अगर चुनाव आयोग की ईमानदारी पर भरोसा नहीं किया जा सकता तो लोकतंत्र अपनी जड़ से ही ज़हरीला हो जाएगा: जस्टिस कुरियन जोसेफ

  • अगर चुनाव आयोग की ईमानदारी पर भरोसा नहीं किया जा सकता तो लोकतंत्र अपनी जड़ से ही ज़हरीला हो जाएगा: जस्टिस कुरियन जोसेफ

    सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कुरियन जोसेफ ने आज सवाल उठाया कि अगर चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी संभालने वालों की ईमानदारी पर भरोसा नहीं किया जा सकता तो क्या लोकतंत्र ज़हरीला हो गया है? उन्होंने भारत के चुनाव आयोग (ECI) की आज़ादी की रक्षा के लिए मज़बूत संवैधानिक सुरक्षा उपायों की मांग की।

    इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ लॉयर्स, केरलम द्वारा आयोजित "भारत के चुनाव आयोग की आज़ादी: क्या समझौता हुआ है?" विषय पर एक सेमिनार में उद्घाटन भाषण देते हुए जस्टिस जोसेफ ने संविधान सभा की बहसों के दौरान चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर जताई गई चिंताओं का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि इस संस्था की आज़ादी और ईमानदारी को संविधान में ही शामिल सुरक्षा उपायों के ज़रिए पक्का किया जाना चाहिए।

    उन्होंने संविधान सभा के सदस्य हृदय नाथ कुंजरू की उस चेतावनी पर ज़ोर दिया कि अगर चुनावी मशीनरी या अधिकारी ऐसे हों जिनकी ईमानदारी पर भरोसा न किया जा सके, तो वे लोकतंत्र को उसकी जड़ से ही ज़हरीला कर देंगे।

    उन्होंने कहा,

    "डॉ. हृदय नाथ कुंजरू ने उस पद पर बैठे व्यक्ति की ईमानदारी के बारे में बात की थी। अगर वह ईमानदारी बेदाग नहीं है तो लोकतंत्र अपनी जड़ से ही ज़हरीला हो जाएगा। क्या हम इन दिनों ऐसा ही नहीं देख रहे हैं? क्या उन लोगों के हाथों लोकतंत्र ज़हरीला नहीं हुआ है जो संविधान की सोच के मुताबिक काम नहीं कर रहे हैं? इसलिए मेरे प्यारे दोस्तों, मैं बस इतना ही कहूंगा कि यह वह समय है, जब देश को हमारी लोकतंत्र की रक्षा के बारे में सोचना चाहिए और कदम उठाने चाहिए। अगर भारत के चुनाव आयोग जैसी महान संस्थाओं को ऐसी संवैधानिक शक्तियां दी गई हैं तो उनकी ईमानदारी और आज़ादी भी पक्की की जानी चाहिए।"

    जस्टिस जोसेफ ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा की शर्तें संविधान में तय होनी चाहिए, न कि इन मामलों को संसदीय कानून पर छोड़ दिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी मांग की कि सभी चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया वही होनी चाहिए, जो सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए है।

    जस्टिस जोसेफ ने संविधान के अनुच्छेद 324 का ज़िक्र किया, जो ECI को मतदाता सूची तैयार करने और चुनाव कराने की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति देता है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक प्रावधान में इन ज़िम्मेदारियों को संभालने वाली संस्था की आज़ादी की रक्षा के तरीके पर पर्याप्त रूप से बात नहीं की गई। संविधान सभा की बहसों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने डॉ. बी.आर. अंबेडकर की उन चिंताओं को याद किया, जो मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त के तौर पर किसी ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति के खिलाफ सुरक्षा उपायों की कमी को लेकर थीं, जो शायद सरकार के प्रभाव में हो सकता है।

    जस्टिस जोसेफ ने संविधान सभा के सदस्य सिब्बन लाल सक्सेना के उस प्रस्ताव का भी ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि चुनाव आयोग में नियुक्तियों को संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में दो-तिहाई बहुमत से मंज़ूरी मिलनी चाहिए। सक्सेना ने चिंता जताई थी कि सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी चुनावी फ़ायदा उठाने के लिए पार्टी के किसी कट्टर वफ़ादार व्यक्ति को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त कर सकती है।

    जस्टिस जोसेफ ने कहा कि संविधान बनाते समय उठाई गई चिंताओं से यह बात साफ़ होती है कि इस पद पर बैठने वाले व्यक्ति की ईमानदारी और निष्पक्षता से कोई समझौता न हो, यह सुनिश्चित करना कितना ज़रूरी है।

    संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्ति के चरण से ही सुरक्षा की जानी चाहिए

    अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फ़ैसले में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए अंतरिम चयन समिति बनाने का निर्देश दिया गया, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया शामिल हों। यह व्यवस्था तब तक के लिए थी जब तक संसद इस विषय पर कोई कानून नहीं बना लेती।

    बाद में संसद ने एक कानून बनाया, जिसके तहत चयन समिति में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया।

    हालांकि, जस्टिस जोसेफ ने नए कानून को चुनौती देने का मामला अदालत में विचाराधीन होने के कारण इस पर विस्तार से कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि संवैधानिक संस्थाओं की ईमानदारी और आज़ादी की रक्षा के लिए नियुक्ति के चरण से ही सुरक्षा उपायों की ज़रूरत है।

    उन्होंने कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा की शर्तों को संसदीय कानून पर छोड़ने के बजाय संविधान में ही उचित सुरक्षा उपाय शामिल किए जाने चाहिए।

    सभी चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया एक जैसी होनी चाहिए

    जस्टिस जोसेफ ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए लागू सुरक्षा उपायों के बीच अंतर पर भी सवाल उठाया।

    संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को केवल मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर ही हटाया जा सकता है।

    जस्टिस जोसेफ ने कहा कि सभी चुनाव आयुक्तों को पद से हटाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के जजों जैसी ही सुरक्षा मिलनी चाहिए। इस सिद्धांत का ज़िक्र करते हुए कि मुख्य चुनाव आयुक्त "बराबर वालों में सबसे पहला" (First Among Equals) होता है, उन्होंने कहा कि CEC को आयोग के अन्य सदस्यों की तुलना में कोई विशेष दर्जा नहीं मिलना चाहिए।

    उन्होंने कहा,

    "संविधान कहता है कि केवल CEC को ही महाभियोग (Impeachment) के ज़रिए हटाया जा सकता है और अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर हटाया जा सकता है। असल में, यह बहुत खतरनाक शक्ति है और चुनाव आयुक्तों को हटाने के संबंध में 2023 के कानून में भी इसे दोहराया गया। अगर उन्हें बराबर माना जाना है तो मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को भी सुप्रीम कोर्ट के जज के दर्जे के बराबर माना जाना चाहिए। इसलिए न केवल मुख्य चुनाव आयुक्त, बल्कि अन्य सभी को भी सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह केवल महाभियोग की प्रक्रिया से ही हटाया जाना चाहिए।"

    उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि संवैधानिक शक्तियाँ संस्थाओं में निहित होती हैं, न कि ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के निजी विशेषाधिकार होते हैं।

    उन्होंने ज़ोर देकर कहा,

    “मुख्य चुनाव आयुक्त को अकेले कोई खास विशेषाधिकार नहीं मिलना चाहिए। यह एक संस्था होनी चाहिए, कोई व्यक्ति नहीं। दुर्भाग्य से, मेरे विचार से हमारे देश में ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को गलतफहमी या गलत धारणा होती है कि सारी ताकत उस व्यक्ति में निहित है। ताकत व्यक्ति में नहीं होती। भारत का संविधान व्यक्ति को ताकत नहीं देता। जहां भी ताकत दी जाती है, उसका मतलब उस ताकत का संस्थागत इस्तेमाल होता है। अगर यह ताकत का संस्थागत इस्तेमाल है, तो आपको दो बार सोचना होगा कि आप ताकत का इस्तेमाल कब, कैसे और कहां करते हैं।”

    चुनाव से जुड़ी ताकतें ECI के पास ही केंद्रित नहीं होनी चाहिए

    जस्टिस जोसेफ ने यह भी सुझाव दिया कि ECI के लिए सभी राज्य-स्तरीय चुनावों पर देखरेख और नियंत्रण रखना ज़रूरी नहीं है। अमेरिका, स्विट्जरलैंड और यूनाइटेड किंगडम में अपनाई जाने वाली प्रणालियों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने एक केंद्रीय अथॉरिटी के पास बहुत ज़्यादा चुनावी ताकतें केंद्रित होने पर सवाल उठाए।

    उन्होंने इस कहावत का ज़िक्र किया कि 'असीमित ताकत इंसान को पूरी तरह भ्रष्ट कर देती है', और चेतावनी दी कि बिना रोक-टोक और बिना मार्गदर्शन वाली ताकतें संस्थाओं को उनकी संवैधानिक ज़िम्मेदारियों से भटका सकती हैं।

    उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं में निहित ताकत पर रोक के तौर पर जनता की सतर्कता के महत्व पर ज़ोर देते हुए कहा,

    “ऐसा इसलिए है, क्योंकि इतनी ज़्यादा ताकत का एक जगह जमा होना इस बात का संकेत है कि असीमित ताकत इंसान को पूरी तरह भ्रष्ट कर देती है। ताकत भ्रष्ट करती है और असीमित ताकत पूरी तरह भ्रष्ट कर देती है। स्थिति ऐसी हो गई कि कुछ संस्थाओं को लगता है कि उनके पास असीमित ताकत है, जिस पर कोई रोक-टोक या मार्गदर्शन नहीं है और कोई सवाल करने या जांचने वाला नहीं है तो ऐसे में रास्ते से भटकना तय है। तो रोक-टोक के उपाय क्या हैं? मुख्य उपायों में से एक है लोगों की लगातार सतर्कता।”

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