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दिल्ली दंगे : सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की UAPA आरोपी की जमानत रद्द करने की याचिका खारिज की जिसमें बिना सत्यापन सिम कार्ड बेचे थे

LiveLaw News Network
23 Nov 2020 12:00 PM GMT
दिल्ली दंगे : सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की UAPA आरोपी की जमानत रद्द करने की याचिका खारिज की जिसमें बिना सत्यापन सिम कार्ड बेचे थे
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सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों के आरोपी फैज़ान खान की जमानत रद्द करने की याचिका खारिज कर दी, जिसे गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था।

जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 23 अक्टूबर के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्हें जमानत दी गई थी।

खान को पहचान के अनिवार्य सत्यापन के बिना, कथित तौर पर साजिश में भागीदारी का पता लगाने से बचने के लिए, छात्रों को मोबाइल फोन सिम कार्ड की आपूर्ति करने का आरोप है।

न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत की एकल न्यायाधीश पीठ ने खान को जमानत दे दी थी और उल्लेख किया था कि यूएपीए की धारा 43D (5) के तहत आने वाली शर्तें / रोक वर्तमान मामले में रिकॉर्ड के अनुसार सामग्री पर लागू नहीं होगी और यह कि जांच एजेंसी की स्टेटस रिपोर्ट में गवाहों के बयानों को छोड़कर, यूएपीए के तहत अपराधों के गठन का खुलासा नहीं किया गया।

भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 148, 149, 120 बी के तहत दंडनीय अपराध के लिए दर्ज एक प्राथमिकी के अनुपालन में मामले में जमानत मांगी गई थी।

आवेदन का विरोध करने के लिए, राज्य ने 6 मार्च, 2020 को एक स्टेटस रिपोर्ट दायर की थी।

उपरोक्त स्टेटस रिपोर्ट में, यह दावा किया गया था कि अपराध शाखा को सूचना मिली थी जिसमें कहा गया था कि दिल्ली में फरवरी 2020 के सांप्रदायिक दंगे हुए थे जो "पूर्व-नियोजित थे और उसको जेएनयू के छात्र उमर खालिद और उसके सहयोगियों द्वारा रचा गया था और यह सभी अलग -2 समूहों के साथ जुड़े थे।"

स्टेटस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि आरोपी फैज़ान खान और सह-आरोपी आसिफ इकबाल तन्हा "एक दूसरे के साथ मिलकर काम कर रहे थे" और "एक अन्य पूर्व-अभियुक्त के साथ पहले से रची गई आपराधिक साजिश के मद्देनज़र जानबूझकर गैर-कानूनी और आतंकवादी कृ्त्य को सुविधा प्रदान की गई।"

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि आरोपी व्यक्तियों के मोबाइल फोन CERT-IN को विश्लेषण के लिए भेजे गए थे और यह पता चला था कि सीएए के विरोध स्थलों पर लोगों के जुटाने के संबंध में समन्वय और निर्देशन के लिए अलग-अलग व्हाट्सएप ग्रुप बनाए गए थे जिसके चलते दंगे शुरू हुए।

न्यायमूर्ति कैत ने दलीलें सुनने और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के माध्यम से जाने के बाद, यह देखा कि यह जांच एजेंसी का यह मामला नहीं था कि याचिकाकर्ता व्हाट्सएप समूहों का एक हिस्सा था जो सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन आयोजित करने के लिए बनाए गए थे और यह याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई आरोप नहीं है कि वह आतंकी फंडिंग या किसी अन्य सहायक गतिविधि में लगा था।

न्यायालय ने यह भी नोट किया कि जांच एजेंसी द्वारा कथित घटनाओं के बीच कोई निकटस्थ गठजोड़ नहीं था और यह आरोप भी नहीं लगाया गया था कि याचिकाकर्ता सीएए, 2019 के खिलाफ विरोध प्रदर्शन आयोजित करने के लिए गुप्त तौर पर या पक्षकार था।

इस संदर्भ में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के लिए समान राशि की एक ज़मानत के साथ 25,000 / -रुपये की राशि का एक व्यक्तिगत बांड प्रस्तुत करने के बाद खान को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया।

खान को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी भी गवाह को प्रभावित करने या सबूतों के साथ छेड़छाड़ ना करने के लिए निर्देशित किया गया है। ट्रायल कोर्ट को उच्च न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों से प्रभावित न होने के लिए निर्देशित किया गया है।

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