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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, पुरानी पड़ चुकी और बिना मतलब की घटनाएं हिरासत के आदेश का आधार नहीं

LiveLaw News Network
21 Dec 2019 1:45 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, पुरानी पड़ चुकी और बिना मतलब की घटनाएं हिरासत के आदेश का आधार नहीं
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पुरानी पड़ चुकी और बिना मतलब की घटनाएं हिरासत के आदेश का आधार नहीं हो सकती हैं।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हृषिकेश रॉय की पीठ ने मद्य तस्करी, डकैती, ड्रग-अपराधियों, गुंडों, मानवी तस्करी, भूमि कब्जेदारों, नकली बीज बेचने के अपराधियों, कीटनाशक अपराधियों, उर्वरक अपराधियों, खाद्य अपमिश्रण अपराधियों, नकली दस्तावेज बनाने के अपराधियों, अनुसूचित वस्तुओं के अपराधियों, वन अपराधियों, गेमिंग अपराधियों , यौन अपराधियों , विस्फोटक पदार्थ रखने के अपराधियों , हथियार अपराधियों , साइबर अपराध अपराधियों, सफेदपोश अपराध‌ियों की रोकथाम के लिए बने तेलंगाना प्रिवेंशन ऑफ डेंजरस एक्टिविटीज़ की धारा तीन और वित्तीय अपराधी अधिनियम 1961 के तहत खाजा बिलाल अहमद की हिरासत रद्द करते हुए ये टिप्‍पणी की। सुप्रीम कोर्ट उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ एक अपील पर विचार कर रहा था, जिसमें हिरासत के आदेश को चुनौती दी गई थी.

कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में हिरासत के आदेश के लिए चौदह मामलों का संदर्भ दिया गया है, जो अपीलकर्ता के खिलाफ 2007 और 2016 के बीच लगाए गए थे। बेंच ने इस संबंध में कहा:

"हिरासत अधिकारी ने कहा कि जो मामले 2009 और 2016 के बीच अपीलकर्ता के खिलाफ दर्ज किए गए थे" उन पर हिरासत का आदेश पारित करने के लिए विचार नहीं किया जा सकता है" और उन्हें केवल उसकी आपराधिक पृष्ठभूमि के माध्यम से संदर्भित किया गया था"। यह कथन स्पष्ट रूप से विरोधाभासी है। हिरासत का आदेश, तथ्य के रूप में, उन आपराधिक मामलों को संदर्भित करता है जो 2007 और 2016 के बीच स्थापित किए गए थे। इस आपत्ति को दूर करने के लिए कि ये मामले पुराने हैं और हिरासत के आदेश के साथ सजीव रूप से नहीं जुड़े हैं, यह दलील दी गई थी कि कि उन पर भरोसा नहीं किया गया और उन्हें केवल हिरासत में रखे अपराधी की पृष्ठभूमि को बताने के लिए संदर्भित किया गया था।

यदि लंबित मामलों को हिरासत के आदेश को पारित करने के लिए उपयुक्त नहीं माना गया था तो ये तर्क को गलत ठहराता है कि उन्हें हिरासत के आदेश के लिए पहले स्थान पर क्यों रखा गया. तेलंगाना अपराधियों के लिए अधिनियम 1986 का उद्देश्य सार्वजनिक शांति के रखरखाव के लिए किसी भी व्यक्ति को पूर्वाग्रह से ग्रसित कार्य करने से रोकना है।

इस प्रयोजन के लिए, धारा 3 कहती है कि हिरासत प्राधिकारी को संतुष्ट होना चाहिए कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के भविष्य में अवैध गतिविधियों में लिप्त होने और सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव के लिए पूर्वाग्रहपूर्ण तरीके से कार्य करने की संभावना है। हिरासत अधिकारी द्वारा आने वाली संतुष्टि अप्रासंगिक या अमान्य आधारों पर आधारित नहीं होनी चाहिए। इसे प्रासंगिक सामग्री के आधार पर प्राप्त किया जाना चाहिए; सामग्री जो पुरानी नहीं हो और जिसमें हिरासत अधिकारी की संतुष्टि के साथ सजीव संबंध हो।

हिरासत का आदेश केवल पिछले आपराधिक मामलों को संदर्भित कर सकता है, अगर उनके पास एक व्यक्ति को हिरासत में लेने की तत्काल आवश्यकता के साथ एक प्रत्यक्ष सांठगांठ या संबंध है। यदि अपीलार्थी की पिछली आपराधिक गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव के लिए पूर्वाग्रहपूर्ण तरीके से कार्य करने की उसकी प्रवृत्ति या झुकाव का संकेत दे सकती हैं, तो इससे हिरासत अधिकारी की व्यक्तिपरक संतुष्टि पर असर पड़ सकता है।"

बेंच ने सामा अरुणा बनाम तेलंगाना राज्य के मामले का हवाला देते हुए कहा कि एक हिरासत आदेश जो पुरानी घटनाओं पर स्थापित होता है, को एक अपराध के लिए सजा के आदेश के रूप में माना जाना चाहिए, एक परीक्षण के बिना पारित कर दिया गया है, हालांकि निवारक निरोध का एक आदेश है।

हिरासत के आदेश को रद्द करते हुए बेंच ने कहा कि कोई उचित आधार नहीं था, जिन पर ‌हिरासत अधिकारी द्वारा निम्‍न निष्कर्ष निकाला जा सकता था:

(i) जमानत पर रिहा होने पर, अपीलार्थी पक्षपातपूर्ण गतिविधि में लिप्त सभी संभावित मामलों में शामिल होगा; और (ii) उसे हिरासत में लेना आवश्यक था, ताकि उसे पूर्वाग्रही गतिविधि में शामिल होने से रोका जा सके।

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