए संशोधन किया गया, जिसके अनुसार, 100 किलोमीटर से अधिक लंबे राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तार में, जिसमें अतिरिक्त मार्ग अधिकार शामिल हो, और मौजूदा संरेखण पर 40 मीटर से अधिक भूमि अधिग्रहण और पुनर्संरेखण या बाई-पास पर 60 मीटर से अधिक भूमि अधिग्रहण आवश्यक हो, ऐसे मामलों में भूमि अधिग्रहण आवश्यक है।"

एजी ने कहा, "पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 से पहले पर्यावरण की कोई अवधारणा नहीं थी ... भारत सरकार ने देश के विकास और लोगों की सुविधा के लिए इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया। ये देश भर में फैला सड़कों का जाल होगा। इसलिए राष्ट्रीय राजमार्गों को चार-लेन का कर दिया गया।"

उन्होंने कहा, "यह एक मौजूदा सड़क है, जो पूरे देश भी में जाती है। किसी को यह पता लगाना होगा कि पर्यावरण के खिलाफ क्या टिकाऊ है- अर्थव्यवस्था की जरूरत, कार यात्रियों की सुविधा, माल की ढुलाई। एक संतुलन होना चाहिए।"

उन्होंने कहा, "आप इन सड़कों पर तेजी से यात्रा नहीं कर सकते हैं ... ये केवल दो लेन की हैं। इन्हें चार लेन की करने आवश्यकता है। अन्य देशों में, आठ या उससे अधिक लेन की हैं। यह अंदर की सड़के नहीं हैं, जिनके बारे में मैं बात कर रहा हूं। यदि भारत एक उचित राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण करन में सक्षम नहीं होगा तो यह देश के लिए दुखद दिन होगा!"

उन्होंने कहा, ''उद्योगों का विकास, माल की आवाजाही, अर्थव्यवस्था की वृद्धि सभी थम जाएगी और धीमी होगी।''

एजी ने समझाया, "भारतमाला के तहत 34,000 किलोमीटर लंबी सड़क है। भारत सरकार ने इसे वित्त, पुरुषों और सामग्री के आधार पर विभाजित किया है। 3,400 सड़कों में से किसी के लिए एक ठेकेदार नहीं है। एनएचआई ने प्रत्येक की नीलामी अलग-अलग की है। प्रत्येक पैकेज 100 किमी के भीतर हैं। केवल आवश्यकता के कारण, इसे अलग-अलग ठेकेदारों को दिया गया है। "

उन्होंने कहा, "2013 का संशोधन लागू होगा। अगर यह लागू होता है, तो पर्यावरण अधिकारी अंदर नहीं आएंगे। मूल रूप से, यह 50 किमी था। तब उन्होंने इसे 100 बनाया। उन्होंने कहा कि आप इससे ज्यादा सड़क को चौड़ा नहीं कर सकते। एकमात्र सवाल यह है कि मुझे अनुमति पाने से बचने के लिए जानबूझकर ऐसा नहीं करना चाहिए। तब मैं गलत नहीं हूं।"

उन्होंने कहा, "इस देश में, अगर हर मामले में अधिकारियों के सामने जाना होगा, तो प्रगति नहीं हो पाएगी। अनुमतियों और लालफीताशाही की एक अनकही संख्या होगी!"

"हर एक गिरे पेड़ के लिए, 10 पेड़ों को लगाया जाना चाहिए। अन्यथा, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत दंड दिया जाएगा। पेड़ की कटाई राष्ट्रीय राजमार्ग पर है, सरकारी भूमि पर, सार्वजनिक भूमि पर नहीं। स्थानीय अनुमतियां वैज्ञानिक रूप से ली जाती हैं, जहाँ कहीं भी आवश्यक हों, वन विभाग आदि से अनुमति प्राप्त की जाती है, मॉनिटरिंग भी हो रही है। हम जमीन के मालिक को मुआवजा देते हैं और जो कुछ भी उगाया जाता है, हम उसे काटने के हकदार हैं और इन नारियल के पेड़ों और सभी को काटने के लिए किसी अनुमति की जरूरत नहीं है।"

उन्होंने कहा, "व्यापक जनहित के रास्ते में आपत्तियां को नहीं खड़ी होना चाहिए। देश के विकास के लिए सामानों और यात्रियों को आराम से आगे बढ़ने की जरूरत है।"

बेलागवी-गोवा राजमार्ग के संबंध में, 24 फरवरी को, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कहा ‌था कि एनएस-4A की लंबाई, जिसका चौड़ीकरण किया जाना है, कर्नाटक और गोवा के बीच 100 किलोमीटर से अधिक हो सकती है। अगर ऐसा है, तो यह नहीं कहा जा सकता है कि चौड़ीकरण की लंबाई 100 किलोमीटर से कम है।

9 मार्च को, उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से स्पष्ट रुख अपनाने की अपेक्षा की कि क्या एनएस-4A के चौड़ीकरण के लिए पर्यावरणीय मंजूरी आवश्यक है। एजी ने कहा, "कृपया काम जारी रखें। मशीनरी, काम करने वाले- सभी खड़े हैं। अपार नुकसान हो रहा हैं! 70% काम पूरा हो गया है!"

पीठ ने उल्लेख किया कि उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका में शिकायत की गई थी कि 153.75 किलोमीटर लंबे राजमार्ग के विस्तार के लिए पर्यावरण मंजूरी नहीं ली गई थी। 31 अक्टूबर, 2019 के दिए आदेश में उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि पर्यावरण संबंधी मंजूरी प्राप्त कर ली गई है, इस संबंध हलफनामा दायर करे। साथ ही पर्यावरणीय मंजूरी की अवधि भी स्पष्ट करे। चूंकि हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, इसलिए 28 नवंबर, 2019 का आदेश दिया गया था और अंतरिम राहत दी गई थी।

पीठ ने दर्ज किया कि एजी ने अदालत को सूचित किया है कि पर्यावरण और वन मंत्रालय ने 9 मार्च को पर्यावरण मंजूरी के संबंध में स्थिति स्पष्ट कर दी है, जिसमें कहा गया था कि किसी मंजूरी की आवश्यकता नहीं है।

तदनुसार, पीठ ने कर्नाटक उच्च न्यायालय को दो सप्ताह में रिट याचिका को निपटाने का निर्देश दिया, क्योंकि राष्ट्रीय राजमार्ग के विस्तार की एनएचएआई की परियोजना रुकी हुई है।

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