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पुलिस की इच्छा से नहीं तय होता स्वतंत्रता का अधिकार, बॉम्बे‍ हाईकोर्ट ने गैरकानूनी हिरासत के लिए लगाया जुर्माना

LiveLaw News Network
10 Jan 2020 7:14 AM GMT
पुलिस की इच्छा से नहीं तय होता स्वतंत्रता का अधिकार, बॉम्बे‍ हाईकोर्ट ने गैरकानूनी हिरासत के लिए लगाया जुर्माना
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने ‌पिछले महीने वर्धा के देवली थाने के एक पुलिस इंस्पेक्टर पर को किशोर फुटाने नामक एक शख्स और उनके बेटे डॉ इंद्रप्रसाद फुटाने की अवैध हिरासत में रखने के जुर्म में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 151 (1) के तहत 2 लाख रुपए का जुर्माना लगाया।

जस्टिस ज़ेडए हक और जस्टिस एमजी गिरटकर की खंडपीठ ने कहा कि उक्त हिरासत अवैध थी और तहसीलदार और तालुका मजिस्ट्रेट द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 8 के तहत की गई कार्रवाई को रद्द कर दिया।

दोनों बंदियों ने हाईकोर्ट के समक्ष एक याचिका दायर की थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि इंस्पेक्टर धनंजय सयारे और कांस्टेबल वाल्मिक बुरिले ने उन पर ज्यादती की। साथ ही उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 21 तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन करने के आरोप में दोनों पुलिस कर्मियों के खिलाफ जांच की मांग की।

केस की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, श्री मिरननाथ महाराज देवस्थान की ट्रस्टीशिप को लेकर महाराष्ट्र प‌ब्लिक ट्रस्ट एक्ट के तहत अथॉरिटीज़ के समक्ष विवाद चल रहा था. मामले में प्रतिद्वंद्वी समूहों द्वारा प्रतिवाद किया गया और इस बात पर विवाद हुआ कि किशोर फुटाने (याचिकाकर्ता नंबर 1) पब्लिक ट्रस्ट की कार्यकारी समिति के सचिव हैं या नहीं।

25 दिसंबर, 2013 को सुरेश रोकड़े नामक एक शख्स ने किशोर के खिलाफ देवली पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज कराई, जिसमें कहा गया कि किशोर 24 दिसंबर की शाम लगभग 7 बजे मंदिर आए थे और उस अलमारी की चाबी मांगी थी, जहां ट्रस्ट के दस्तावेज रखे गये थे, और जब उन्हें बताया गया कि चाबी पुंडलिक देवरोजी उगाडे के पास है, जो कि ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं, जब किशोर ने बताने वाले व्यक्ति को गाली दी और अलमारी खोलने और कागजात छीनने की धमकी दी।

पूछताछ के बाद, पुलिस अधिकारियों ने पाया कि जिन अपराधों की शिकायत की गई थी, वे गैर-संज्ञेय थे और उसी के अनुसार मामले का नोट लिया गया।

19 जनवरी 2014 को, याचिकाकर्ताओं के खिलाफ एक और रिपोर्ट दर्ज की गई, जिसमें कहा गया कि 19 जनवरी 2014 को लगभग 11:30 बजे सुरेश रोकड़े ने उन्हें फोन पर सूचित किया कि "पूर्व सचिव" (याचिकाकर्ता नंबर 1) मंदिर गए और ताला खोला।

प्रतिवादी नंबर 7 ने रिपोर्ट में आगे कहा गया कि ट्रस्ट के अध्यक्ष पुंडलिक देवरोजी उगाडे ने भी उन्हें फोन किया था और उन्हें मंदिर जाने के लिए कहा था, और जब सूचनाकारी मंदिर गए तो उन्होंने दोनों याचिकाकर्ताओं को कुछ पत्रों/ दस्तावेजों की जांच करते हुए कार्यालय में बैठे पाया और जब सूचनाकारी ने उन्हें कागजात की जांच करने से रोकने की कोशिश की तो उन्होंने उसे गाली दी और मारपीट करने की धमकी दी।

मामले की जांच की गई और यह पाया गया कि संज्ञेय अपराध नहीं है, इसलिए पुलिस अधिकारियों उसी अनुसार नोट लिया।

हालांकि, याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 151 (1) के तहत कार्रवाई की गई, और उन्हें 5 फरवरी, 2014 को सुबह 5 बजे देवली पुलिस स्टेशन में हिरासत में लिया गया और दोपहर 12 बजे तक रखा गया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं को कार्यपालक मजिस्ट्रेट के पास ले जाया गया, जहां बांड/ जमानत देने के बाद उन्हें छोड़ने का आदेश दिया गया।

निर्णय

अदालत ने 3 नवंबर 2014 और 10 नवंबर 2014 को अतिरिक्त लोक अभियोजक टीए मिर्जा को मूल रिकॉर्ड प्रस्तुत करने का निर्देश देते हुए आदेश पारित किया। हालांकि अतिरिक्त लोक अभियोजक 29 नवंबर तक रिकॉर्ड का प्रस्तुत करने में विफल रहे, उसके बाद तहसीलदार को सुनवाई के समय रिकॉर्ड और कार्यवाही के दस्तावेज प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया।

तहसीलदार ने एक हलफनामा दायर करके रिकॉर्ड और कार्यवाही के दस्तावेज प्रस्तुत करने में असमर्थता जताते हुए कहा कि यह वे करने योग्य नहीं हैं। इसलिए 10 दिसंबर, 2019 को वर्धा के कलेक्टर को इस मामले में जांच करने और एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया।

कलेक्टर वर्धा ने रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि रिकॉर्ड ट्रेस करने योग्य नहीं है और रिकॉर्ड की अंतिम प्रविष्टि के अनुसार, यह उषा येते की हिरासत में था। उषा येते नायब तहसीलदार थीं, सेवानिवृत्त हो चुकी थीं और सितंबर 2019 में उनकी मृत्‍यु हो गई।

कोर्ट ने कहा-

"हम पाते हैं कि प्रतिवादी नंबर एक और छह की ओर से, कोर्ट द्वारा 03 नवंबर 2014 और 10 नवंबर 2014 को पारित आदेशों के बावजूद रिकॉर्ड और कार्यवाही के दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाने में गंभीर चूक हुई है। उस समय रिकॉर्ड और कार्यवाही प्रस्तुत करने में कोई बाधा नहीं थी। इन तथ्यों के आलोक में हम प्रतिवादियों के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने के लिए विवश हैं। "

पीठ ने आगे कहा-

"कम से कम कहने के लिए, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 151 (1) के अनुसार कार्रवाई करने के लिए दिया गया औचित्य भ्रामक है और अवैध कार्रवाई को छिपाने का प्रयास है। याचिकाकर्ता संख्या 2 के खिलाफ केवल एक रिपोर्ट थी, जोकि 19 जनवरी 2014 की है। इसके अलावा, प्रतिवादी नंबर 5 ने स्वयं पाया कि ‌शिकायत के आधार पर पहली एफआईआर संज्ञेय अपराध के लिए दर्ज नहीं की जा सकती है। हालांकि, याचिकाकर्ता 1 के खिलाफ दो रिपोर्टें थीं। प्रतिवादी नंबर 5 (धनंजय) ने जांच के बाद पाया कि याचिकाकर्ता संख्या एक खिलाफ संज्ञेय अपराध के लिए पहली एफआइआर दर्ज नहीं की जा सकती है।"

इसके अलावा, याचिकाकर्ता संख्या एक के खिलाफ दो रिपोर्टों का पंजीकरण या याचिकाकर्ता संख्या दो के खिलाफ गैर-संज्ञेय अपराध के लिए एक रिपोर्ट का पंजीकरण याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 151 (1) के तहत प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करने का कारण नहीं हो सकता है। "

मामले में कांस्टेबल वाल्मिक ने कहा कि उनके पास अपने सीनियर के आदेशों का पालन करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था, इसलिए कोर्ट ने इंस्पेक्टर धनंजय सयारे को दो लाख का जुर्माना (जिनमें दोनों याचिकाकर्ताओं को एक-एक लाख रुपये दिए जाएंगे) के साथ ही 10-10 हजार रुपए दोनों याचिकाकर्ताओं को मुकदमे का हजाका अदा करने का आदेश दिया।

बेंच की टिप्‍पणी-

"भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा किसी व्याक्ति को गारंटीकृत स्वतंत्रता को पुलिस अधिकारी की इच्छा और सनक पर नहीं छोड़ा जा सकता है, और यदि ऐसा किया जाता है तो यह पुलिस अधिकारियों को मनमाना और बेलगाम अधिकार प्रदान करेगा।"

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